Friday, May 29, 2026
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Nude Video: एआई की मदद से नाबालिग की अश्लील तस्वीरें बना डाली…देखिए यौन उत्पीड़न करनेवाले आरोपी को क्या निर्देश दिया, पढ़े यह केस

Nude Video: गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक बेहद संगीन और आधुनिक तकनीक के दुरुपयोग से जुड़े मामले में कड़ा रुख अपनाया है।

युवक की जमानत याचिका खारिज की

हाईकोर्ट के जस्टिस अंजन मोनी कलिता की एकल पीठ ने 25 मई 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) पर्याप्त और पुख्ता सबूत मौजूद हैं, इसलिए इस चरण पर उसे जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालत ने एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की की एआई-जनरेटेड (AI-Generated/Artificial Intelligence) अश्लील तस्वीरें बनाने, उसका यौन उत्पीड़न करने और फिर उन तस्वीरों व वीडियो के जरिए उसे ब्लैकमेल करने के आरोपी 24 वर्षीय युवक की जमानत याचिका (Bail Plea) को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

मामला और अभियोजन पक्ष के आरोप (The Horrific Case)

पॉक्सो केस: यह मामला साल 2025 में पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। यह मामला स्पेशल पोक्सो केस नंबर 278/2025 के तहत पोक्सो अधिनियम की धारा 6 (गंभीर मर्मभेदी यौन हमला) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 67A (अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण) के तहत दर्ज है।

एआई (AI) तकनीक का दुरुपयोग: आरोपी ने पीड़िता की चेहरे की असली तस्वीर का इस्तेमाल करके कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए उसकी ‘न्यूड’ (Nude) तस्वीरें और आपत्तिजनक वीडियो तैयार किए।

सहपाठियों में प्रसार और ब्लैकमेल: जब पीड़िता कक्षा 8 में थी, तब से आरोपी उसे ये तस्वीरें भेजकर मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहा था। आरोपी ने वे अश्लील तस्वीरें लड़की के क्लासमेट्स (सहपाठियों) को भी भेज दीं।

गुप्त रिकॉर्डिंग और यौन उत्पीड़न: शुरुआत में आरोपी की पहचान नहीं हो पाई थी। बाद में आरोपी ने लड़की का जबरन यौन उत्पीड़न किया और उस दौरान चुपके से एक वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। साल 2024 और 2025 में उसने इसी वीडियो के दम पर बच्ची को लगातार ब्लैकमेल किया और कई बार उसका यौन शोषण किया।

गंभीर मानसिक तनाव: आरोपी लगातार धमकी दे रहा था कि अगर परिवार ने कानूनी कार्रवाई की तो वह गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। इस वजह से नाबालिग बच्ची गहरे मानसिक अवसाद (Severe Emotional Distress) में चली गई और उसकी पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो गई।

हाई कोर्ट की विधिक टिप्पणियां और जांच

दलील: सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि लड़की के पिता ने झूठी एफआईआर दर्ज कराई है। हालांकि, हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड (TCR) का बारीकी से अध्ययन करने के बाद इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।

पर्याप्त आपत्तिजनक सामग्री मौजूद: अदालत ने पीड़ित बच्ची, उसके पिता (शिकायतकर्ता) और अन्य गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कहा, ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 183 (पूर्व में CrPC की धारा 164 – मजिस्ट्रेट के सामने बयान) के तहत दर्ज बयानों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त आपत्तिजनक सामग्रियां (Incriminating Materials) उपलब्ध हैं जो सीधे उसकी तरफ उंगली उठाती हैं।

गिरफ्तारी की प्रक्रिया पूरी तरह वैध: अदालत ने यह भी जांचा कि क्या पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार करते समय नए आपराधिक कानून के नियमों का पालन किया था। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने BNSS, 2023 की धारा 36 (गिरफ्तारी की प्रक्रिया), धारा 47 (गिरफ्तारी के आधार बताना) और धारा 48 (रिश्तेदारों को सूचित करना) का पूरी तरह पालन किया था। अरेस्ट मेमो नियमानुसार तैयार था और आरोपी के पिता को समय पर सूचना दी गई थी।

आरोप तय हो चुके हैं और ट्रायल जारी है: अदालत ने नोट किया कि ट्रायल कोर्ट में आरोपी के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप (Charges) पहले ही तय किए जा चुके हैं। पीड़िता और उसके पिता भी लगातार कोर्ट की कार्यवाही और ट्रायल में हिस्सा ले रहे हैं। ऐसे समय में आरोपी को बाहर भेजने से गवाहों या ट्रायल पर असर पड़ सकता है।

बीमारी और सर्जरी पर जेल प्रशासन को निर्देश

  • आरोपी की जमानत याचिका में एक आधार यह भी बनाया गया था कि वह किडनी स्टोन (गुर्दे की पथरी) की बीमारी से पीड़ित है और उसे इलाज के लिए सर्जरी (ऑपरेशन) की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • हाई कोर्ट ने इस आधार पर जमानत देने से तो इनकार कर दिया, लेकिन जेल प्रशासन को मानवीय आधार पर कड़े निर्देश दिए। कहा, जेल अधिकारियों को निर्देशित किया जाता है कि आरोपी को जेल के भीतर उचित चिकित्सा सहायता (Proper Medical Attention) प्रदान की जाए। जब भी उसे इस बीमारी के इलाज के लिए सर्जरी की आवश्यकता होगी, जेल प्रशासन बिना किसी देरी के तुरंत अस्पताल ले जाकर उसकी सर्जरी कराने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
माननीय उच्च न्यायालय बेंचजस्टिस अंजन मोनी कलिता (गुवाहाटी उच्च न्यायालय)
फैसले की तारीख25 मई 2026
संबंधित कानूनपोक्सो एक्ट (धारा 6), आईटी एक्ट (धारा 67A), और BNSS, 2023 की धारा 183
अपराध की प्रकृतिडीपफेक/एआई (AI) तकनीक से नाबालिग की न्यूड तस्वीरें बनाना, सोशल मीडिया/दोस्तों में फैलाना और ब्लैकमेल कर रेप करना।
अदालत का अंतिम आदेशजमानत याचिका खारिज; हालांकि बीमारी के इलाज के लिए जेल प्रशासन को उचित व्यवस्था करने का आदेश।

निष्कर्ष (Takeaway)

गुवाहाटी हाई कोर्ट का यह फैसला तकनीकी युग में बढ़ रहे ‘साइबर-पोक्सो’ (Cyber-POCSO) अपराधों के खिलाफ न्यायपालिका के कड़े रुख को दर्शाता है। एआई (AI) और डीपफेक तकनीक के माध्यम से बच्चों को निशाना बनाना और उनकी मॉर्फ्ड तस्वीरें फैलाना समाज के लिए एक नया और अत्यंत गंभीर खतरा बन चुका है। अदालत ने साफ कर दिया है कि जहां एक मासूम का भविष्य और गरिमा दांव पर हो, वहां बीमारी जैसी तकनीकी आधारों का सहारा लेकर संगीन अपराध के आरोपियों को समाज में खुला नहीं छोड़ा जा सकता।

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