Long Trial: उड़ीसा हाई कोर्ट (Orissa High Court) ने करीब 40 साल पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में मानवीय और सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है।
पंचायत फंड की हेराफेरी के मामले में एक पूर्व सरपंच की दोषसिद्धि बरकरार
हाईकोर्ट के जस्टिस सिबो संकर मिश्रा की एकल पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए टिप्पणी की कि इस दौरान पुल के नीचे से बहुत पानी बह चुका है और ऐसे लंबे खिंचे मामलों में केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) अपनाना न्यायोचित होगा। अदालत ने 20,500 रुपये के पंचायत फंड की हेराफेरी के मामले में एक पूर्व सरपंच की दोषसिद्धि (Conviction) को तो बरकरार रखा, लेकिन उनकी 75 वर्ष की उन्नत आयु और 4 दशक लंबी कानूनी लड़ाई को देखते हुए उनकी जेल की सजा को घटाकर केवल एक महीना कर दिया है।
मामला क्या था? (20,500 रुपये और 39 साल का सफर)
आरोप: यह मामला साल 1987 का है, जब संबलपुर जिले की सरधापाली ग्राम पंचायत के तत्कालीन सरपंच खागेश्वर सा (Khageswar Sa) और पंचायत सचिव कौतुक बेहरा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
भ्रष्टाचार के मुख्य आरोप: फंड की निकासी: विजिलेंस जांच में सामने आया कि 26 मई 1987 को सरपंच और सचिव ने पंचायत के खाते से 5,000 रुपये और 28 मई 1987 को 15,000 रुपये निकाले। यह राशि पदमपुर के एक को-ऑपरेटिव बैंक में जमा की जानी थी।
हेराफेरी: कैश बुक में प्रविष्टि (Entry) तो की गई, लेकिन सरपंच ने पासबुक और कुल 20,000 रुपये की राशि अपने पास ही रख ली और उसे बैंक में जमा नहीं कराया। 8 जुलाई 1987 को ऑडिट के दौरान इस गबन का खुलासा हुआ।
मछली पालन का ठेका: इसके अलावा, सरपंच पर आरोप था कि उसने पंचायत के एक तालाब में मछली पकड़ने के अधिकार (Fishing Rights) देने के बदले एक चपरासी से 500 रुपये नकद लिए, लेकिन उसे भी पंचायत फंड में जमा नहीं कराया। इस प्रकार, कुल 20,500 रुपये के गबन के आरोप में 1 दिसंबर 1987 को विजिलेंस ने एफआईआर (FIR) दर्ज की थी।
निचली अदालत का फैसला (2000)
विजिलेंस जांच और लंबी सुनवाई के बाद, 18 अगस्त 2000 को निचली अदालत (Trial Court) ने अपना फैसला सुनाया। मुख्य आरोपी सरपंच खागेश्वर सा को ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ (Prevention of Corruption Act) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दोषी पाते हुए 3-3 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। सह-आरोपी पंचायत सचिव कौतुक बेहरा को सबूतों के अभाव में बरी (Acquit) कर दिया गया। इस सजा के खिलाफ पूर्व सरपंच ने साल 2000 में ही उड़ीसा हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जो पिछले 26 सालों से लंबित थी।
हाई कोर्ट का सुधारात्मक और दयालु रुख
अपील: हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान पूर्व सरपंच के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता डी.पी. ढाल ने केस की मेरिट (गुण-दोष) पर बहस करने के बजाय केवल सजा की अवधि को कम करने (Quantum of Sentence) पर जोर दिया।
बचाव पक्ष के तर्क: घटना के समय (1987) याचिकाकर्ता की उम्र करीब 30 वर्ष थी, लेकिन आज वह 75 वर्ष के बुजुर्ग हो चुके हैं। पिछले 39 वर्षों से वे आपराधिक कार्यवाही और अदालती चक्करों के कारण अत्यधिक मानसिक पीड़ा और कठिनाई का सामना कर चुके हैं। उनका कोई पुराना आपराधिक इतिहास (Criminal Antecedents) नहीं रहा है। राज्य सरकार के वकील एम.एस. रिज़वी ने इस ढील का विरोध किया, लेकिन अदालत ने बचाव पक्ष के तर्कों में मानवीय आधार पाया।
हाई कोर्ट की टिप्पणियां और संशोधित सजा: जस्टिस सिबो संकर मिश्रा ने कहा कि आरोपी करीब चार दशकों से आपराधिक कार्यवाही की “परछाई” में रह रहा है। इतनी लंबी कानूनी प्रक्रिया खुद में एक सजा जैसी है। इसलिए सजा के दंडात्मक तत्व को पूरी तरह से खत्म किए बिना (ताकि कानून का इकबाल बना रहे), इसे कम करना उचित होगा।
अदालत ने सजा को संशोधित कर दिया आदेश
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत: 3 साल की सजा को घटाकर केवल एक सप्ताह का कठोर कारावास और 5,000 रुपये जुर्माना किया गया।
- IPC के तहत: 3 साल की सजा को घटाकर एक महीने का साधारण कारावास और 25,000 रुपये जुर्माना किया गया।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस सिबो संकर मिश्रा (उड़ीसा हाई कोर्ट) |
| फैसले की तारीख | 22 मई 2026 |
| मुख्य याचिकाकर्ता | खागेश्वर सा (75 वर्षीय पूर्व सरपंच) |
| विवादित राशि | ₹20,500 (वर्ष 1987 का मामला) |
| कानूनी यात्रा | 1987 (FIR) ➔ 2000 (निचली अदालत से 3 साल जेल) ➔ 2026 (हाई कोर्ट से 1 महीना जेल) |
| अदालत का सिद्धांत | अत्यधिक देरी और उन्नत आयु होने पर विशुद्ध दंडात्मक के बजाय सुधारात्मक (Reformative) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला भारतीय न्यायिक प्रणाली में लगने वाले अत्यधिक समय (Judicial Delay) और उसके मानवीय पहलुओं को उजागर करता है। यद्यपि भ्रष्टाचार के मामलों में अदालतें सख्त रुख अपनाती हैं, लेकिन 20 हजार रुपये के मामले में किसी व्यक्ति को 39 साल तक अदालत के चक्कर कटवाना और फिर 75 साल की उम्र में 3 साल के लिए जेल भेजना न्याय की मूल भावना के विपरीत होता। उड़ीसा हाई कोर्ट ने सजा को एक महीने तक सीमित करके न केवल कानून के नियम को बनाए रखा, बल्कि एक बुजुर्ग नागरिक के प्रति मानवीय संवेदना भी प्रकट की है।

