Sunday, October 4, 2026
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Alimony Case: पति ने ₹40 लाख एलिमनी के खिलाफ की अपील…जानिए झारखंड हाई कोर्ट ने इसे बढ़ाकर ₹70 लाख क्यों कर दिया; पढ़िए निर्देश

Alimony Case: झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) ने वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ता (Alimony) को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले में वित्तीय सुरक्षा और भविष्य की महंगाई (Inflation) को आधार बनाते हुए यह फैसला दिया। कोर्ट ने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर (Techie) द्वारा दायर उस अपील को न केवल खारिज कर दिया जिसमें उसने ₹40 लाख के मुआवजे को ‘ज्यादा’ बताया था, बल्कि पत्नी की क्रॉस-अपील पर सुनवाई करते हुए इस राशि को बढ़ाकर ₹70 लाख एकमुश्त (Lump sum) कर दिया।

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नवंबर 2019 में हुई थी शादी

यह मामला नवंबर 2019 में शादी के बंधन में बंधे एक जोड़े का है। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया और वे पुणे शिफ्ट हो गए, जहां पति एक सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत था। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए (पति ने मानसिक प्रताड़ना और पत्नी ने विवाहेतर संबंधों के आरोप लगाए)। अंततः, अगस्त 2024 में फैमिली कोर्ट ने विवाह विच्छेद (Divorce) को मंजूरी देते हुए पति को ₹40 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था, जिसे दोनों पक्षों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट ने क्यों बढ़ाई एलिमनी की राशि? (The Key Reasons)

  • उच्च न्यायालय ने राशि को ₹40 लाख से बढ़ाकर ₹70 लाख करने के पीछे निम्नलिखित व्यावहारिक और कानूनी तर्क दिए।
  • 38 वर्षों के भविष्य का आकलन (Life Expectancy Calculation): अदालत ने नोट किया कि पत्नी की वर्तमान आयु 32-33 वर्ष है। भारत में महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) लगभग 70 वर्ष मानते हुए, उन्हें अगले 38 वर्षों तक अपनी आजीविका चलानी है। चूंकि उनके पास आय का कोई अन्य साधन नहीं है, इसलिए वे पूरी तरह इसी राशि पर मिलने वाले ब्याज (Interest) और भविष्य की महंगाई पर निर्भर रहेंगी।
  • माता-पिता के सहारे छोड़ने का तर्क गलत: अदालत ने स्पष्ट किया कि इस धारणा पर गुजारा भत्ता कम या बंद नहीं किया जा सकता कि पत्नी के माता-पिता उसकी मदद कर सकते हैं। यह कानून के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। इस मामले में पत्नी के पिता का देहांत हो चुका था और मां विधवा हैं।
  • समान जीवन स्तर का अधिकार: कोर्ट ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी “उचित आराम” (Reasonable Comfort) के साथ रह सके, और उसे उसी सामाजिक व जीवन स्तर (Status) का अधिकार है जो उसे पति के साथ रहने के दौरान प्राप्त था।

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कोई निश्चित अंकगणितीय फॉर्मूला नहीं (No Arithmetic Formula)

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थायी गुजारा भत्ता तय करने का कोई तयशुदा गणितीय फॉर्मूला नहीं हो सकता। हालांकि, इसे तय करते समय कुछ मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना अनिवार्य है। इसमें पति-पत्नी का सामाजिक स्तर और उनकी जरूरतें और पति की वास्तविक वित्तीय क्षमता और उसकी अन्य जिम्मेदारियां।वर्तमान में पति की मासिक आय ₹2.24 लाख प्रति माह थी। हालांकि पति के वकील ने दलील दी कि उन पर बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी है और वे पुणे में किराए के मकान में रहते हैं, इसलिए ₹40 लाख की राशि भी अधिक थी। लेकिन कोर्ट ने माना कि पति की शैक्षणिक योग्यता, स्थिर आय और पेशेवर पृष्ठभूमि को देखते हुए ₹70 लाख की राशि पूरी तरह न्यायसंगत और उचित है।

भुगतान की समयसीमा (Timeline for Payment)

  • झारखंड उच्च न्यायालय ने टेक इंजीनियर पति को इस राशि का भुगतान करने के लिए एक व्यावहारिक समयसीमा दी है।
  • आदेश: पति को ₹70 लाख की यह संशोधित राशि 12 महीने के भीतर कुल चार किश्तों (4 Instalments) में चुकानी होगी। इसकी पहली किश्त आदेश जारी होने के दो महीने के भीतर जमा करनी अनिवार्य है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुअदालत का कानूनी निष्कर्ष
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद
मूल पारिवारिक अदालत आदेशअगस्त 2024 (विवाह विच्छेद और ₹40 लाख एलिमनी का आदेश)।
पति की वर्तमान आय₹2.24 लाख प्रति माह (सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर)।
हाई कोर्ट का संशोधित आदेशस्थायी गुजारा भत्ता बढ़ाकर ₹70 लाख किया गया।
तर्क का आधारपत्नी की उम्र (32 वर्ष) और अगले 38 वर्षों के जीवन यापन व भविष्य की महंगाई का संतुलन।

महिलाओं को वित्तीय लाचारी से बचाने का संदेश

झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला यह साफ संदेश देता है कि विवाह टूटने की स्थिति में अदालतों का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आश्रित जीवनसाथी (विशेषकर जहां पत्नी कामकाजी नहीं है) अचानक “वित्तीय लाचारी” (Financial Helplessness) या घोर कंगाली के दलदल में न धकेल दी जाए। पति की वित्तीय क्षमता के अनुपात में एक सम्मानजनक गुजारा भत्ता पाना पत्नी का वैधानिक अधिकार है।

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