Social Wedding: त्रिपुरा हाई कोर्ट ने सहमति से बने संबंधों (Consensual Relationship) और शादी के वादे पर बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
आरोपी को दी गई सजा को रद्द करते हुए किया बरी
हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. टी. अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत (Trial Court) द्वारा आरोपी को दी गई 10 साल की जेल की सजा और 1 लाख रुपये के जुर्माने के फैसले को पूरी तरह रद्द (Set Aside) करते हुए उसे बरी (Acquit) कर दिया। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि एक लंबे प्रेम प्रसंग और उसके बाद हुई नोटरी मैरिज (Notarized Marriage) के चलते बने शारीरिक संबंधों को बाद में सिर्फ इसलिए दुष्कर्म (Rape) नहीं माना जा सकता, क्योंकि पुरुष ने बाद में सामाजिक रीति-रिवाज से शादी (Social Wedding) करने से इनकार कर दिया था।
मामला क्या था? (प्यार, सिंदूर, नोटरी और फिर विवाद)
अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि वह 2013 में आरोपी के संपर्क में आई थी। सितंबर 2017 में आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
शादी और नोटरी घोषणा: इसके बाद दोनों ने 22 जनवरी 2018 को शादी कर ली (जहां आरोपी ने पीड़िता के माथे पर सिंदूर लगाया) और फिर 31 जनवरी 2018 को दोनों ने कोर्ट में एक ‘संयुक्त नोटरी घोषणा’ (Joint Notarized Declaration) भी की।
सामाजिक शादी से इनकार: महिला का आरोप था कि वह लगातार आरोपी के घर जाती रही और दोनों पति-पत्नी की तरह रहे। लेकिन आरोपी उसे बार-बार समाज के सामने धूमधाम से शादी (Social Ceremony) करने का आश्वासन देता रहा और बाद में उसने सामाजिक शादी करने से साफ इनकार कर दिया।
केस दर्ज: सामाजिक शादी न होने से नाराज होकर महिला ने पुलिस में आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार), 417, 420 और 34 के तहत मामला दर्ज करा दिया, जिस पर निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानकर 10 साल की सजा सुना दी थी।
यह बलात्कार नहीं, बल्कि अटूट प्रेम बंधन है: हाई कोर्ट
त्रिपुरा हाई कोर्ट ने जब मामले के सबूतों और महिला के बयानों की दोबारा गहन समीक्षा की, तो कहानी पूरी तरह बदल गई। कोर्ट ने अपने फैसले में बेहद स्पष्ट टिप्पणियां कीं। कहा, इस मामले में बलात्कार (Rape) का अपराध कहीं से भी साबित नहीं होता है। इसके विपरीत, आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच एक गहरा प्रेम बंधन/संबंध (Love Bondage) पूरी तरह स्थापित होता है। खुद शिकायतकर्ता-पीड़िता ने यह स्वीकार किया है कि उनके बीच शादी हुई थी, जिसके बाद नोटरी घोषणा की गई और वह शादी कानूनी रूप से आज भी अस्तित्व (Subsistence) में है।
कोर्ट ने किन 3 मुख्य आधारों पर आरोपी को बरी किया?
अदालत ने आरोपी की अपील को स्वीकार करते हुए कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया।
सहमति की मौजूदगी (Consent was Present): कोर्ट ने कहा कि धारा 375 (आईपीसी) के तहत बलात्कार का केस बनाने के लिए सबसे जरूरी तत्व यह है कि संबंध महिला की ‘सहमति के बिना’ बने हों। लेकिन पीड़िता के सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज बयानों से साफ है कि वह स्वेच्छा से इस प्रेम संबंध में थी, लगातार आरोपी के घर जाती थी और परिणामों को जानते हुए भी उसने स्वेच्छा से संबंध जारी रखे।
शादी अभी भी लागू है: कोर्ट ने नोट किया कि दोनों के बीच हुई नोटरी मैरिज कानूनी रूप से अभी भी बनी हुई है। दोनों पति-पत्नी के रूप में सहवास (Cohabitation) कर रहे थे। ऐसे में केवल सामाजिक समारोह न करने से यह रिश्ता आपराधिक नहीं हो जाता।
मेडिकल रिपोर्ट से पुष्टि नहीं: हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि मामले में पेश किए गए मेडिकल साक्ष्य (Medical Evidence) भी पीड़िता के बलात्कार के दावों का कतई समर्थन नहीं करते हैं। इसके अलावा एफआईआर दर्ज कराने में भी बिना किसी ठोस वजह के काफी देरी की गई थी।
विश्लेषण: शादी के वादे और सहमति के रिश्तों पर कानूनी रुख
| कानूनी बिंदु | कोर्ट का स्टैंड और इसका प्रभाव |
| सामाजिक रस्म बनाम कानूनी विवाह | कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में यदि दो बालिग आपसी सहमति से शादी का संविदात्मक (Contractual/Notarized) रूप चुनते हैं, तो वह वैध माना जाएगा। सामाजिक उत्सव (Social Function) न करना उस विवाह या उससे बने संबंधों को अवैध या आपराधिक नहीं बनाता। |
| धारा 376 IPC का दुरुपयोग रोकना | हाल के दिनों में ऐसे मामले बढ़े हैं जहां आपसी सहमति से रिश्ते टूटने या सामाजिक विवाद होने के बाद महिलाएं बलात्कार का केस दर्ज करा देती हैं। यह फैसला ऐसे मामलों में पुरुषों को सुरक्षा प्रदान करता है। |
| बालिगों की अपनी जिम्मेदारी | अदालत ने दोहराया कि जब एक बालिग महिला लंबे समय तक किसी रिश्ते में रहती है, तो वह मानकर चला जाता है कि वह अपनी मर्जी से शारीरिक संबंधों का हिस्सा है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
त्रिपुरा हाई कोर्ट का यह फैसला कानून और सामाजिक रूढ़ियों के बीच के फर्क को बेहद संजीदगी से स्पष्ट करता है। अदालत ने साफ कर दिया कि आपसी सहमति से बने एक लंबे रिश्ते और शादी के बाद के सहवास को, केवल सामाजिक रस्मों-रिवाजों के पूरे न होने के कारण ‘बलात्कार’ जैसी संगीन और गंभीर धारा में तब्दील नहीं किया जा सकता। कानून का इस्तेमाल किसी रिश्ते के टूटने या सामाजिक वादे से मुकरने का बदला लेने के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए। इस फैसले से जेल में बंद आरोपी को 10 साल की कठोर सजा से बड़ी राहत मिली है।

