Sunday, August 30, 2026
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15 Years Wait: न्याय में देरी, पर हक बरकरार…15 साल बाद मिली DTC ड्राइवर की नौकरी, केस बड़ा ही रोचक है, जरूर पढ़ें

15 Years Wait: दिल्ली हाई कोर्ट ने 15 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एक 46 वर्षीय व्यक्ति के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने राम वीर सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह राहत दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियुक्ति ‘भावी’ (Prospective) होगी, यानी उन्हें पिछले सालों का वेतन या वरिष्ठता नहीं मिलेगी। कोर्ट ने दिल्ली परिवहन निगम (DTC) को आदेश दिया है कि वह इस व्यक्ति को ड्राइवर के पद पर नियुक्त करे। मामला आरक्षण की पात्रता और “आउटसाइडर” (बाहरी राज्य) के विवाद में फंसा हुआ था।

विवाद की जड़: दिल्ली vs उत्तर प्रदेश

  • सफल चयन: राम वीर सिंह ने 2010 से 2012 के बीच DSSB द्वारा आयोजित DTC ड्राइवर की लिखित और स्किल परीक्षा पास की थी।
  • अस्वीकृति (Rejection): दस्तावेज सत्यापन के समय उनका आवेदन यह कहकर रद्द कर दिया गया कि वे उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जाति (SC) से हैं और दिल्ली (NCT) में आरक्षण के हकदार नहीं हैं।
  • लंबा संघर्ष: राम वीर 2011 से ही अपने हक के लिए अदालतों के चक्कर काट रहे थे। वह अब 46 वर्ष के हो चुके हैं और इस लंबी मुकदमेबाजी के कारण कहीं और नौकरी भी नहीं पा सके।

हाई कोर्ट का मानवीय दृष्टिकोण

  • अदालत ने ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश को बरकरार रखा जिसने राम वीर के पक्ष में फैसला दिया था।
  • न्याय की जीत: न्याय तभी पूरा होगा जब उन्हें वह पद दिया जाए जिसके लिए उन्होंने एक दशक पहले क्वालीफाई किया था।
  • उम्र का पड़ाव: 46 साल की उम्र में नियुक्ति देना उनके भविष्य के लिए जरूरी है, क्योंकि उन्होंने पूरी चयन प्रक्रिया को ईमानदारी से पास किया है।

नियुक्ति की शर्तें (Terms of Appointment)

  • कोर्ट ने कुछ कड़े निर्देश भी दिए हैं ताकि विभाग पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े और पुराने कैडर में गड़बड़ी न हो।
  • कोई पिछला लाभ नहीं: उन्हें कोई पिछला वेतन (Back wages), एरियर (Arrears) या वरिष्ठता (Seniority) नहीं दी जाएगी।
  • नई शुरुआत: उनकी नियुक्ति को सेवा में शामिल होने की तारीख से ‘नई नियुक्ति’ माना जाएगा।
  • समय सीमा: DTC को आदेश दिया गया है कि दो महीने के भीतर राम वीर सिंह को ड्राइवर के पद पर नियुक्त किया जाए।

कानूनी पेच: ‘आउटसाइडर’ कैटेगरी का मामला

शुरुआत में राम वीर का मामला सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले के आधार पर खारिज किया गया था, जिसमें कहा गया था कि एक राज्य का आरक्षित श्रेणी का व्यक्ति दूसरे राज्य में आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। हालांकि, हाल के न्यायिक निर्णयों और ट्रिब्यूनल की गहन जांच के बाद यह पाया गया कि वे नियुक्ति के पात्र हैं।

निष्कर्ष: सिस्टम की सुस्ती और एक व्यक्ति का धैर्य

यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली की सुस्ती का एक ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ एक योग्य उम्मीदवार को अपना हक पाने के लिए 15 साल इंतजार करना पड़ा। दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल राम वीर के लिए राहत है, बल्कि यह उन उम्मीदवारों के लिए भी एक उम्मीद है जो तकनीकी कारणों से सिस्टम की जटिलताओं में फंस जाते हैं।

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