Sunday, August 30, 2026
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Bar Council Elections: 30% महिला आरक्षण State Bar Council में हो, इसे लेकर बड़ा अपडेट…सुनवाई व आदेश क्या हुए, सब यहां पढ़िए

Bar Council Elections: सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बार काउंसिल (State Bar Council) के चुनावों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमालिया बागची की बेंच ने बार काउंसिल चुनावों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि को-ऑप्शन का उद्देश्य आरक्षण को मजबूत करना है, न कि उसे कमजोर करना। अदालत ने जस्टिस (रिटायर्ड) सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड कमेटी को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह तय करे कि 10% महिला सदस्यों के ‘को-ऑप्शन’ (Co-option/मनोनयन) की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।

यह है मामला

  • पिछला आदेश: दिसंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल चुनावों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण का निर्देश दिया था।
  • को-ऑप्शन का नियम: कोर्ट ने कहा था कि यदि चुनाव के जरिए 30% महिलाएं नहीं चुनी जाती हैं, तो शेष 10% पदों को ‘को-ऑप्शन’ (सीधे नामांकन) के जरिए भरा जा सकता है।
  • विवाद: अब सवाल यह उठा है कि ये 10% महिलाएं कौन होंगी? क्या वे चुनाव हारने वाली प्रत्याशी होंगी या बार एसोसिएशन द्वारा नामांकित नई महिलाएं?

कोर्ट के सामने रखे गए विकल्प

  • याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं ने को-ऑप्शन के लिए तीन प्रमुख सुझाव दिए हैं।
  • चुनाव लड़ने वाली महिलाएं: पहले सुझाव में कहा कि उन महिलाओं को मौका मिले जिन्होंने चुनाव लड़ा और सबसे अधिक वोट पाए, लेकिन जीत नहीं सकीं।
  • BCI का अधिकार: दूसरे सुझाव में बताया गया कि को-ऑप्शन का फैसला स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) पर छोड़ दिया जाए।
  • इलेक्शन कमेटी: तीसरे व अंतिम सुझाव में यह जिम्मेदारी राज्य की चुनाव समिति को देने की वकालत की गई।

वरिष्ठ वकीलों की चिंताएं: पेंडोरा बॉक्स खुल जाएगा

  • सीनियर एडवोकेट दमा शेषाद्रि नायडू: उन्होंने दलील दी कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में कई महिलाएं ओपन कैटेगरी में पुरुषों से अधिक वोट पाकर जीती हैं। ऐसे में को-ऑप्शन का सहारा केवल तभी लिया जाना चाहिए जब चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीदवार ही न हों।
  • सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन: उन्होंने BCI द्वारा बनाए गए नए नियमों पर चिंता जताई, जिसमें BCI खुद नामांकन करने की बात कह रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे राजनीति बढ़ेगी और ‘प्रपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन’ (Proportional Representation) के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।

जस्टिस धूलिया कमेटी की भूमिका

  • कोर्ट ने माना कि को-ऑप्शन की स्पष्ट प्रक्रिया न होने से भ्रम की स्थिति पैदा हुई है।
  • हितधारकों से परामर्श: कमेटी सभी स्टेकहोल्डर्स (Stakeholders) से बात करेगी।
  • अंतिम निर्णय: कमेटी यह तय करेगी कि क्या चुनाव हारने वाली महिलाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए या नामांकन का कोई और पारदर्शी तरीका होना चाहिए।

फैसले के अहम बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य उद्देश्यस्टेट बार काउंसिल में 30% महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
को-ऑप्शन कोटा10% सीटें नामांकन के जरिए भरी जा सकती हैं।
सुधार की जरूरतकोर्ट ने माना कि पिछले आदेश में स्पष्टता की कमी से विवाद बढ़ा।
प्रशंसाकोर्ट ने चुनावों की निगरानी के लिए इलेक्शन सुपरवाइजरी कमेटी के काम की सराहना की।

निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की ओर

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि वह बार काउंसिल जैसे संस्थानों में महिलाओं के आरक्षण को केवल ‘कागजी’ नहीं रखना चाहता। जस्टिस धूलिया कमेटी का निर्णय यह तय करेगा कि महिला वकीलों को बार काउंसिल की निर्णय लेने वाली प्रक्रियाओं में उनकी योग्यता और चुनावी संघर्ष के आधार पर सही स्थान मिले।

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