Brutal Humiliation: राजस्थान हाई कोर्ट ने पुलिस हिरासत में आरोपियों के मानवाधिकारों के हनन और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है।
अलवर के एक आरोपी के साथ पुलिस कार्रवाई की निंदा
हाईकोर्ट के जस्टिस फरजन्द अली की एकल पीठ ने 27 मई 2026 को याचिका का निपटारा करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच करने की शक्ति का मतलब “दोषी घोषित करने की शक्ति” नहीं होता। किसी भी आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि अदालत उसे दोषी साबित न कर दे। अदालत ने अलवर के एक आरोपी को जबरन महिला के कपड़ों में, सिर मुंडवाकर बाजार में घुमाने (परेड कराने) के मामले में पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि “पुलिस अधिकारी जनभावना की अदालत में खुद जज बनने की कोशिश न करें।”
मामला क्या था? (The Incident of Brutal Humiliation)
याचिकाकर्ता (44 वर्षीय अलवर निवासी) का आरोप: यह मामला साल 2025 में नागौर में दर्ज धोखाधड़ी के एक मामले (FIR) से जुड़ा है। 30 जुलाई 2025 को सादे कपड़ों में आए कुछ अज्ञात लोगों ने उसे उसके घर से उठाया। पहले अलवर थाने में उसके साथ मारपीट की गई और फिर मर्त सिटी (नागौर) पुलिस को सौंप दिया गया। कोर्ट में पेश करने से पहले पुलिसकर्मियों ने जबरन उसका सिर मूंड दिया, उसे महिलाओं के कपड़े पहनाए और भीड़भाड़ वाले बाजार में उसकी परेड कराई।
सोशल मीडिया पर वायरल: इस अमानवीय कृत्य के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार चैनलों पर व्यापक रूप से प्रसारित की गईं, जिससे समाज में उसकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंची। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत अपने मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन बताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
पुलिस की अजीब दलील; कोर्ट ने कहा- तर्कहीन
पुलिस का दावा: सुनवाई के दौरान नागौर के पुलिस अधीक्षक (SP) कोर्ट में पेश हुए और पुलिस का बचाव करते हुए एक बेहद अजीब कहानी पेश की। पुलिस ने कहा कि आरोपी और उसका साथी गिरफ्तारी से बचने के लिए अपनी पहचान छुपाने के उद्देश्य से पहले से ही महिलाओं के कपड़े पहने हुए थे। पुलिस उन्हें उसी हालत में थाने लाई थी। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो पुलिस ने नहीं, बल्कि कोर्ट ले जाते समय आम जनता (Third Party) ने बनाए थे।
हाई कोर्ट ने नकारा: जस्टिस फरजन्द अली ने पुलिस की इस कहानी को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह आम मानवीय व्यवहार (Human Conduct) के बिल्कुल विपरीत है। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान छुपाने के लिए आधा सिर मुंडवाकर और महिलाओं के कपड़े पहनकर सार्वजनिक रूप से नहीं घूमेगा। कोर्ट ने पाया कि पुलिस की यह दलील सिर्फ अपने अमानवीय कृत्य पर पर्दा डालने (Gloss over) की एक नाकाम कोशिश है, जो “मानवीय गरिमा और संवैधानिक नैतिकता के मूल पर प्रहार करती है।”
मीडिया ट्रायल और पर्प वॉक पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणियां
सजा से पहले ही सामाजिक मौत: हाई कोर्ट ने पुलिस द्वारा की जाने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट और आरोपियों की सार्वजनिक परेड (Perp Walks) पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी की ऐसी तस्वीरें और वीडियो साझा करना अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले ही उसे “सार्वजनिक रूप से सजा” देने जैसा है, जो कानूनन गलत है।
पुलिस का मीडिया ट्रायल: जांच एजेंसियां अदालत में सुनवाई शुरू होने से पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस और चुनिंदा तस्वीरें जारी करके जनता के बीच एकतरफा नैरेटिव (Narrative) तय कर देती हैं।
डिजिटल युग के स्थायी घाव: अदालत ने लॉ कमिशन की 200वीं रिपोर्ट (ट्रायल बाय मीडिया) का हवाला देते हुए कहा कि आज के डिजिटल युग में इंटरनेट पर डाली गई तस्वीरें स्थायी हो जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति बाद में अदालत से बाइज्जत बरी भी हो जाए, तो भी समाज में उसकी छवि हमेशा के लिए धूमिल ही रहती है।
राजस्थान पुलिस को हाई कोर्ट के कड़े निर्देश
सार्वजनिक परेड पर रोक: भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हाई कोर्ट ने पूरे राजस्थान की पुलिस के लिए मार्गदर्शिका (Guidelines) जारी की है। जिन व्यक्तियों का कोई गंभीर आपराधिक इतिहास नहीं है, उन्हें सार्वजनिक रूप से नहीं घुमाया जाएगा और न ही उनके साथ कोई अपमानजनक व्यवहार किया जाएगा।
सोशल मीडिया ट्रायल पर पाबंदी: पुलिस विभाग किसी भी आरोपी को सोशल मीडिया पर ट्रोल कराने या उसकी खिंचाई (Condemnation) कराने का जरिया नहीं बनेगा।
थानों में ‘क्या करें और क्या न करें’ की सूची: सभी थानों और पुलिस की आधिकारिक वेबसाइटों पर आरोपियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार को लेकर “Do’s and Don’ts” की सूची प्रमुखता से प्रदर्शित की जाएगी।
मानवीय गरिमा सर्वोपरि: पुलिस कस्टडी में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की मानवीय गरिमा की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों का संदर्भ
हाई कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया। इसमें डी.के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार (गिरफ्तारी के नियम), सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन, महमूद नय्यर आजम बनाम छत्तीसगढ़ सरकार (कस्टडी में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के खिलाफ) हैं। अदालत ने दोहराया कि हथकड़ी लगने या आरोपी बनने मात्र से कोई नागरिक अपने संवैधानिक अधिकार नहीं खो देता।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस फरजन्द अली (राजस्थान उच्च न्यायालय) |
| सुनवाई/फैसले की तारीख | 27 मई 2026 |
| मुख्य कानूनी मुद्दे | पुलिस द्वारा कस्टडी में अपमान, मीडिया ट्रायल, और अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा) का उल्लंघन। |
| पुलिस की दलील | आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए खुद महिला के कपड़े पहने हुए था। (कोर्ट द्वारा खारिज) |
| अदालत का अंतिम आदेश | पुलिस को कड़ी फटकार; भविष्य के लिए गाइडलाइंस जारी; पीड़ित को मुआवजा और डैमेज क्लेम के लिए दीवानी अदालत जाने की छूट। |
निष्कर्ष (Takeaway)
चूंकि नागौर के एसपी ने अदालत को आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी, इसलिए हाई कोर्ट ने फिलहाल अधिकारियों के खिलाफ सीधे दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। हालांकि, कोर्ट ने पीड़ित व्यक्ति को पुलिस के खिलाफ मुआवजा (Compensation) और मानहानि (Damages) का मुकदमा दायर करने की पूरी आजादी दी है। यह फैसला याद दिलाता है कि खाकी वर्दी कानून से ऊपर नहीं है और ‘पब्लिक सेंटीमेंट’ को भुनाने के लिए पुलिस किसी भी नागरिक को सरेआम बेइज्जत नहीं कर सकती।

