Friday, July 31, 2026
HomeHigh CourtForm Fill: ऑनलाइन फॉर्म में केंद्र का फॉर्मेट भरा, राज्य का नहीं...

Form Fill: ऑनलाइन फॉर्म में केंद्र का फॉर्मेट भरा, राज्य का नहीं …आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों से क्यूं कहा विज्ञापन की शर्तें केवल कागजी नहीं होतीं, पढ़ें

Form Fill: झारखंड हाई कोर्ट ने सरकारी नौकरियों की भर्ती में विज्ञापन की शर्तों और कट-ऑफ तारीख (Cut-off Date) के पालन को लेकर एक बेहद सख्त और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

20 लेटर्स पेटेंट अपील्स को किया खारिज

झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) के फैसले को सही ठहराते हुए 20 लेटर्स पेटेंट अपील्स (Letters Patent Appeals – LPA) के पूरे बैच को एक साथ खारिज कर दिया। इन सभी उम्मीदवारों को नियमों का पालन न करने के कारण “सामान्य श्रेणी” (General Category) का मान लिया गया था। अदालत ने साफ किया है कि यदि कोई उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन फॉर्म भरते समय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित फॉर्मेट वाले जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate) का विवरण भरने में विफल रहता है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। भले ही उम्मीदवार के पास कट-ऑफ तारीख से पहले का वैध प्रमाण पत्र मौजूद क्यों न हो।

मामला क्या था? (फॉर्म में केंद्र का फॉर्मेट भरा, राज्य का रह गया)

इस पूरे विवाद की मुख्य सूत्रधार मुख्य अपीलकर्ता डॉ. नूतन इंदवार थीं, जिन्होंने 2016 में JPSC द्वारा दंत चिकित्सक (Basic Cadre – विज्ञापन संख्या 02/2016) के पद के लिए आवेदन किया था।

प्रमाण पत्र तो था, पर विवरण गलत भरा: डॉ. नूतन के पास 15 मार्च 2016 की कट-ऑफ तारीख से बहुत पहले (29 सितंबर 2014) का सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO) द्वारा जारी वैध अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाण पत्र झारखंड राज्य के निर्धारित फॉर्मेट में मौजूद था। लेकिन ऑनलाइन फॉर्म भरते समय उन्होंने गलती से केंद्र सरकार (Central Government) के फॉर्मेट वाले एक अन्य प्रमाण पत्र का विवरण दर्ज कर दिया।

कट-ऑफ से बाहर: उन्होंने एसटी श्रेणी के कट-ऑफ अंक तो पार कर लिए थे, लेकिन सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ से नीचे रह गईं। इस भर्ती में अनुसूचित जनजाति (ST) की 44 वैकेंसी में से 36 सीटें सिर्फ इसलिए खाली रह गईं क्योंकि उम्मीदवार शर्तों को पूरा नहीं कर पाए।

उम्मीदवारों का तर्क: उम्मीदवारों के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले ‘राम कुमार गिजरोया बनाम दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (2016)’ का हवाला देते हुए तर्क दिया कि चूंकि उनके पास कट-ऑफ डेट से पहले का जाति प्रमाण पत्र मौजूद था, इसलिए केवल फॉर्म में नंबर गलत भरने या दस्तावेज सत्यापन (Document Verification) के समय सही सर्टिफिकेट दिखाने पर उन्हें बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “विज्ञापन की शर्तें केवल कागजी नहीं होतीं”

झारखंड हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उम्मीदवारों की इन दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। जस्टिस राजेश शंकर द्वारा लिखे गए फैसले में कोर्ट ने 2 मुख्य वजहें बताईं।

दो स्वतंत्र और अनिवार्य शर्तें: कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन की धारा 9(gha) के तहत आरक्षण का लाभ पाने के लिए दो अलग-अलग और स्वतंत्र शर्तें पूरी करनी थीं— पहला, आपके पास झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित प्रारूप (Annexure-I या II) का प्रमाण पत्र होना चाहिए; और दूसरा, ऑनलाइन फॉर्म में उसी विशिष्ट प्रमाण पत्र का विवरण दर्ज होना चाहिए। उम्मीदवारों ने दूसरी शर्त का स्पष्ट उल्लंघन किया है।

सख्त चेतावनी का उल्लंघन: विज्ञापन में साफ तौर पर चेतावनी दी गई थी कि केंद्र सरकार के ओबीसी फॉर्मेट वाले या एसडीएम (SDO) स्तर से नीचे के अधिकारियों द्वारा जारी सर्टिफिकेट मान्य नहीं होंगे और विसंगति होने पर उम्मीदवार को अनारक्षित (Unreserved) माना जाएगा।

राम कुमार गिजरोया का फैसला यहां क्यों लागू नहीं हुआ?

उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट के जिस ‘राम कुमार गिजरोया’ केस पर अपना पूरा भरोसा टिकाया था, हाई कोर्ट ने उसकी कानूनी सीमाएं स्पष्ट कीं।

कोर्ट ने नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने बाद के कई फैसलों (दिव्या बनाम यूपीएससी, साक्षी अरा बनाम राजस्थान हाई कोर्ट) में साफ किया है कि गिजरोया मामला केवल वहां लागू होता है जहां अधिकारियों की देरी के कारण सर्टिफिकेट लेट बना हो। यह उन मामलों में लागू नहीं होता जहां उम्मीदवार विज्ञापन में लिखी स्पष्ट शर्तों का पालन करने में खुद लापरवाह रहा हो। इसके अलावा, 15 सितंबर 2025 को झारखंड हाई कोर्ट के फुल बेंच ने पहले ही इस नियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, जो कि इस डिवीजन बेंच के लिए बाध्यकारी (Binding) था।

विश्लेषण: ‘नकारात्मक समानता’ (Negative Equality) का सिद्धांत

सुनवाई के दौरान कुछ उम्मीदवारों ने यह दलील भी दी कि पिछले दौर की भर्तियों में ऐसे ही कुछ उम्मीदवारों को गलती के बावजूद नियुक्तियां दे दी गई थीं, इसलिए उन्हें भी समानता के अधिकार (Article 14) के तहत नौकरी मिलनी चाहिए। इस पर कोर्ट ने कानून का एक बड़ा सिद्धांत समझाया।

कोर्ट का कानूनी सिद्धांतइसका वास्तविक अर्थ और प्रभाव
नकारात्मक समानता (Negative Equality)संविधान का अनुच्छेद 14 किसी ‘पुरानी गैर-कानूनी कार्रवाई’ या गलती के आधार पर दोबारा वैसी ही गलती करने की इजाजत नहीं देता। अगर किसी को गलत तरीके से नौकरी मिली है, तो आप कोर्ट से अपने लिए भी वैसी ही गलत नियुक्ति की मांग नहीं कर सकते।
अनुच्छेद 226 की सीमाएं (Limits of Article 226)हाई कोर्ट रिट क्षेत्राधिकार (Article 226) के तहत नीतिगत मामलों या कट-ऑफ की शर्तों को केवल इसलिए शिथिल (Relax) नहीं कर सकता क्योंकि सीटें खाली रह गई हैं। प्रक्रियात्मक ढील देना पूरी तरह से सरकार और आयोग का काम है।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
34.1 ° C
34.1 °
34.1 °
51 %
5.2kmh
100 %
Fri
34 °
Sat
37 °
Sun
33 °
Mon
30 °
Tue
32 °