Release Of Prisoners: दिल्ली हाई कोर्ट ने कैदियों की रिहाई में होने वाली प्रशासनिक देरी को खत्म करने के लिए एक बेहद व्यावहारिक और तकनीकी समाधान अपनाने का निर्देश दिया है।
जमानत मिलने के बावजूद रिहाई में हो रही देरी
हाईकोर्ट के जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने यह ऐतिहासिक आदेश जारी किया। कोर्ट ने पाया कि जमानत मिलने के बावजूद कई बार कैदियों को जेल से बाहर आने में 50 दिनों से भी अधिक का समय लग जाता है, जो उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। अदालत ने दिल्ली के सभी जेल अधीक्षकों (Jail Superintendents) को आदेश दिया है कि वे जमानत (Bail) मिलने के बाद कैदियों की तेजी से रिहाई सुनिश्चित करने के लिए आधार क्यूआर कोड वेरिफिकेशन ऐप्स (Aadhaar QR Code Verification Applications) का अनिवार्य रूप से उपयोग करें।
मामला क्या था? (The Catalyst for the Order)
खुद संज्ञान लिया: यह पूरा मामला हाई कोर्ट द्वारा खुद संज्ञान (Suo Motu Case) लेने के बाद शुरू हुआ था। अदालत के सामने एक ऐसा मामला आया था जहां एक कैदी को जमानत मिलने के एक हफ्ते बाद भी सिर्फ इसलिए जेल में बंद रखा गया क्योंकि जेल अधीक्षक ने सत्यापन (Verification) की औपचारिकताएं पूरी नहीं की थीं।
देरी के चौंकाने वाले आंकड़े: अदालत के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों से पता चला कि 1 फरवरी से 15 फरवरी 2026 के बीच जमानत आदेश के बाद कैदियों को रिहा करने में औसतन 5 से 6 दिन का समय लग रहा था। कुछ मामलों में यह देरी 33 दिन से लेकर 56 दिन तक पहुंच गई।
देरी का कारण: इस अत्यधिक देरी के पीछे का मुख्य कारण ‘जमानतदारों’ (Sureties) की पहचान, उनके दस्तावेजों का अंतर-राज्यीय सत्यापन (Inter-state Verification) और उनके द्वारा जमा किए गए वित्तीय दस्तावेजों (जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट या बैंक गारंटी) की जांच में लगने वाला समय था।
हाई कोर्ट के नए दिशा-निर्देश (The Court’s Directives)
आधुनिक तकनीक: अदालत ने साफ किया कि जमानतदारों की साख (Credentials) की जांच में लगने वाले समय को कम करने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लेना अनिवार्य है। कोर्ट ने निम्नलिखित कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
इन 3 मोबाइल ऐप्स का होगा इस्तेमाल: भविष्य में दिल्ली की सभी जेलों में जमानतदारों के कार्ड पर मौजूद ‘सिक्योर क्यूआर कोड’ को स्कैन करके उनकी पहचान तुरंत सत्यापित की जाएगी। इसके लिए कोर्ट ने तीन आधिकारिक ऐप्स को अधिकृत किया है, इनमें आधार क्यूआर स्कैनर ऐप (Aadhaar QR Scanner App), एम-आधार ऐप (mAadhaar App) व आधार ऐप (Aadhaar App) शामिल हैं। यदि इन ऐप्स के जरिए विवरण प्राप्त करने के बाद भी किसी अतिरिक्त जांच की आवश्यकता होती है, तो जेल अधिकारियों को उसे भी बिना समय गंवाए तेजी से पूरा करना होगा।
वित्तीय दस्तावेजों (FD) के सत्यापन के लिए नियम: अदालत ने निर्देश दिया कि यदि जमानत के तौर पर कोई फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) या अन्य मौद्रिक दस्तावेज जमा किया जाता है। जेल अधीक्षक संबंधित बैंकों को ईमेल (Email) के जरिए सत्यापन के लिए भेजेंगे। संबंधित बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे इन ईमेल का तुरंत और प्राथमिकता के आधार पर जवाब दें। जेल अधीक्षक बैंकों को इस संबंध में हाई कोर्ट के आदेश की प्रति भी भेज सकते हैं ताकि बैंक प्रक्रिया में देरी न करें।
देश भर की जेलों में लागू होगी तकनीक: UIDAI से मांगा जवाब
- सुनवाई के दौरान भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) के अधिकारियों ने कोर्ट को एक महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस तकनीक का उपयोग पहले से ही देश भर की कई जेलों में ‘आगंतुकों’ (Visitors/मुलाकाती) के प्रमाणीकरण के लिए किया जा रहा है। अधिकारियों ने कोर्ट रूम में मोबाइल ऐप्स के जरिए क्यूआर कोड को तुरंत स्कैन करके लाइव प्रदर्शन (Demonstration) भी दिखाया।
- इस जानकारी के बाद, दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले का दायरा बढ़ाते हुए UIDAI को एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में UIDAI को यह बताना होगा कि देश के विभिन्न हाई कोर्ट्स के निर्देशों के बाद, देश भर की जेलों और ट्रायल कोर्ट्स (निचली अदालतों) में इस सत्यापन व्यवस्था को किस प्रकार और किस स्तर तक लागू किया जा रहा है।
मामले की कानूनी पैरवी (Legal Representation)
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता पुनीत मित्तल (सहायता: अधिवक्ता आर.पी. सिंह)।
- राज्य सरकार (अभियोजन) की ओर से: अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता (अपराधिक) अमोल सिन्हा और अधिवक्ता क्षितिज गर्ग।
- UIDAI की ओर से: अधिवक्ता सुशील राजा।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| हाई कोर्ट बेंच | जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस अमित महाजन (दिल्ली उच्च न्यायालय) |
| आदेश की तारीख | 22 मई 2026 |
| मूल समस्या | जमानत मिलने के बाद भी कागजी सत्यापन के कारण रिहाई में 50+ दिनों की देरी होना। |
| तकनीकी समाधान | जमानतदारों के सुरक्षित क्यूआर कोड को 3 विशिष्ट मोबाइल ऐप्स से स्कैन करना। |
| बैंकों को निर्देश | ईमेल के जरिए आने वाले एफडी (FD) वेरिफिकेशन का तुरंत जवाब देना अनिवार्य। |
निष्कर्ष (Takeaway)
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला विचाराधीन कैदियों (Undertrials) और न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है। भारत की जेलों में एक बड़ी आबादी ऐसे कैदियों की है जिन्हें अदालत से जमानत तो मिल चुकी है, लेकिन सिर्फ इसलिए वे सलाखों के पीछे सड़ रहे हैं क्योंकि उनके कागजात सत्यापित नहीं हो पाए हैं। क्यूआर कोड स्कैनिंग जैसी त्वरित तकनीक को प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाकर कोर्ट ने न केवल जेलों का बोझ कम करने का रास्ता साफ किया है, बल्कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) के अधिकार को भी मजबूती दी है।

