Saturday, July 25, 2026
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Maharashtra Rent Control Act: क्या रेंट लॉ के तहत रिविजनल अथॉरिटी मकान मालिक की याचिका में देरी को माफ कर सकती है?, बड़ी पीठ तय करेगी

Maharashtra Rent Control Act: महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत मकान मालिकों, विशेषकर सशस्त्र बलों के सेवानिवृत्त जवानों के अधिकारों को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल को बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास भेज दिया है।

चेन्नई में रहने वाले एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जयगोपाल नागराजन से जुड़ा मामला

बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस पाटिल ने इस मामले के कागजात बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष भेजने का निर्देश दिया है ताकि वे इस पर निर्णय लेने के लिए एक बड़ी पीठ का गठन कर सकें। दरअसल हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश एस. पाटिल की एकल पीठ ने साल 2011 से लंबित एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कानूनी सवाल (Question of Law) तय किया। यह मामला चेन्नई में रहने वाले एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जयगोपाल नागराजन से जुड़ा है, जो पुणे में स्थित अपने फ्लैट से किरायेदार को बेदखल (Evict) कराने के लिए पिछले 15 से अधिक सालों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या रेंट कंट्रोल कानून के तहत आने वाली ‘पुनरीक्षण संस्था’ (Revisional Authority) के पास मकान मालिक द्वारा 90 दिनों की तय समय-सीमा के बाद दायर की गई रिविजन याचिका में हुई देरी को माफ (Condone Delay) करने का अधिकार है या नहीं।

क्या है पूरा मामला? (एक फौजी का अपने ही घर के लिए संघर्ष)

बेदखली की कार्रवाई (2008): यह मामला सशस्त्र बलों के सदस्यों को अपने मकान का कब्जा वापस पाने के लिए दिए गए विशेष कानूनी संरक्षण से जुड़ा है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल नागराजन ने साल 2008 में महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 23A के तहत सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के सामने किरायेदार को हटाने और बकाया किराये की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया था।

सक्षम प्राधिकारी का फैसला: हालांकि प्राधिकारी ने माना कि फौजी को अपने फ्लैट की वास्तविक (Bona fide) जरूरत है, लेकिन 27 अगस्त 2009 को तकनीकी आधार पर उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उन्होंने आवश्यक प्रमाण पत्र पेश नहीं किया।

12 दिनों की देरी: इस फैसले के खिलाफ सैन्य अधिकारी ने पुणे के एडिशनल कमिश्नर (रिविजनल अथॉरिटी) के सामने पुनरीक्षण याचिका दायर की। चूंकि याचिका दायर करने में 12 दिनों की देरी हो गई थी, इसलिए उन्होंने देरी को माफ करने का आवेदन भी लगाया।

राहत देने से इनकार: एडिशनल कमिश्नर ने देरी को माफ करने से साफ इनकार कर दिया और उनकी मुख्य याचिका को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, जिसके बाद पीड़ित फौजी को बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

किरायेदार और मकान मालिक के लिए कानून का पैमाना एक नहीं हो सकता

जस्टिस राजेश एस. पाटिल ने मामले की गंभीरता और देश की सेवा करने वाले जवानों की दिक्कतों को रेखांकित करते हुए कहा कि कानून में सशस्त्र बलों के लिए विशेष प्रावधान इसीलिए किए गए थे ताकि सेवा की व्यस्तताओं के कारण उन्हें अपने ही घर का कब्जा वापस पाने में कठिनाई न हो।

अदालत ने पुराने कानूनी उदाहरणों (Precedents) का विश्लेषण किया, जिनमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने पहले यह व्यवस्था दी थी कि यदि ‘किरायेदार’ (Tenant) याचिका दायर करने में देरी करता है, तो रेंट अथॉरिटी समय-सीमा को आगे नहीं बढ़ा सकती। लेकिन जस्टिस पाटिल ने एक बेहद बारीक और महत्वपूर्ण अंतर पकड़ते हुए कहा, पुराने सभी फैसले ‘किरायेदारों’ द्वारा दी गई चुनौतियों के संदर्भ में आए थे। उन फैसलों में महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट की पूरी योजना या सशस्त्र बलों जैसे ‘विशेष श्रेणी के मकान मालिकों’ (Special-Category Landlords) की स्थिति पर विचार नहीं किया गया था। इसलिए, वे फैसले स्वचालित रूप से इस मामले पर लागू नहीं किए जा सकते। मकान मालिक की स्थिति को देखते हुए इस प्रक्रिया की ‘सामंजस्यपूर्ण समीक्षा’ (Harmonious Consideration) की जानी बेहद जरूरी है।

डिजिटल विश्लेषण: बड़ी पीठ (Larger Bench) के सामने मुख्य कानूनी सवाल

अदालत ने माना कि यदि किरायेदार को बेदखल करने का आदेश होता है, तो उसके पास 90 दिनों के भीतर अपील का वैधानिक अधिकार होता है। लेकिन यदि मकान मालिक (विशेषकर फौजी) की याचिका खारिज हो जाती है, तो उसके पास सीधे हाई कोर्ट जाने के अलावा कोई सरल रास्ता नहीं बचता। इस विसंगति को दूर करने के लिए हाई कोर्ट ने निम्नलिखित सवाल बड़ी पीठ को भेजा है।

बड़ी पीठ के विचारार्थ मुख्य सवालकानूनी पेचीदगी
“क्या महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट, 1999 की धारा 44 के तहत रिविजनल अथॉरिटी के पास यह शक्ति है कि यदि किसी मकान मालिक द्वारा 90 दिनों की अवधि के बाद रिविजन याचिका दायर की जाती है, तो वह उसमें हुई देरी को माफ कर सके?”कानून की धारा 44 के प्रावधानों के तहत 90 दिनों की एक सख्त समय-सीमा तय की गई है। सवाल यह है कि क्या यह सीमा केवल किरायेदारों को रोकने के लिए है या यह मकान मालिकों के न्याय पाने के अधिकार को भी हमेशा के लिए बंद कर देती है।
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