Saturday, July 25, 2026
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Shop At Godavari Bhuvan: 1956 के चुनाव प्रचार के लिए मकान मालिक टी.आर. नरावणे ने लिया था दुकान; इस पर 70 साल चली जिरह, पढ़ें

Shop At Godavari Bhuvan:आजाद भारत के शुरुआती चुनावी इतिहास से शुरू हुआ एक कानूनी विवाद लगभग 70 साल (सात दशक) बाद अपने तार्किक अंजाम पर पहुंचा है।

बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश एस. पाटिल की एकल पीठ ने निचली अदालत के पुराने फैसले को बहाल करते हुए माना कि ऐसा कोई भी दस्तावेजी सबूत नहीं है जो यह साबित करे कि किराएदार ने कभी भी स्वेच्छा से अपनी दुकान का मालिकाना हक या किराएदारी को छोड़ा (Surrender) था। अदालत ने आदेश दिया है कि साल 1956 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान चुनावी दफ्तर (Election Office) बनाने के लिए ली गई दुकान को मकान मालिक का परिवार 8 सप्ताह के भीतर मूल किराएदार के वारिसों को वापस सौंपे।

क्या है पूरा मामला? (₹30 महीने के किराए से शुरू हुआ 70 साल का सफर)

1944 में शुरुआत: यह अनोखा और लंबा कानूनी विवाद मुंबई की एक प्राइम लोकेशन की संपत्ति से जुड़ा है। मुंबई के एल.जे. रोड पर स्थित ‘गोदावरी भवन’ में 250 वर्ग फुट की एक दुकान साल 1944 में याचिकाकर्ताओं के पिता को ₹30 प्रति महीने के किराए पर दी गई थी।

चुनावी दफ्तर के लिए मांग (1956): साल 1956 में मूल मकान मालिक टी.आर. नरावणे (TR Naravane) ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए किराएदार से वह दुकान कुछ समय के लिए मांगी। नरावणे बाद में महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी बने।

48 घंटे का लिखित वादा: 19 दिसंबर 1956 को नरावणे ने खुद एक पत्र लिखकर रिकॉर्ड किया था कि किराएदार उन्हें चुनाव प्रचार के लिए 3-4 महीने के लिए यह दुकान देने पर सहमत हुआ है। पत्र में साफ लिखा था कि किराएदार जब भी चाहेगा, महज 48 घंटे के नोटिस पर दुकान उसे वापस कर दी जाएगी।

बदले में मिला सिर्फ एक कमरा: किराएदार के सामान और उसके नौकर को रहने के लिए पास की एक आवासीय इमारत ‘शिवनेरी’ में अस्थाई रूप से एक कमरा दे दिया गया। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद भी मकान मालिक ने दुकान वापस नहीं की।

1998 में मिली जीत, 2001 में पलटा फैसला और फिर 25 साल का इंतजार

स्मॉल कॉजेस कोर्ट (1998): ट्रायल कोर्ट ने 1998 में किराएदार के पक्ष में डिक्री (आदेश) पारित कर दी।

अपीलीय अदालत की ‘विकृत’ दलील (2001): मकान मालिक ने इसके खिलाफ अपील की। अपीलीय अदालत ने 2001 में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और मकान मालिक के इस तर्क को मान लिया कि किराएदार ने खुद ही अपनी किराएदारी सरेंडर कर दी थी।

हाई कोर्ट में 25 साल लंबित: किराएदार ने 2001 में ही बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने तब अंतरिम राहत देते हुए मकान मालिक द्वारा दुकान को किसी तीसरे पक्ष को बेचने या किराए पर देने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद यह मामला पिछले 25 सालों से हाई कोर्ट में लंबित था, जिसका अंतिम फैसला 8 जून को आया।

मुख्य सड़क की दुकान के बदले कोई दूसरी मंजिल का कमरा क्यों लेगा?: हाई कोर्ट

जस्टिस राजेश एस. पाटिल ने अपीलीय अदालत के 2001 के फैसले को ‘विकृत’ (Perverse) करार देते हुए खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने मकान मालिक के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए व्यावहारिक और तार्किक दलीलें पेश कीं।

किराए की रसीदें: कोर्ट ने नोट किया कि 1956 में दुकान का कब्जा लेने के बाद भी मकान मालिक लगातार उस दुकान के नाम पर किराए की रसीदें जारी करता रहा। यदि किराएदारी खत्म हो गई थी, तो रसीदें क्यों दी जा रही थीं?

व्यावहारिक तर्क: कोर्ट ने कहा कि कोई भी समझदार व्यक्ति मुख्य सड़क (Main Road) पर स्थित ग्राउंड फ्लोर की दुकान को हमेशा के लिए छोड़कर किसी अंदरूनी सड़क की आवासीय इमारत की दूसरी मंजिल (Second Floor) पर एक अदना सा कमरा लेने के लिए तैयार नहीं होगा।

मकान मालिक कोई अनपढ़ नहीं था: कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मूल मकान मालिक टी.आर. नरावणे कोई सीधे-साधे ग्रामीण नहीं थे, बल्कि वे एक सुशिक्षित डॉक्टर, बड़े राजनेता और बाद में कैबिनेट मंत्री थे। अगर किराएदारी वास्तव में सरेंडर की गई होती, तो वे इसका एक औपचारिक कानूनी दस्तावेज जरूर बनवाते, जो कि रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है।

विश्लेषण: किराएदारी कानून पर हाई कोर्ट का सख्त रुख

हाई कोर्ट ने साफ किया कि भारत के रेंट लॉ के तहत किसी भी किराएदार को उसकी मर्जी के खिलाफ बेदखल करने के बेहद कड़े नियम हैं।

किराएदारी खत्म होने के वैधानिक तरीकेइस मामले में वास्तविक स्थिति और कोर्ट का आदेश
तरीका 1: बेदखली की डिक्री (Eviction Decree)कोर्ट के माध्यम से मकान मालिक के पक्ष में कानूनी बेदखली का आदेश होना चाहिए। (इस मामले में ऐसा कोई आदेश नहीं था)।
तरीका 2: किराएदारी का समर्पण (Surrender)किराएदार लिखित रूप में स्वेच्छा से अपनी जगह छोड़े। (मकान मालिक इसका कोई सबूत या दस्तावेज पेश नहीं कर सका)।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्देशचूंकि दोनों में से कोई भी स्थिति मौजूद नहीं थी, इसलिए मकान मालिक का कब्जा पूरी तरह अवैध है। कोर्ट ने 1998 की डिक्री बहाल करते हुए 8 सप्ताह में दुकान वापस करने को कहा है।
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