Friday, July 3, 2026
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Service Provider: उपदान (Gratuity) विवादों का फैसला उपभोक्ता अदालतें नहीं कर सकतीं…उपभोक्ता किस कहते हैं, यहां मिलेगा जवाब, जानिए

Service Provider: उपभोक्ता अदालतों के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) को लेकर केरल हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।

द तिरूर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम मोइदीन एम मामले में सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस जियाद रहमान ए.ए. की एकल पीठ ने द तिरूर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम मोइदीन एम मामले में फैसला सुनाते हुए मलप्पुरम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (DCDRC) के उस आदेश को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया है, जिसमें एक बैंक को अपने सेवानिवृत्त कर्मचारी को ग्रैच्युटी (उपदान) के बकाए के साथ मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।

नियोक्ता को ‘सेवा प्रदाता’ नहीं माना जा सकता: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने कहा, रोजगार के रिश्ते में नियोक्ता (Employer) को ‘सेवा प्रदाता’ (Service Provider) नहीं माना जा सकता और न ही कर्मचारी को ‘उपभोक्ता’ (Consumer) कहा जा सकता है। वास्तव में, नौकरी में कर्मचारी अपनी सेवाएं नियोक्ता को देता है जिसके बदले उसे वेतन मिलता है; यानी नियोक्ता सेवाओं का लाभ उठाता है, न कि इसके विपरीत।

मामला क्या है?: उपभोक्ता फोरम पहुंचा ग्रैच्युटी का बकाया मामला

यह कानूनी विवाद तिरूर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक और उसके एक पूर्व कर्मचारी के बीच बकाया ग्रैच्युटी राशि को लेकर शुरू हुआ था।

कर्मचारी की शिकायत: बैंक के एक कर्मचारी मार्च 2016 में 38 साल की लंबी सेवा के बाद सेवानिवृत्त (Retire) हुए थे। बैंक ने उन्हें ग्रैच्युटी के रूप में ₹10 लाख का भुगतान किया। हालांकि, कर्मचारी का दावा था कि उपदान भुगतान अधिनियम, 1972 (Payment of Gratuity Act, 1972) के तहत वह ₹12.20 लाख पाने के हकदार थे।

उपभोक्ता आयोग का आदेश: बकाया ₹2.20 लाख की वसूली के लिए कर्मचारी ने सीधे जिला उपभोक्ता फोरम (DCDRC) का दरवाजा खटखटाया। उपभोक्ता आयोग ने शिकायत को स्वीकार करते हुए बैंक को बकाया राशि का भुगतान करने का आदेश दिया और साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए ₹25,000 का मुआवजा और ₹10,000 कानूनी खर्च भी लगा दिया। इस फैसले के खिलाफ बैंक ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की।

हाई कोर्ट का रुख: ‘कॉन्ट्रैक्ट ऑफ सर्विस’ और ‘कॉन्ट्रैक्ट फॉर सर्विस’ का बड़ा अंतर

केरल हाई कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) के मूल विधिक सिद्धांतों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए उपभोक्ता आयोग के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर माना। कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां इस प्रकार हैं।

‘सेवा के अनुबंध’ पर लागू नहीं होता उपभोक्ता कानून

अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में दो तरह के अनुबंध होते हैं।

कॉन्ट्रैक्ट फॉर सर्विस (Contract for Service): इसमें आप किसी स्वतंत्र पेशेवर (जैसे डॉक्टर, प्लंबर या ऐप आधारित सेवा) की व्यावसायिक सेवाएं लेते हैं। उपभोक्ता कानून इस श्रेणी पर लागू होता है।

कॉन्ट्रैक्ट ऑफ सर्विस (Contract of Service): यह पूरी तरह से एक नियोक्ता और कर्मचारी के बीच का नौकरी का रिश्ता है। रोजगार से जुड़े नियम और सेवानिवृत्ति के वैधानिक लाभ (जैसे भविष्य निधि या ग्रैच्युटी) इसी के अंतर्गत आते हैं। उपभोक्ता अदालतें इसमें दखल नहीं दे सकतीं।

सर्वोच्च न्यायालय के नजीर का हवाला

जस्टिस जियाद रहमान ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले [जगमित्तर सैन भगत बनाम महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं, हरियाणा] का उल्लेख किया। इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने पहले ही यह व्यवस्था दी थी कि सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति के लाभों (Retirement Benefits) से जुड़े विवादों का निपटारा उपभोक्ता अदालतों के मंच पर नहीं किया जा सकता।

अदालत का अंतिम आदेश

केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि ग्रैच्युटी रोजगार के अनुबंध से उत्पन्न होने वाला एक सेवा लाभ है, इसलिए जिला उपभोक्ता आयोग के पास इस शिकायत पर सुनवाई करने का कोई विधिक अधिकार (Jurisdiction) नहीं था। इसके साथ ही, हाई कोर्ट ने उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक पर लगाए गए जुर्माने और बकाए के आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया।

केस मैट्रिक्स: केरल हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांकेरल उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय, एरनाकुलम
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जियाद रहमान ए.ए. (एकल पीठ)
केस संदर्भद तिरूर सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम मोइदीन एम
लागू कानूनउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, २०१९ बनाम उपदान भुगतान अधिनियम, १९७२
मूल विधिक व्याख्यानियोक्ता ‘सेवा प्रदाता’ नहीं है और कर्मचारी ‘उपभोक्ता’ नहीं है।
बैंक के वकीलएडवोकेट अर्जुन राघवन और टी.आर. हरिकुमार
कर्मचारी के वकीलएडवोकेट थारीक अनवर, के.एस. सलमा जेनाथ व अन्य
अदालत का अंतिम निर्णयबैंक की याचिका मंजूर; उपभोक्ता फोरम का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण रद्द।
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