‘Mr’ or ‘Hon’ble’ in FIR: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को एक एफआईआर (FIR) में प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं हुआ, इस पर कड़ी फटकार लगाई।
मथुरा के हाईवे थाने में दर्ज है मामला
दरअसल, बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के नाम के साथ ‘माननीय’ (Honourable) और ‘श्री’ (Mr) जैसे सम्मानजनक शब्दों का उपयोग नहीं किया। कोर्ट ने इस मामले में राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) से हलफनामा भी मांगा है। हाईकोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने मथुरा के हाईवे थाने में दर्ज एक धोखाधड़ी के मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के नाम के साथ उचित सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करे। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को एक एफआईआर (FIR) में बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के नाम के साथ ‘माननीय’ (Honourable) और ‘श्री’ (Mr) जैसे सम्मानजनक शब्दों का उपयोग न करने पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने इस मामले में राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) से हलफनामा भी मांगा है।
मामला क्या था? (The Job Scam FIR)
- शिकायत: खजान सिंह नामक व्यक्ति ने हर्षित शर्मा के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। आरोप है कि हर्षित ने सरकारी विभागों में नौकरी दिलाने के नाम पर करीब 80 लाख रुपये की ठगी की।
- अनुराग ठाकुर का जिक्र: आरोपी ने खुद को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का करीबी बताया था। जब नौकरी नहीं मिली, तो शिकायतकर्ता आरोपी को दिल्ली में अनुराग ठाकुर के पास ले गया।
- मंत्री की भूमिका: FIR के अनुसार, अनुराग ठाकुर ने आरोपी को उनका नाम गलत तरीके से इस्तेमाल करने के लिए फटकार लगाई और उसे पुलिस के हवाले करवाया था।
हाई कोर्ट की आपत्ति: “प्रोटोकॉल का उल्लंघन”
- सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एफआईआर की भाषा पर गहरी नाराजगी जताई।
- बिना सम्मान नाम: कोर्ट ने नोट किया कि एफआईआर में केंद्रीय मंत्री का नाम बिना ‘माननीय’ या ‘मिस्टर’ लगाए सीधे लिख दिया गया।
- पुलिस की जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा, “भले ही शिकायतकर्ता ने लिखित रिपोर्ट में मंत्री का नाम अनुचित तरीके से लिखा हो, लेकिन ‘चेक एफआईआर’ (Check FIR) लिखते समय यह पुलिस का कर्तव्य था कि वह ब्रैकेट में ही सही, लेकिन सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग कर प्रोटोकॉल का पालन करती।”
कोर्ट के कड़े निर्देश
- बेंच ने इस मामले में प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए निम्नलिखित आदेश दिए।
- हलफनामा: यूपी के अपर मुख्य सचिव (गृह) को हलफनामा दाखिल कर यह समझाना होगा कि प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं किया गया।
- गाड़ी का मालिकाना हक: कोर्ट ने सरकार से उस फॉर्च्यूनर कार (UP52 BD 7799) के मालिक की जानकारी भी मांगी है, जिसे आरोपी ने गारंटी के तौर पर शिकायतकर्ता को दिया था।
- समय सीमा: कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को आदेश दिया कि 48 घंटे के भीतर यह आदेश गृह सचिव और मथुरा के एसएसपी तक पहुँचाया जाए।
Table: Summary of Court’s Concerns
| विषय | अदालत की टिप्पणी |
|---|---|
| प्रोटोकॉल | संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए सम्मानजनक शब्द अनिवार्य हैं। |
| पुलिस की चूक | शिकायतकर्ता की भाषा को पुलिस को सुधारना चाहिए था। |
| जवाबदेही | गृह विभाग के उच्च अधिकारियों को इसका कारण बताना होगा। |
निष्कर्ष: पद की गरिमा और पुलिस प्रक्रिया
यह मामला यह स्पष्ट करता है कि अदालतों की नजर में प्रशासनिक दस्तावेजों (जैसे FIR) की भाषा और उसमें उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के प्रति सम्मान का प्रोटोकॉल कितना महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पुलिस की लापरवाही को ‘सिर्फ एक टाइपिंग मिस्टेक’ मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
CRIMINAL MISC. WRIT PETITION No. – 4982 of 2026
HON’BLE J.J. MUNIR, J., HON’BLE TARUN SAXENA, J
Harshit Sharma And 2 Others
Versus
State Of U.P. And 2 Others

