Coached Evidence: कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने सेरामपुर कॉलेज के एक प्रोफेसर को पॉक्सो (POCSO) मामले में बाइज्जत बरी (Acquit) कर दिया है।
प्रोफेसर को चार साल तक बेवजह जेल को लेकर मुआवजा भी दिया
हाईकोर्ट के जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्वा सिन्हा राय की खंडपीठ ने इस मामले में न केवल प्रोफेसर को बरी किया, बल्कि उन्हें 4 साल तक बिना वजह जेल में काटने के एवज में 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) और विशेष लोक अभियोजक (SPP) के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की है। एक बेहद संवेदनशील मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए अदालत ने पाया कि प्रोफेसर को उनकी अलग रह रही पत्नी, बेटे और केस के विशेष सरकारी वकील (Special Public Prosecutor) की मिलीभगत और साजिश के तहत झूठे मामले में फंसाया गया था।
मामला और निचली अदालत का फैसला
यह मामला साल 2022 का है। पीड़ित लड़की की बहन ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसके पिता ने लड़की को पढ़ाई के लिए प्रोफेसर प्रताप दिगल (Pratap Digal) के पास छोड़ा था, जहां प्रोफेसर ने कथित तौर पर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। इस शिकायत के आधार पर निचली अदालत (Trial Court) ने प्रोफेसर को दोषी मानते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ प्रोफेसर ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
हाई कोर्ट की जांच में खुली ‘साजिश’ की परतें
मामला: हाई कोर्ट ने जब मामले के साक्ष्यों और गवाहों की गहराई से जांच की, तो अभियोजन पक्ष (Prosecution) का पूरा मामला ढह गया। अदालत ने गंभीर विसंगतियां पाईं।
सरकारी वकील और पत्नी के बीच पुराना संबंध (Conflict of Interest): मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब कोर्ट ने पाया कि इस पोक्सो केस के विशेष लोक अभियोजक (SPP) अधिवक्ता जॉयदीप मुखर्जी, असल में प्रोफेसर की पत्नी (रीता सोरेन) के वकील रह चुके थे। वह पत्नी द्वारा प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज कराए गए IPC की धारा 498A (वैवाहिक क्रूरता) के मामले में उसकी पैरवी कर रहे थे।
अदालत की टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि हितों के इस टकराव (Conflict of Interest) को देखते हुए एडवोकेट मुखर्जी को खुद इस केस से अलग हो जाना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा करने के बजाय अपने पुराने क्लाइंट (पत्नी) और उसके बेटे की गवाही का इस्तेमाल प्रोफेसर को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाने के लिए किया। कोर्ट ने इसे ‘पेशेवर कदाचार’ (Professional Misconduct) से आगे बढ़कर ‘दुर्भावनापूर्ण अभियोजन’ (Malicious Prosecution) माना।
जांच अधिकारी (IO) की गंभीर लापरवाही और पक्षपात: हाई कोर्ट ने जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर (SI) निवेदिता कोले की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए।
प्रोफेसर का आवास सेरामपुर कॉलेज परिसर में था, जहां आसपास अन्य प्रोफेसरों और शिक्षाविदों के भी क्वार्टर थे। पुलिस ने पड़ोस के किसी भी स्वतंत्र गवाह का बयान दर्ज नहीं किया। पुलिस ने प्रोफेसर के घर की तलाशी उनकी अनुपस्थिति में ली।
