Wednesday, September 9, 2026
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Digital Arrest Scam: दिल्ली में सबसे बड़ा डिजिटल अरेस्ट…कोर्ट ने कहा- ये केवल प्यादे नहीं, साजिश के अहम पुर्जे हैं, समाज पर पड़ता है गहरा असर

Digital Arrest Scam: दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी के अब तक के सबसे बड़े डिजिटल अरेस्ट घोटाले (Rs 22.92 करोड़) के चार आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने मोहित, विपुल राणा, अशोक कुमार और हिमांशु सिंह की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। यह मामला दक्षिण दिल्ली के एक 78 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंकर से हुई रिकॉर्ड तोड़ ठगी से जुड़ा है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि ये आरोपी इस बड़ी साजिश के ‘महत्वपूर्ण पुर्जे’ (Important Cogs) हैं और उन्हें केवल ‘माइनर प्लेयर’ मानकर राहत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: साजिश का पहिया इनके बिना नहीं घूमता

  • अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कई गंभीर तर्क दिए।
  • संगठित अपराध: कोर्ट ने इसे एक ‘संगठित अपराध’ (Organised Crime) बताया जिसका समाज पर व्यापक असर पड़ता है।
  • भूमिका: जस्टिस जैन ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट घोटाले में हर खिलाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इन्हें केवल ‘म्यूल अकाउंट’ (Mule Account) उपलब्ध कराने वाला कहकर कमतर नहीं आंका जा सकता।
  • जांच पर असर: चूंकि मामले की जांच हाल ही में CBI ने संभाली है, इस मोड़ पर सहानुभूति दिखाने से जांच प्रभावित हो सकती है।

आरोपियों के तर्क बनाम कोर्ट का जवाब

आरोपीबचाव में क्या कहा?कोर्ट की प्रतिक्रिया
मोहितगलती से क्रेडेंशियल साझा किए, मैं परिवार का इकलौता कमाने वाला हूँ।1.90 करोड़ आपके खाते में आए। आप शिकार नहीं, बल्कि कमीशन के लालच में शामिल साझेदार हैं।
अशोक कुमारमैं साधारण किसान परिवार से हूँ, मुझे फंसाया गया। पत्नी लकवाग्रस्त है।व्हाट्सएप चैट बताते हैं कि आप अन्य मुख्य आरोपियों के साथ लगातार संपर्क में थे।
विपुल राणामेरे खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं।CCTV और कॉल रिकॉर्ड बताते हैं कि आप नोएडा के होटल में अन्य साजिशकर्ताओं के साथ थे।
हिमांशु सिंहकेवल CCTV में दिखने से मैं अपराधी नहीं हो जाता।आपकी मौजूदगी साबित हो चुकी है, लेकिन आपने अभी तक अपना मोबाइल डिवाइस नहीं सौंपा है।

डिजिटल अरेस्ट: वरिष्ठ नागरिकों के लिए बढ़ता खतरा

अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कैसे वरिष्ठ नागरिकों की सुभेद्यता (Susceptibility) का फायदा उठाकर उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर डराया और लूटा जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों से जनता का भरोसा टूटता है, इसलिए इनसे ‘अतिरिक्त संवेदनशीलता’ (Extra Sensitivity) के साथ निपटने की जरूरत है।

पीड़ित के लिए दुर्लभ राहत (RBI का दखल)

इस केस में एक सकारात्मक पहलू यह भी रहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी एकीकृत लोकपाल योजना के तहत पांच ‘हितग्राही’ (Beneficiary) बैंकों को निर्देश दिया कि वे पीड़ित नरेश मल्होत्रा को जमा राशि का 5% से 7.5% हिस्सा अदा करें। डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पीड़ित को इस तरह की वित्तीय राहत मिलना बहुत कम देखा गया है।

सतर्कता ही बचाव है

यह केस याद दिलाता है कि साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी रूप से ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी वार कर रहे हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया भारत में मौजूद नहीं है। पुलिस या कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल के जरिए किसी को ‘अरेस्ट’ नहीं करती और न ही पैसे की मांग करती है।

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