Wednesday, October 28, 2026
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Judicial Integrity: न्यायिक अधिकारी की पत्नी को अनजान व्यक्ति से ₹7 लाख का उपहार मिला…आय से अधिक संपत्ति मामले में यह हुआ, पढ़ें

Judicial Integrity: गुजरात हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले (Premjibhai Hirabhai Gohil V/s Gujarat State) में एक न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) की आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) मामले में सजा को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट के जस्टिस गीता गोपी की बेंच ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) रहे प्रेमजीभाई हीराभाई गोहिल की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि आरोपी जज यह साबित करने में विफल रहे कि उनकी पत्नी को एक अनजान व्यक्ति से मिला ₹7 लाख का उपहार वैध था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत, एक लोक सेवक के लिए केवल स्पष्टीकरण देना काफी नहीं है, बल्कि संपत्ति के स्रोतों का ऐसा विवरण देना अनिवार्य है जो अदालत का विश्वास जीत सके।

मामला क्या था? (The Case Background)

  • आरोप: जब अपीलकर्ता वलसाड के पारडी में सिविल जज और जेएमएफसी (JMFC) के रूप में कार्यरत थे, तब उन पर रिश्वत लेने और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति जमा करने का आरोप लगा था।
  • विवादित संपत्ति: उन्होंने जूनागढ़ में अचल संपत्ति खरीदी थी, जिसके लिए धन का एक हिस्सा उनकी पत्नी को मिले ₹7 लाख के कथित ‘गिफ्ट’ से आया था।
  • निचली अदालत: ट्रायल कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(e) के तहत दोषी ठहराया था।

गिफ्ट की कहानी और कोर्ट की सख्ती

  • अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि ₹7 लाख का उपहार ‘प्यार और स्नेह’ के कारण दिया गया था, जो सामाजिक संदर्भों में असामान्य नहीं है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस ‘गिफ्ट’ को पूरी तरह फर्जी माना।
  • अजनबी से दान: कोर्ट ने कहा कि दान देने वाला (Donor) न तो कोई खून का रिश्तेदार था और न ही परिवार का करीबी मित्र। बिना किसी ठोस कानूनी या पारिवारिक संबंध के इतना बड़ा उपहार मिलना “विंडफॉल गेन” (अचानक मिला अवैध लाभ) माना जाएगा।
  • गवाहों के विरोधाभास: दान देने वाली महिला के पति ने गवाही दी कि उन्हें पता ही नहीं था कि दान किसे दिया जा रहा है।
  • दानदाता: जिस महिला ने गिफ्ट डीड पर हस्ताक्षर किए थे, उन्होंने कोर्ट में कहा कि उन्होंने अपने बेटे के कहने पर बिना कुछ समझे दस्तखत किए थे।
  • कोर्ट ने माना कि यह एक ‘शैम ट्रांजैक्शन’ (Sham Transaction) था, जिसे काली कमाई को सफेद करने के लिए रचा गया था।

सर्विस रूल्स का उल्लंघन (Rule 19(2))

  • कोर्ट ने ‘गुजरात सिविल सेवा (आचरण) नियमावली, 1971’ का हवाला देते हुए कहा।
  • सूचना का अभाव: नियम 19(2) के तहत किसी भी अचल संपत्ति को खरीदने या उपहार स्वीकार करने से पहले सक्षम प्राधिकारी को पूर्व सूचना देना या अनुमति लेना अनिवार्य है।
  • जज की जिम्मेदारी: चूंकि अपीलकर्ता एक न्यायिक अधिकारी थे, उन पर ईमानदारी और पारदर्शिता का उच्च स्तर बनाए रखने की जिम्मेदारी थी। उन्होंने इस लेन-देन की जानकारी विभाग को नहीं दी थी, जो उनकी “आपराधिक कदाचार” (Criminal Misconduct) की मंशा को दर्शाता है।

“संतोषजनक विवरण” का अर्थ (Satisfactorily Account)

  • हाई कोर्ट ने धारा 13(1)(e) की व्याख्या करते हुए कहा कि लोक सेवक पर बोझ “कठोर” (Stringent) है।
  • आरोपी को केवल यह नहीं कहना है कि “पैसा कहाँ से आया”, बल्कि उसे संतोषजनक ढंग से यह साबित करना होगा कि वह पैसा कानूनी था।
  • यदि स्पष्टीकरण विश्वसनीय नहीं है, तो कोर्ट मान लेगा कि संपत्ति अवैध तरीके से कमाई गई है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
आरोपीप्रेमजीभाई हीराभाई गोहिल (पूर्व सिविल जज)।
मुख्य विवाद₹7 लाख का संदिग्ध गिफ्ट।
कानूनी प्रावधानभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(e)।
कोर्ट का आदेशसजा बरकरार, अपील खारिज।

न्यायपालिका के लिए संदेश

गुजरात हाई कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ का प्रतीक है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि न्याय की कुर्सी पर बैठने वालों को न केवल भ्रष्टाचार से दूर रहना चाहिए, बल्कि उनकी वित्तीय पारदर्शिता भी संदेह से परे होनी चाहिए। “गिफ्ट” के नाम पर अवैध कमाई को छिपाने की कोशिश कानून की नजर में टिक नहीं सकती।

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