Education To children: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय की प्रक्रिया में कार्यपालिका (Executive) की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और अदालत हर मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों को विनियमित (Regulate) करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के पास जाने का निर्देश दिया है। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी, जिसमें देश भर के, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों के गैर-पंजीकृत संस्थानों की निगरानी की मांग की गई थी।
“हम सीधे कार्रवाई नहीं करते” (Conservative Approach)
- जब याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलों पर जोर दिया, तो पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
- परंपरावादी दृष्टिकोण: जजों ने कहा, “आप एक ऐसी बेंच के सामने हैं जो बहुत रूढ़िवादी और पारंपरिक है। हम बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में कोई फैसला (Jump the gun) नहीं लेते।”
- कार्यपालिका का दायित्व: कोर्ट ने कहा कि न्याय केवल कोर्ट से नहीं मिलता, कार्यपालिका को भी अपनी भूमिका निभानी होती है। इसलिए याचिकाकर्ता को पहले सरकार के सामने अपनी बात रखनी चाहिए।
याचिका की मुख्य मांगें और चिंताएं
- अधिवक्ता अश्विनी दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में कई तर्क दिए गए थे।
- अनिवार्य पंजीकरण: 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों का पंजीकरण, मान्यता और निगरानी अनिवार्य हो।
- अनुच्छेद 21A की भावना: याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार), 39(f), 45 और 51-A(k) के तहत राज्य की यह जिम्मेदारी है।
- अनुच्छेद 30 की व्याख्या: याचिकाकर्ता ने मांग की कि कोर्ट यह घोषित करे कि अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों के शिक्षण संस्थान) केवल अनुच्छेद 19(1)(g) का विस्तार है और यह कोई ‘अतिरिक्त विशेषाधिकार’ नहीं देता।
राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘ब्रेनवॉश’ का खतरा
- याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के अपने दौरों का हवाला देते हुए गंभीर चिंताएं जताईं।
- असुरक्षित भविष्य: उन्होंने दावा किया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में बिना किसी प्रभावी निगरानी के गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान फल-फूल रहे हैं।
- हेरफेर का डर: याचिका में कहा गया, “बच्चे राष्ट्र की वृद्धि की रीढ़ हैं और अपनी कोमल उम्र के कारण भोले-भाले होते हैं। बिना पंजीकरण वाले संस्थानों में उनका ‘ब्रेनवॉश’ या हेरफेर किया जा सकता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।”
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य/आदेश |
| याचिकाकर्ता | अश्विनी कुमार उपाध्याय। |
| कोर्ट का आदेश | केंद्र सरकार के सामने अपना प्रतिवेदन (Representation) दें। |
| मुख्य मुद्दा | 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के संस्थानों का नियमन (Regulation)। |
| चिंता का विषय | सीमावर्ती इलाकों में गैर-पंजीकृत संस्थानों का प्रसार। |
| केंद्र को निर्देश | याचिकाकर्ता के 4 फरवरी, 2026 के प्रतिवेदन पर विचार करें और निर्णय से अवगत कराएं। |
नीतिगत मामला बनाम न्यायिक हस्तक्षेप
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि शैक्षणिक संस्थानों की निगरानी और पंजीकरण के नियम बनाना मुख्य रूप से ‘नीतिगत मामला’ (Policy matter) है। कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है, ताकि सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर उचित नियम बना सके।

