Digital Ban: राजस्थान हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सोशल मीडिया के जरिए होने वाले अपराधों को रोकने के बीच संतुलन बनाने वाला एक बेहद अनोखा और कड़ा फैसला सुनाया है।
साइबर स्टॉकर की जमानत याचिका पर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने नए आपराधिक कानून यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज इस मामले की सुनवाई करते हुए यह ‘डिजिटल प्रतिबंध’ लगाने वाले आदेश दिए। अदालत ने बीकानेर के एक कथित साइबर स्टॉकर (Cyber Stalker) को जमानत तो दे दी है, लेकिन उस पर एक साल तक फेसबुक, इंस्टाग्राम समेत किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है।
मामला क्या था? (Factual Background)
- यह मामला बीकानेर का है, जहाँ एक नाबालिग लड़की के पिता ने 22 फरवरी को प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी।
- आरोप: आरोप के अनुसार, अभियुक्त ने 1 फरवरी से 20 फरवरी के बीच नाबालिग लड़की को सोशल मीडिया के जरिए लगातार ट्रैक (Cyber Stalking) किया, उसे अवांछित संदेश भेजे और उसका यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) किया।
- गिरफ्तारी और धाराएं: आरोपी को 24 फरवरी को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने जांच पूरी कर उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 78(2) (पीछा करना/Stalking), धारा 79 (महिला की शालीनता को ठेस पहुंचाना) और पोक्सो एक्ट की धारा 11 व 12 के तहत आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल किया था।
हाई कोर्ट की अनोखी और सख्त जमानत शर्तें (The Unusual Bail Conditions)
शर्त: जस्टिस अशोक कुमार जैन ने 21 मई 2026 को याचिकाकर्ता को ₹50,000 के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो गारंटियों (Sureties) पर जमानत देते हुए सख्त शर्तें लागू कीं।
एक साल का डिजिटल वनवास: “याचिकाकर्ता को एक वर्ष की अवधि के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट, थ्रेड्स, शेयरचैट आदि जैसे सभी प्रकार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से प्रतिबंधित किया जाता है।”
फर्जी आईडी पर भी नजर: कोर्ट ने साफ किया कि यदि वह इस एक वर्ष के दौरान अपने असली नाम या किसी भी काल्पनिक/फर्जी नाम (Fictitious Name) से, अपने मोबाइल या किसी अन्य ईमेल आईडी का उपयोग कर सोशल मीडिया पर सक्रिय पाया गया, तो उसका जमानत आदेश तुरंत रद्द (Recall) कर दिया जाएगा।
पीड़िता से पूर्ण अलगाव: आरोपी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पीड़िता या उसके परिवार से कोई संपर्क नहीं करेगा। वह व्हाट्सएप, फेसबुक मैसेंजर या किसी भी अन्य माध्यम से कोई संदेश नहीं भेजेगा।
सबूतों के साथ छेड़छाड़ पर रोक: वह गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा और बाहर रहकर किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में संलिप्त नहीं होगा।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
बचाव पक्ष (Defence Argument): आरोपी के वकील ने दलील दी कि पूरा मामला केवल मौखिक आरोपों पर आधारित है और एफआईआर के समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई है। चूंकि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, इसलिए अब अभियुक्त को हिरासत में रखने की कोई आवश्यकता नहीं है।
अभियोजन और पीड़िता का विरोध: शिकायतकर्ता के वकील अधिवक्ता मुकुल कृष्ण व्यास और सरकारी वकील (Public Prosecutor) ललित किशोर सेन ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आरोपी ने दुर्भावनापूर्ण और यौन इरादे से पीड़िता को इस कदर प्रताड़ित किया कि उसका सामान्य जीवन जीना दूभर हो गया। आरोपी के इस कृत्य ने नाबालिग बच्ची को ‘मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से खतरे’ (Psychologically Endangered) में डाल दिया था।
हाई कोर्ट ने जमानत क्यों दी?
गंभीर आरोपों के बावजूद, हाई कोर्ट ने व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी पहले ही एक अच्छा-खासा समय जेल (Custody) में बिता चुका है। मामले की अदालती सुनवाई (Trial) पूरी होने में लंबा समय लगने की संभावना है। अतः, मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई टिप्पणी किए बिना, कोर्ट ने पीड़िता की सुरक्षा के लिए कड़े सुरक्षात्मक उपाय (सोशल मीडिया बैन) अपनाते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अशोक कुमार जैन (राजस्थान हाई कोर्ट) |
| दोषी पर मुख्य प्रतिबंध | 1 वर्ष तक किसी भी सोशल मीडिया (FB, Insta, Snapchat आदि) के उपयोग पर पूर्ण रोक। |
| नए कानून की धाराएं | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 78(2) और 79; पोक्सो एक्ट की धारा 11 और 12 |
| उल्लंघन का परिणाम | शर्तों के टूटने पर जमानत स्वतः रद्द (Cancel) करने का प्रावधान। |
निष्कर्ष (Takeaway)
राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला देश में बढ़ते डिजिटल और ऑनलाइन अपराधों से निपटने की दिशा में भारतीय न्यायपालिका के बदलते रुख को दिखाता है। वर्तमान समय में जब सोशल मीडिया और स्मार्टफोन उत्पीड़न का मुख्य जरिया बनते जा रहे हैं, तब पारंपरिक शर्तों (जैसे केवल थाने में हाजिरी लगाना) के बजाय अपराध के टूल (Tool of Crime) यानी सोशल मीडिया पर ही प्रतिबंध लगा देना” एक व्यावहारिक और स्वागत योग्य कदम है। यह आदेश इस कानूनी बहस को भी जन्म देगा कि क्या भविष्य में साइबर स्टॉकिंग के मामलों में ऐसे ‘डिजिटल प्रतिबंध’ जमानत की एक सामान्य शर्त बन जाने चाहिए।

