Dishonest Intention: पटना उच्च न्यायालय ने एक महिला डॉक्टर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।
शुरुआत से ही बेईमानी का इरादा का साबित होना जरूरी: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस सुनील दत्त मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी डॉक्टर की राय गलत भी साबित हो जाती है, लेकिन उसने यह राय सद्भावपूर्वक (Good Faith) अपनी ड्यूटी के तहत दी है, तो जब तक शुरुआत से ही बेईमानी का इरादा (Mens Rea) साबित न हो, IPC की धारा 406 और 420 के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। किसी डॉक्टर द्वारा अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करते हुए दी गई चिकित्सीय सलाह (Medical Advice) में त्रुटि होना, बिना किसी शुरुआती बेईमानी की मंशा (Dishonest Intention) के, धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था?: गर्भावस्था की सलाह और विवाद
घटनाक्रम: एक शिकायतकर्ता महिला (जो पेशे से अधिवक्ता हैं) गर्भावस्था की जटिलताओं की शिकायत लेकर याचिकाकर्ता डॉक्टर के क्लिनिक गई थीं।
चिकित्सीय सलाह: मरीज द्वारा लाए गए अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट को देखने के बाद डॉक्टर ने फीस लेकर गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन (Medical Termination of Pregnancy – MTP) की सलाह दी और कुछ दवाएं दीं।
दूसरी राय: मरीज के परिजनों की सलाह पर उसने गर्भपात नहीं कराया और दूसरी डॉक्टर से सलाह ली। दूसरी डॉक्टर ने बताया कि भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ है, और बाद में महिला ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
निचली अदालत की कार्रवाई: शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि डॉक्टर ने धोखाधड़ी से गलत सलाह दी और फीस हड़प ली। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ IPC की धारा 406 (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत संज्ञान (Cognizance) ले लिया। रीविजनल कोर्ट से राहत न मिलने पर डॉक्टर ने पटना हाई कोर्ट में धारा 482 CrPC/BNSS के तहत याचिका दाखिल की।
पटना हाई कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां
शुरुआती बेईमानी की मंशा (Mens Rea) का अभाव
हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों के मूलभूत सिद्धांत को रेखांकित करते हुए जस्टिस सुनील दत्त मिश्रा की मुख्य टिप्पणी, प्रस्तुत मामले में शिकायतकर्ता के आरोपों को यदि पूरी तरह स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी वे IPC की धारा 406 और 420 के आवश्यक तत्वों को पूरा करने में विफल रहते हैं। विवाद मुख्य रूप से याचिकाकर्ता द्वारा अपने पेशेवर कर्तव्यों के दौरान दी गई एक मेडिकल राय से उत्पन्न हुआ है, जिसमें बेईमानी के इरादे या आपराधिक विश्वासघात का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है।”
स्वतंत्र मेडिकल रिपोर्ट का न होना
अदालत ने नोट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्वतंत्र चिकित्सा साक्ष्य (Independent Medical Evidence) या विशेषज्ञ रिपोर्ट पेश नहीं की गई जो यह साबित कर सके कि डॉक्टर ने जानबूझकर गलत राय दी थी या उनका उद्देश्य धोखाधड़ी करना था।
‘भजन लाल’ नजीर का हवाला
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (State of Haryana v. Bhajan Lal) का हवाला देते हुए कहा कि जब शिकायत के तथ्य किसी अपराध का खुलासा नहीं करते हैं, तो मुकदमे को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) होगा।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
संज्ञान आदेश और केस रद्द: अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा धारा 406 और 420 IPC के तहत लिए गए संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त (Quash) कर दिया।
पेशेवर सुरक्षा: कोर्ट ने दोहराया कि केवल गलत राय या चिकित्सीय निर्णय के गलत निकलने मात्र से डॉक्टरों के खिलाफ सीधे आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं किए जाने चाहिए।
केस मैट्रिक्स: Patna HC on Criminal Liability of Doctors.
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सुनील दत्त मिश्रा (Justice Sunil Dutta Mishra) |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट साकेत तिवारी (Adv. Saket Tiwary) |
| लागू धाराएं | IPC की धारा 406 (Criminal Breach of Trust) एवं धारा 420 (Cheating) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या गलत डॉक्टरी राय/सलाह देने पर डॉक्टर के खिलाफ धोखाधड़ी (Sec 420) और विश्वासघात (Sec 406) का केस चल सकता है? |
| अदालत का निर्णय | नहीं; शुरुआती बेईमानी की मंशा (Mens Rea) के बिना केवल गलत मेडिकल राय आपराधिक अपराध नहीं है। केस रद्द। |