गंभीर बात: सबसे गंभीर बात यह कि पीड़िता का मेडिकल परीक्षण किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचा था। पीड़िता के वेजाइनल स्वाब (Vaginal Swabs) एकत्र करने के बावजूद, पुलिस ने उन्हें फोरेंसिक जांच (FSL) के लिए भेजा ही नहीं। इसके बावजूद, आईओ ने प्रोफेसर की अलग रह रही पत्नी और बेटे को ही इस केस का ‘स्टार गवाह’ (Star Witnesses) बना दिया, जिनका प्रोफेसर के साथ पहले से ही विवाद चल रहा था।
झूठे साक्ष्यों को छिपाने के लिए पोक्सो की धाराओं का सहारा नहीं
हाई कोर्ट ने कानून के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा, चूंकि पीड़िता का बयान विसंगतियों से भरा है और एकमात्र सहायक साक्ष्य उन गवाहों (पत्नी और बेटे) से आता है जिनकी दुश्मनी (498A केस) पहले से प्रमाणित है, इसलिए इस मामले की बुनियादी बुनियाद ही हिली हुई है। साक्ष्य के अभाव या सिखाए-पढ़ाए गए गवाहों (Coached Evidence) की कमियों को छिपाने के लिए पोक्सो अधिनियम के तहत कानूनी धारणा (Presumption) का सहारा नहीं लिया जा सकता। अदालत ने कहा कि पुलिस की अक्षमता और सरकारी वकील के शत्रुतापूर्ण आचरण के कारण एक शिक्षक को 4 साल तक गलत तरीके से जेल (Wrongful Incarceration) काटनी पड़ी, जिससे न्याय का गंभीर हनन हुआ है।
हाई कोर्ट के कड़े निर्देश और कार्रवाई
प्रोफेसर को बरी और मुआवजा: अदालत ने निचली अदालत के दोषी करार देने वाले फैसले को रद्द करते हुए प्रोफेसर प्रताप दिगल को तुरंत बरी किया और राज्य सरकार को 3 महीने के भीतर 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।
दोषियों से वसूली की छूट: हाई कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकार मुआवजे की यह राशि जांच अधिकारी (SI निवेदिता कोले) और वकील जॉयदीप मुखर्जी से वसूल (Recover) कर सकती है। इसके अलावा, प्रोफेसर दिगल इन दोनों के खिलाफ मानहानि और नुकसान की भरपाई के लिए अलग से केस दर्ज करने के लिए स्वतंत्र हैं।
पुलिस महानिदेशक (DGP) को आदेश: पश्चिम बंगाल के डीजीपी को निर्देश दिया गया है कि वे पक्षपातपूर्ण जांच के लिए एसआई निवेदिता कोले के खिलाफ तुरंत अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) शुरू करने पर विचार करें।
बार काउंसिल को निर्देश: बार काउंसिल ऑफ वेस्ट बंगाल के चेयरमैन को आदेश दिया गया है कि वे अधिवक्ता जॉयदीप मुखर्जी के खिलाफ व्यावसायिक कदाचार के लिए तुरंत अनुशासनात्मक जांच शुरू करें।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| हाई कोर्ट बेंच | जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्वा सिन्हा राय (कलकत्ता उच्च न्यायालय) |
| आरोपी | प्रताप दिगल (प्रोफेसर, सेरामपुर कॉलेज) |
| मूल सजा | निचली अदालत द्वारा 20 साल की कैद; 4 साल जेल में बिताए। |
| साजिशकर्ता | अलग रह रही पत्नी (रीता सोरेन), बेटा और स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर (जॉयदीप मुखर्जी)। |
| अदालत का फैसला | बाइज्जत बरी; ₹10 लाख का मुआवजा; IO और SPP के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह मामला इस बात का एक और गंभीर उदाहरण है कि कैसे व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए पोक्सो (POCSO) और महिलाओं से जुड़े कड़े कानूनों का दुरुपयोग किया जा सकता है। कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला न्याय की जीत है, जहां अदालत ने न केवल एक बेकसूर प्रोफेसर का सम्मान बहाल किया, बल्कि जांच एजेंसियों और न्याय प्रणाली के भीतर बैठे उन लोगों को भी कड़ा संदेश दिया है जो अपने पद और शक्ति का दुरुपयोग करके किसी नागरिक का जीवन बर्बाद करते हैं।

