Wednesday, May 27, 2026
HomeHigh CourtArmy of the Bench: न्यायाधीश अपना दर्द या पीड़ा व्यक्त नहीं कर...

Army of the Bench: न्यायाधीश अपना दर्द या पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकते…तब वकीलों को क्यों कहा बेंच की सेना, पढ़े यह संवेदनशील टिप्पणी

Army of the Bench: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने न्यायपालिका और वकीलों के आपसी संबंधों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी की है।

उप्र बार एसोसिएशन के कामकाज को लेकर सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के बार एसोसिएशनों के कामकाज और उनके उप-नियमों (Bye-laws) में कमियों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया। अदालत ने अधिवक्ताओं (Advocates) को “बेंच की सेना” (Army of the Bench) बताते हुए कहा कि न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से अपना दर्द या पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकते, ऐसे में केवल वकीलों की संस्था (Bar) ही उनके बचाव और सम्मान की रक्षा के लिए आगे आ सकती है।

हाई कोर्ट की मुख्य और तल्ख टिप्पणियां

  • अदालत ने चंद्रशेखर उपाध्याय, अधिवक्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में 20 मई 2026 को फैसला सुनाते हुए वकीलों के कर्तव्यों को रेखांकित किया।
  • न्यायाधीशों का सुरक्षा कवच: कोर्ट ने कहा, “बार, बेंच की ‘सेना’ है। न्यायाधीशों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे केवल अपने फैसलों के माध्यम से ही बोलें। कई बार वे सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते, तब केवल बार ही उनके बचाव में आ सकता है।
  • न्याय व्यवस्था की रक्षा: बेंच के अनुसार, बार का यह गरिमापूर्ण दर्जा ही न्याय प्रणाली को उन ‘विभिन्न बुराइयों’ से बचाता है जो न्याय वितरण में बाधा डालती हैं। यह सुनिश्चित करना वकीलों का काम है कि न्यायाधीशों को प्रभावित करने के लिए किसी भी अवैध या अनुचित माध्यम का उपयोग न हो।
  • मर्यादित आचरण की आवश्यकता: अदालत ने स्पष्ट किया कि वकीलों को पत्राचार में संयमित भाषा का उपयोग करना चाहिए, मुकदमों में अपमानजनक हमलों से बचना चाहिए और बहस के दौरान अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अनुशासनहीन या कोर्ट में नियमित अभ्यास न करने वाले (Non-practicing) वकील इन मानकों को बनाए नहीं रख सकते।

बार चुनावों के विवादों पर कोर्ट का सख्त रुख

हाई कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि अदालतें विभिन्न बार एसोसिएशनों के आंतरिक चुनावी विवादों से जुड़ी याचिकाओं से पटी पड़ी हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से ‘एल्डर्स कमेटी’ (Elders Committee) के गठन में पैदा होने वाले गतिरोधों को नोट किया, जिसका मुख्य काम पदाधिकारियों का कार्यकाल समाप्त होने पर चुनाव कराना होता है।

विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए दिशा-निर्देश

स्टेट बार काउंसिल की शक्तियों पर सीमा: यदि एल्डर्स कमेटी के सदस्यों के बीच वरिष्ठता (Seniority) को लेकर कोई विवाद होता है, तो राज्य बार काउंसिल (State Bar Council) केवल वरिष्ठता का निर्धारण कर सकती है। बार काउंसिल किसी भी परिस्थिति में चुनाव स्थगित (Postpone) करने का निर्देश जारी नहीं कर सकती। चुनाव टालने का निर्णय केवल एल्डर्स कमेटी के अध्यक्ष या तीन सबसे वरिष्ठ सदस्य ही ले सकते हैं।

एल्डर्स कमेटी का स्वरूप और वित्तीय शक्तियां: हाई कोर्ट बार के लिए: एल्डर्स कमेटी एक स्थायी संस्था होगी, जिसमें हाई कोर्ट में सक्रिय रूप से वकालत करने वाले 5 सबसे वरिष्ठ नामित अधिवक्ता (Designated Senior Advocates) शामिल होंगे। इसके लिए हाई कोर्ट द्वारा बनाए रखी जाने वाली वरिष्ठता सूची का कड़ाई से पालन होगा।

जिला अदालतों (District Courts) के लिए: सदस्यों की वरिष्ठता उनके नामांकन की तारीख (Date of Enrollment) से तय होगी, बशर्ते उनके पास कम से कम 10 वर्ष का नियमित अभ्यास (Regular Practice) का अनुभव हो।

सीमित अधिकार: एल्डर्स कमेटी बार एसोसिएशन की चल-अचल संपत्तियों पर कोई बड़ा वित्तीय निर्णय नहीं ले सकती। उसके पास केवल दैनिक कामकाज और चुनाव कराने के लिए आवश्यक सीमित वित्तीय शक्तियां ही होंगी।

चुनाव के बाद रोटेशन की प्रक्रिया

कोर्ट ने निर्देश दिया कि चुनाव संपन्न होने के बाद कार्यभार नई चुनी हुई समिति को सौंप दिया जाएगा। इसके बाद, एल्डर्स कमेटी के सबसे वरिष्ठ सदस्य (यानी अध्यक्ष) सेवानिवृत्त (Retire) हो जाएंगे और उनके स्थान पर अगले सबसे वरिष्ठ सदस्य को कमेटी में शामिल (Induct) कर लिया जाएगा।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
हाई कोर्ट बेंचजस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
मुख्य मामलाचंद्रशेखर उपाध्याय (अधिवक्ता) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [बार एसोसिएशन चुनावी विवाद]
वकीलों को दी गई संज्ञा“बेंच की सेना” (Army of the Bench)
एल्डर्स कमेटी का नियम5 सबसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं की स्थायी कमेटी; वित्तीय अधिकारों पर पाबंदी।
बार काउंसिल पर रोकराज्य बार काउंसिल को बार एसोसिएशन के चुनाव स्थगित करने का कोई अधिकार नहीं।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह फैसला बार और बेंच के बीच के उस पवित्र और अटूट रिश्ते को याद दिलाता है जो भारतीय न्यायपालिका का आधार स्तंभ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि वकीलों का काम सिर्फ अपने मुवक्किल का पक्ष रखना नहीं, बल्कि कोर्ट की गरिमा और न्यायाधीशों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है। इसके साथ ही, बार एसोसिएशनों के भीतर होने वाली गुटबाजी और चुनावी राजनीति पर लगाम लगाने के लिए कोर्ट द्वारा तय किए गए नियम भविष्य में अदालतों का समय बचाएंगे और बार की शुचिता को बनाए रखेंगे।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
haze
33 ° C
33 °
33 °
55 %
4.1kmh
1 %
Wed
43 °
Thu
41 °
Fri
39 °
Sat
39 °
Sun
42 °

Recent Comments