Terror Case: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने साल 2019 के एक कथित सीमा पार आतंकवाद और हथियार तस्करी के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
ट्रक ड्राइवर की जमानत याचिका पर सुनवाई
जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने एक ट्रक ड्राइवर की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पुलिस रिकॉर्ड में इस चौंकाने वाली विसंगति (Discrepancy) को पकड़ा और इस पर कड़ा संज्ञान लिया। कोर्ट ने पाया कि मामले में एफआईआर (FIR) अपराध का पता चलने से पूरे 75 मिनट पहले ही दर्ज कर ली गई थी।
क्या है पूरा मामला? (The 2019 Terror Case)
आरोपी और बरामदगी: यह मामला सितंबर 2019 का है, जब कठुआ के लखनपुर में एक ट्रक से भारी मात्रा में स्वचालित हथियार और गोला-बारूद बरामद करने का दावा किया गया था। पुलिस के अनुसार, ट्रक ड्राइवर सबील अहमद बाबा के वाहन को लखनपुर में रोककर तलाशी ली गई, जिसमें से 4 AK-56 राइफल, 2 AK-47 राइफल और 180 राउंड कारतूस (30-30 राउंड से भरी 6 मैगजीन) बरामद की गई थीं।
गंभीर धाराएं: इस मामले में सबील अहमद बाबा सहित 6 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इन पर तत्कालीन रणबीर दंड संहिता (RPC), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 और भारतीय हथियार अधिनियम, 1959 के तहत मामले दर्ज किए गए थे।
मुख्य साजिशकर्ता: इस केस के 6 आरोपियों में पाकिस्तान में बैठा जैश-ए-मोहम्मद का कमांडर आशिक अहमद नेंगरू उर्फ आशिक मौलवी भी शामिल है, जिस पर ड्रोन के जरिए सीमा पार से हथियार गिराने की साजिश रचने का आरोप है।
समय का अजीब गणित: अपराध बाद में, FIR पहले
FIR का समय: जस्टिस राहुल भारती ने जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान पुलिस के आधिकारिक दस्तावेजों को देखकर इस विसंगति को रेखांकित किया। लखनपुर पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 0061/2019 दिनांक 12 सितंबर 2019 को सुबह 8:30 बजे दर्ज की गई थी।
अपराध/बरामदगी का समय: पुलिस रिकॉर्ड के ही अनुसार, आरोपी सबील अहमद बाबा के ट्रक (संख्या JK-13E/2000) को सुबह 9:45 बजे रोका गया और तलाशी के दौरान हथियार बरामद किए गए।
यह रही अदालत की टिप्पणी
अदालत ने आश्चर्य जताते हुए अपने आदेश में कहा, इस मामले की दलीलों के दौरान, एक बेहद चौंकाने वाला पहलू सामने आया है जिससे यह अदालत खुद को गंभीर संज्ञान लेने से नहीं रोक पा रही है। तथ्य यह है कि लखनपुर पुलिस स्टेशन द्वारा एफआईआर सुबह 8:30 बजे ही दर्ज कर ली गई थी, जबकि कथित अपराध (ट्रक को रोकना और हथियारों की बरामदगी) इसके 75 मिनट बाद सुबह 9:45 बजे हुआ।
गायब मिली मूल एफआईआर (Original FIR Missing)
लापरवाही: समय की इस गड़बड़ी के अलावा, हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड में एक और बड़ी लापरवाही पकड़ी। निचली अदालत (Trial Court) से जो अंतिम पुलिस रिपोर्ट (चालान/चार्जशीट) हाई कोर्ट को भेजी गई थी, उसमें मूल एफआईआर (Original FIR) शामिल ही नहीं थी।
ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट: ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 (COVID-19) प्रतिबंधों के कारण 9 मार्च 2020 को अदालत के पीठासीन अधिकारी के आवास पर चालान पेश किया गया था।
दस्तावेजों की हेराफेरी: रिकॉर्ड से पता चला कि मूल एफआईआर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), कठुआ के समक्ष जमा की गई थी। जम्मू की एनआईए (NIA) कोर्ट (तीसरी अतिरिक्त सत्र अदालत) ने 10 मार्च 2020 को आदेश जारी कर इसे मंगाया था, लेकिन सीजेएम कोर्ट से मूल प्रति कभी प्राप्त ही नहीं हुई। हाई कोर्ट को जानकारी देने के लिए अभियोजन पक्ष (Prosecution) से केवल एक फोटोकॉपी लेकर फाइल से जोड़ी गई थी।
अदालत का अगला कदम
इस पूरे घटनाक्रम और पुलिस रिकॉर्ड में दिख रही स्पष्ट कमियों को देखते हुए, हाई कोर्ट ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। कोर्ट से दूरी न बनाते हुए जस्टिस राहुल भारती ने मामले के जांच अधिकारी (Investigating Officer – IO) को अगली सुनवाई की तारीख पर व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष पेश होने का आदेश दिया है, ताकि वे समय और लापता दस्तावेजों से जुड़े इन सवालों का जवाब दे सकें।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस राहुल भारती (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट) |
| याचिकाकर्ता (आरोपी) | सबील अहमद बाबा (ट्रक ड्राइवर – 2019 से जेल में बंद) |
| विवाद का मुख्य कारण | हथियारों की बरामदगी (सुबह 9:45 बजे) से 75 मिनट पहले एफआईआर (सुबह 8:30 बजे) दर्ज होना। |
| बरामद हथियार | 04 AK-56 राइफल, 02 AK-47 राइफल, 180 राउंड कारतूस। |
| लागू कानून | रणबीर दंड संहिता (RPC), यूएपीए (UAPA), आर्म्स एक्ट। |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | जांच अधिकारी (IO) को स्पष्टीकरण के लिए व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह मामला आपराधिक न्यायशास्त्र (Criminal Jurisprudence) के एक बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करता है—चाहे आरोप राष्ट्रीय सुरक्षा या आतंकवाद से ही क्यों न जुड़े हों, पुलिस जांच को कानून की स्थापित प्रक्रिया और पूर्ण निष्पक्षता की कसौटी पर खरा उतरना अनिवार्य है। एफआईआर के समय में 75 मिनट का यह अंतर और मूल दस्तावेज का गायब होना पुलिस की कहानी पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है, जिसका लाभ आरोपी को जमानत मिलने के रूप में मिल सकता है।

