Security Row: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत को दी गई Z-प्लस’ सुरक्षा (Z-plus Security) के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है।
मकसद और मंशा पर भी गंभीर सवाल उठाए
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस अनिल किलोर की डिवीजन बेंच ने नागपुर निवासी ललन सिंह द्वारा दायर उस याचिका को सुनने से इनकार कर दिया, जिसमें मोहन भागवत की सुरक्षा का खर्च उन्हीं से वसूलने की मांग की गई थी। कोर्ट ने न केवल याचिका को खारिज किया, बल्कि इसे दाखिल करने के पीछे के मकसद और मंशा पर भी गंभीर सवाल उठाए।
याचिकाकर्ता का तर्क: पब्लिक मनी का दुरुपयोग
- याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कई बिंदु रखे थे।
- सुरक्षा खर्च: याचिका में दावा किया गया कि मोहन भागवत की सुरक्षा पर हर महीने ₹40 लाख से ₹45 लाख का खर्च आता है।
- संस्था का स्टेटस: याचिकाकर्ता का कहना था कि चूंकि RSS एक “पंजीकृत (Registered)” संस्था नहीं है, इसलिए उसके प्रमुख को सरकारी खर्च पर VVIP सुरक्षा देना टैक्सपेयर्स के पैसे का दुरुपयोग है।
- अंबानी केस का हवाला: याचिका में 2023 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का जिक्र किया गया जिसमें उद्योगपति मुकेश अंबानी को Z-प्लस सुरक्षा देने की अनुमति तो दी गई थी, लेकिन उसका पूरा खर्च उनके परिवार द्वारा वहन करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट का कड़ा रुख: क्या है असली मंशा?
- बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की ईमानदारी पर संदेह जताया।
- उद्देश्य पर सवाल: कोर्ट ने पूछा कि इस याचिका को दाखिल करने के पीछे असली इरादा क्या है? अक्सर ऐसी याचिकाएं प्रचार पाने या राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दायर की जाती हैं।
- थ्रेट परसेप्शन (Threat Perception): कानूनी रूप से, सुरक्षा किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति या संस्था के पंजीकरण के आधार पर नहीं, बल्कि उसे मिलने वाली धमकियों और खतरों (Threat Assessment) के आधार पर दी जाती है।
मुकेश अंबानी बनाम मोहन भागवत (कानूनी अंतर)
- कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अंबानी मामले और भागवत मामले में एक बड़ा अंतर है।
- निजी बनाम सार्वजनिक व्यक्तित्व: मुकेश अंबानी एक निजी व्यवसायी हैं, जबकि मोहन भागवत एक ऐसे संगठन के प्रमुख हैं जिसका सामाजिक और वैचारिक प्रभाव व्यापक है।
- सरकारी नीति: सरकार की सुरक्षा नीति के तहत, यदि किसी व्यक्ति को उसकी सार्वजनिक भूमिका या संवैधानिक स्थिति के कारण उच्च स्तर का खतरा है, तो राज्य सुरक्षा का खर्च वहन करता है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | ललन सिंह (नागपुर निवासी)। |
| मांग | Z-प्लस सुरक्षा का ₹45 लाख/माह का खर्च मोहन भागवत से वसूलना। |
| कोर्ट का निर्णय | याचिका खारिज; विस्तृत आदेश अभी प्रतीक्षित (Awaited)। |
| बेंच | चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस अनिल किलोर। |
सुरक्षा बनाम पंजीकरण
अदालत का यह फैसला स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को सुरक्षा देना राज्य का ‘प्रशासनिक निर्णय’ है जो सुरक्षा एजेंसियों की खुफिया रिपोर्टों पर आधारित होता है। किसी संगठन का ‘पंजीकृत’ न होना उस व्यक्ति के जीवन को मिलने वाले खतरों को कम नहीं करता। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में ‘जनहित’ के बजाय निजी या राजनीतिक हितों की गूंज अधिक पाई, जिसके कारण इसे शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।

