Tuesday, August 4, 2026
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Confession in Custody: पुलिस कस्टडी में किया गया खुलासा कोर्ट में सबूत नहीं…POCSO एक्ट पर नई कानूनी व्यवस्था जान लें

Confession in Custody: बॉम्बे हाई कोर्ट जस्टिस संदीपकुमार सी. मोरे और जस्टिस आबासाहेब डी. शिंदे की खंडपीठ ने POCSO एक्ट के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
विवादित साक्ष्यमेडिकल ऑफिसर (PW-8) के सामने आरोपी द्वारा दिया गया इकबालिया बयान।
कानूनी प्रावधानभारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24, 25 और 26।
हाई कोर्ट का निर्णयडॉक्टर को दिया गया बयान ‘इन-एडमिसिबल’ (अमान्य) घोषित।
सजाधारा 6 (गंभीर हमला) से घटाकर धारा 8 (यौन हमला) की गई।

डॉक्टर को बताई गई हिस्ट्री पर जिरह

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस हिरासत में रहते हुए किसी डॉक्टर (Medical Officer) के सामने किया गया ‘इकबालिया बयान’ (Confession) साक्ष्य के रूप में अमान्य है। कोर्ट ने कहा कि जब तक ऐसा बयान मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में न दिया गया हो, इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धाराओं के तहत सबूत नहीं माना जा सकता। यह मामला एक आरोपी की दोषसिद्धि (Conviction) से जुड़ा था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने POCSO की धारा 6 के तहत सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी द्वारा मेडिकल जांच के दौरान डॉक्टर को बताई गई ‘हिस्ट्री’ को उसके अपराध की स्वीकारोक्ति मान लिया था।

मुख्य कानूनी बिंदु: धारा 25 और 26 का प्रभाव

  • अदालत ने ‘एडमिशन’ (Admission) और ‘कन्फेशन’ (Confession) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।
  • हिरासत का असर: चूंकि आरोपी उस समय पुलिस हिरासत में था, इसलिए डॉक्टर को दिया गया कोई भी बयान जिसमें उसने अपना अपराध कबूल किया हो, वह साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 के दायरे में आता है।
  • मजिस्ट्रेट की अनुपस्थिति: कानून कहता है कि पुलिस हिरासत में दिया गया कोई भी इकबालिया बयान तब तक मान्य नहीं है, जब तक कि वह सीधे तौर पर मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में न दिया गया हो।

डॉक्टर पुलिस अधिकारी नहीं, फिर भी प्रतिबंध क्यों?

  • ट्रायल कोर्ट का मानना था कि चूंकि बयान डॉक्टर को दिया गया था न कि पुलिस को, इसलिए यह मान्य है। हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
  • दायरा: धारा 26 का प्रतिबंध केवल पुलिस अधिकारियों तक सीमित नहीं है। यह किसी भी ऐसे व्यक्ति (जैसे डॉक्टर या कोई अन्य) को दिए गए बयान पर लागू होता है, जिसे आरोपी ने पुलिस हिरासत में रहते हुए दिया हो।
  • तर्क: यदि डॉक्टर के सामने दिए गए बयानों को अनुमति दी गई, तो यह कानून द्वारा दिए गए सुरक्षा उपायों (Safeguards) के उद्देश्य को ही खत्म कर देगा।

सजा में बदलाव: धारा 6 से धारा 8 तक

  • कोर्ट ने जब इकबालिया बयान को सबूत की सूची से बाहर कर दिया, तो बाकी बचे साक्ष्यों की जांच की गई।
  • मेडिकल साक्ष्य की कमी: मेडिकल रिपोर्ट में शारीरिक चोट या जबरन यौन संबंध के पुख्ता निशान नहीं मिले थे।
  • दोषसिद्धि में संशोधन: कोर्ट ने पाया कि ‘पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ (धारा 6) साबित नहीं हुआ, लेकिन ‘यौन इरादे से शारीरिक संपर्क’ (धारा 7/8) के सबूत मौजूद थे।
  • नतीजा: कोर्ट ने धारा 6 की सजा को रद्द कर दिया और आरोपी को POCSO की धारा 8 के तहत 5 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।

आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि पुलिस हिरासत के दौरान किसी भी प्रकार के दबाव या प्रभाव में दिए गए बयानों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल न किया जाए। यह फैसला साक्ष्य कानून के उस मूल सिद्धांत को पुख्ता करता है कि इकबालिया बयान केवल पूर्णतः स्वतंत्र और मजिस्ट्रेट की निगरानी वाले वातावरण में ही दर्ज किए जाने चाहिए।

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