Friday, October 30, 2026
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Judicial Sanctity: प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जज पर आरोप लगाना बर्दाश्त नहीं होगा…वकील निलेश ओझा से कहा-वकील संस्था की गरिमा के रक्षक हैं भक्षक नहीं

Judicial Sanctity: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक गरिमा और वकीलों के आचरण पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें दिशा सालियान के पिता के वकील निलेश ओझा के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo-motu) अवमानना की कार्यवाही शुरू की गई थी। कोर्ट ने वकील निलेश ओझा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ शुरू की गई अवमानना कार्यवाही (Contempt Proceedings) को चुनौती दी थी। ओझा पर दिशा सालियान मौत मामले में एक जज के खिलाफ “अपमानजनक और मानहानिकारक” टिप्पणी करने का आरोप है।

मामला क्या था? (The Background)

  • संदर्भ: दिशा सालियान (सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर) की जून 2020 में हुई मौत की दोबारा जांच के लिए उनके पिता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
  • घटना: 1 अप्रैल 2026 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, वकील निलेश ओझा ने उस हाई कोर्ट जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, जिनके पास यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (Listed) था।
  • एक्शन: बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश मानते हुए अवमानना का मामला दर्ज किया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां

  • बेंच ने वकीलों के कर्तव्यों और न्यायिक स्वतंत्रता पर कई बड़ी बातें कहीं।
  • न्यायिक स्वतंत्रता: “न्यायपालिका की ताकत लोगों के भरोसे और उसकी निष्पक्षता में निहित है। किसी भी जज या संस्था की सत्यनिष्ठा पर बिना किसी आधार के हमला करना गंभीर चिंता का विषय है।”
  • प्रेस कॉन्फ्रेंस बनाम कोर्ट: कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कानूनी आदेश गलत लगता है, तो उसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस करके लंबित मामले को सार्वजनिक करना और जजों पर आरोप लगाना “सनसनीखेज” बनाने की कोशिश है, जो एक वकील के अनुशासन के खिलाफ है।
  • वकील की जिम्मेदारी: “वकील बार के सदस्य और कोर्ट के अधिकारी (Officer of the Court) होते हैं। उन पर संस्था की गरिमा बनाए रखने की ‘उच्च जिम्मेदारी’ होती है।”

आलोचना और अवमानना में अंतर

  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में क्या जायज है और क्या नहीं।
  • जायज: न्यायिक निर्णयों की निष्पक्ष, तर्कसंगत और नेकनीयती (Bona-fide) से की गई आलोचना।
  • नाजायज: जज की नीयत, ईमानदारी या निष्पक्षता पर बिना सबूत के निजी हमला करना।

किसी न्यायिक निर्णय की शुद्धता पर सवाल उठाने और जज को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाकर उन पर इरादे थोपने के बीच एक स्पष्ट अंतर बनाए रखा जाना चाहिए। — सुप्रीम कोर्ट

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
याचिकाकर्तावकील निलेश ओझा।
आरोपप्रेस कॉन्फ्रेंस में सिटिंग जज के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी।
कोर्ट का आदेशयाचिका खारिज; हाई कोर्ट को अवमानना मामले में तेजी से फैसला करने का निर्देश।
मूल सिद्धांतन्यायिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखना।

अनुशासन और नैतिकता

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानूनी पेशे से जुड़े लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बोलने की आजादी का मतलब यह नहीं है कि कोई भी वकील सड़क पर खड़े होकर या प्रेस के सामने जज की ईमानदारी पर सवाल उठाए। न्याय की प्रक्रिया अदालतों के भीतर, कानूनी दलीलों से चलती है, न कि सार्वजनिक चर्चाओं और सनसनीखेज आरोपों से।

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