Wednesday, May 27, 2026
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End of the Bar: वकीलों को डराने-धमकाने की अनुमति किसी भी सरकारी विभाग को नहीं…पेशेवर कर्तव्यों पर अदालत की दो टूक, सभी पढ़ें

End of the Bar: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वकीलों के पेशेवर अधिकारों और स्वायत्तता की रक्षा करते हुए एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।

वकील की याचिका पर सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने अधिवक्ता समर्पण जैन की याचिका को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR), चार्जशीट और कोर्ट के संज्ञान आदेश (Cognizance Order) को पूरी तरह से खारिज (Quash) कर दिया। अदालत ने एक जीएसटी (GST) वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए सख्त टिप्पणी की। कहा, अगर अपने मुवक्किल (Client) के पक्ष में अपील दायर करने जैसे पेशेवर काम के लिए किसी वकील को ही साजिशकर्ता (Conspirator) बना दिया जाएगा, तो यह वकीलों की संस्था (Bar) के अस्तित्व और उनके वकालत करने के अधिकार का अंत (End of the Bar) होगा।

मामले की पृष्ठभूमि (The Dispute Background)

  • याचिकाकर्ता समर्पण जैन इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता (Advocate on Record) हैं और वे मुख्य रूप से डायरेक्ट-इनडायरेक्ट टैक्स और कॉरपोरेट कानून के विशेषज्ञ हैं।
  • अपील और प्री-डिपॉजिट: साल 2025 में उनके एक मुवक्किल पर जीएसटी विभाग ने कई करोड़ रुपये का टैक्स असेसमेंट ऑर्डर थमा दिया था। कानूनन, इस ऑर्डर को चुनौती देने के लिए कुल विवादित टैक्स का 10 प्रतिशत हिस्सा ‘प्री-डिपॉजिट’ (Pre-deposit) के रूप में जमा करना अनिवार्य होता है।
  • वकील का कानूनी कदम: समर्पण जैन ने मुवक्किल के निर्देश पर 15 अगस्त 2025 को ऑनलाइन अपील दायर की। उन्होंने इस 10% प्री-डिपॉजिट का भुगतान करने के लिए मुवक्किल के इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर (Input Tax Credit – ITC) का उपयोग किया।
  • कानूनी तर्क: वकील का तर्क था कि सीबीआईसी (CBIC) के कुछ सर्कुलर और गुजरात हाई कोर्ट के मेसर्स यशो इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम भारत सरकार के फैसले (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था) के तहत आईटीसी (ITC) से प्री-डिपॉजिट का भुगतान करना पूरी तरह वैध है।
  • विभाग की एफआईआर: हालांकि, राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST) विभाग इस तरीके से असहमत था। विभाग ने इसे धोखाधड़ी मानते हुए अक्टूबर 2025 में वकील समर्पण जैन के खिलाफ रामपुर में आपराधिक साजिश (61(2)), धोखाधड़ी (318(4)), जालसाजी (336(3)) और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल (340(2)) की गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करा दी। 14 मई 2026 को रामपुर की मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इस पर संज्ञान भी ले लिया था।

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हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां: यह पूरी तरह एक पेशेवर कृत्य है

  • वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला की दलीलों से सहमत होते हुए हाई कोर्ट ने 21 मई 2026 के अपने आदेश में पुलिस और जीएसटी विभाग की इस कार्रवाई को आपराधिक दायित्व के सभी स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ माना।
  • अपराधियों को भी बचाव का अधिकार: कोर्ट ने कहा, “एक वकील को अपने पेशे के तहत मर्डर, रेप और आतंकी मामलों के आरोपियों का भी कोर्ट में बचाव करने का कानूनी अधिकार और कर्तव्य प्राप्त है। यदि किसी कानूनी राय या अपील दाखिल करने को मुवक्किल के साथ आपराधिक साजिश मान लिया गया, तो एडवोकेट्स एक्ट के तहत वकीलों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।”
  • नागरिकों के अधिकारों पर आघात: पीठ ने रेखांकित किया कि ऐसी स्थिति अप्रत्यक्ष रूप से देश के नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिलने वाले ‘कानूनी सहायता के अधिकार’ से वंचित कर देगी। यदि वकील वकालतनामा साइन करने से पहले खुद के बचाव के बारे में सोचने लगेगा, तो वह मुवक्किल का केस निर्भीकता से कैसे लड़ेगा?
  • राय का सही या गलत होना अपराध नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही जीएसटी उपायुक्त (Deputy Commissioner) को लगता हो कि आईटीसी से टैक्स डेबिट नहीं किया जा सकता था, लेकिन वकील का यह निर्णय कानून की एक खास व्याख्या (Interpretation) पर आधारित था। वह राय सही हो सकती है, गलत हो सकती है या पूरी तरह से गलत हो सकती है लेकिन वह कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक पेशेवर काम था, जिसका मुवक्किल के व्यवसाय से कोई लेना-देना नहीं था।

अदालत का अंतिम संदेश

हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि एक वकील को अदालत के भीतर बिना किसी डर के काम करने और अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने की उतनी ही आजादी है, जितनी आजादी राज्य के किसी सरकारी अधिकारी को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए मिलती है। पुलिस या कोई विभाग किसी वकील को सिर्फ इसलिए निशाना नहीं बना सकता क्योंकि उसने अपने मुवक्किल के पक्ष में एक मजबूत या अलग कानूनी रुख अपनाया था।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
हाई कोर्ट बेंचजस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना
याचिकाकर्ता (वकील)समर्पण जैन (इलाहाबाद हाई कोर्ट)
विवादित विषयजीएसटी अपील में 10% प्री-डिपॉजिट के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का उपयोग करना।
लगाई गई धाराएंआपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और मूल्यवान प्रतिभूतियों की जालसाजी।
कोर्ट का अंतिम फैसलाएफआईआर और चार्जशीट पूरी तरह से खारिज (Quashed)
मुख्य कानूनी सिद्धांतवकील द्वारा दी गई कानूनी राय या की गई कानूनी पैरवी उसे मुवक्किल का सह-साजिशकर्ता नहीं बनाती।

निष्कर्ष (Takeaway)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला देश भर के कानूनी पेशेवरों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है। हाल के दिनों में जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को उनके मुवक्किलों के कथित वित्तीय अपराधों में घसीटने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस आदेश ने साफ कर दिया है कि वकीलों की निर्भीकता (Fearlessness of the Bar) भारतीय न्याय व्यवस्था की रीढ़ है, और कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग करके वकीलों को डराने-धमकाने की अनुमति किसी भी सरकारी विभाग को नहीं दी जा सकती।

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