Dilapidated Temple: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शिवपुरी जिले के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पुजारियों को हटाने के राज्य सरकार के आदेशों को रद्द कर दिया है।
पुजारियों द्वारा कदाचार (Misconduct) या कर्तव्य का परित्याग नहीं माना जा सकता
हाईकोर्ट के जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने कहा कि मूर्तियों की सुरक्षा और उनकी दैनिक पूजा-अर्चना को बनाए रखना ही धार्मिक प्रशासन और मंदिर प्रबंधन का वास्तविक सार है। किसी प्राचीन या जर्जर मंदिर के क्षतिग्रस्त होने पर देवताओं की मूर्तियों को पास के किसी अन्य कार्यशील मंदिर में स्थानांतरित करना ताकि उनकी पूजा-अर्चना निर्बाध रूप से जारी रह सके, पुजारियों द्वारा कदाचार (Misconduct) या कर्तव्य का परित्याग नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था?: जर्जर राधा गोपालजी मंदिर का विवाद
स्थानीय शिकायत: शिवपुरी जिले के कोलारस स्थित राधा गोपालजी श्री राम जानकीजी मंदिर के पुजारियों के खिलाफ स्थानीय निवासियों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्होंने मंदिर संपत्ति का कुप्रबंधन किया है और राधा गोपालजी का मंदिर अब अस्तित्व में नहीं है।
वास्तविक स्थिति: पुजारियों ने स्पष्ट किया कि वहां ऐतिहासिक रूप से दो मंदिर थे—राधा गोपालजी और राम जानकीजी। समय के साथ राधा गोपालजी का मंदिर बहुत पुराना और जर्जर होकर ढह गया था।
मूर्तियों का स्थानांतरण: मूर्तियों की पवित्रता बनाए रखने और पूजा-पाठ न रुकने देने के उद्देश्य से, पुजारियों ने 1972 में राधा गोपालजी की मूर्तियों को पास ही स्थित श्री राम जानकीजी मंदिर में सुरक्षित रखवा दिया था, जहां नियमित पूजा जारी थी।
प्रशासनिक जांच: अनुविभागीय अधिकारी (SDO) के निर्देश पर हुई जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मंदिर प्राकृतिक कारणों से ढहा था। पुजारियों द्वारा किसी भी प्रकार का वित्तीय गबन, अतिक्रमण या संपत्ति का दुरुपयोग नहीं पाया गया। जांच में यह भी सामने आया कि पुजारियों ने मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए सरकार से वित्तीय सहायता की मांग भी की थी।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां
“मूर्तियों की रक्षा करना कर्तव्यनिष्ठा और भक्ति का प्रतीक”
कलेक्टर, कमिश्नर और अपर मुख्य सचिव के पुजारियों को पद से हटाने वाले आदेशों को खारिज करते हुए हाई कोर्ट के जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने कहा, “उत्तरदाताओं (प्रशासन) का यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ढहे हुए ढांचे से मूर्तियों को दूसरे मंदिर में ले जाना कर्तव्य की अवहेलना है। जब कोई प्राचीन संरचना असुरक्षित और पूजा के लिए अयोग्य हो जाती है, तो धार्मिक अनुष्ठानों के निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करने के लिए मूर्तियों को पास के किसी कार्यशील मंदिर में स्थानांतरित करने का कार्य कदाचार नहीं है। बल्कि, ऐसा आचरण देवता के हितों और श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं की रक्षा में पुजारियों की दिलीपता और भक्ति (Diligence and Devotion) को दर्शाता है।”
बिना सबूत के कलेक्टर का आदेश गलत
अदालत ने पाया कि SDO ने जांच रिपोर्ट के आधार पर पुजारियों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी थी और सरकार को मंदिर निर्माण के लिए फंड देने की सिफारिश की थी। लेकिन कलेक्टर ने बिना किसी ठोस कारण या स्वतंत्र साक्ष्य के SDO के आदेश को पलट दिया, जिसे हाई कोर्ट ने पूरी तरह अवैध माना।
कोई वित्तीय हेरफेर या कदाचार साबित नहीं
ग्राम पंचायत के पंचनामे और नगर पंचायत के प्रमाण पत्रों से साबित हुआ कि पुजारी निरंतर अपनी सेवा दे रहे थे और उनके खिलाफ वित्तीय अनियमितता का कोई मामला नहीं बनता।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
- हटाने का आदेश रद्द: हाई कोर्ट ने कलेक्टर, कमिश्नर और अपर मुख्य सचिव द्वारा पुजारियों को हटाने के जारी सभी आदेशों को निरस्त (Quash) कर दिया।
- SDO का आदेश बहाल: कोर्ट ने SDO के उस मूल आदेश को बहाल कर दिया जिसमें पुजारियों के खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी गई थी।
केस मैट्रिक्स: MP HC Order on Shifting Idols from Dilapidated Temple
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के (Justice Milind Ramesh Phadke) |
| संबंधित स्थान | कोलारस, जिला शिवपुरी (मध्य प्रदेश) |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या जर्जर मंदिर से मूर्तियों को दूसरे मंदिर में ले जाना पुजारियों का कदाचार (Misconduct) माना जाएगा? |
| अदालत का निर्णय | नहीं; पूजा की निरंतरता और मूर्तियों की सुरक्षा के लिए ऐसा करना कर्तव्यनिष्ठा है, कदाचार नहीं। |

