Friday, June 12, 2026
HomeDelhi High CourtSaket Building Collapse: सोशल मीडिया का हम क्या करें? क्या हमारा आदेश...

Saket Building Collapse: सोशल मीडिया का हम क्या करें? क्या हमारा आदेश कोई डर पैदा कर रहा है?

Saket Building Collapse: दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में न्यायपालिका और जजों को बदनाम करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर बेहद तल्ख और गंभीर टिप्पणी की है।

हाईकोर्ट के जस्टिस नीना बंसल कृष्णा और जस्टिस मधु जैन की अवकाशकालीन खंडपीठ (Vacation Bench) ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) की अर्जी पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की। कहा, हम सोशल मीडिया का क्या करें? हर एक मामले में अदालतों ने कड़ा रुख अपनाया है, लेकिन क्या यह कोई डर (Deterrent) पैदा कर रहा है? यह चलन अब बेहद आम होता जा रहा है। आप उन लोगों का क्या करेंगे जिन्होंने पूरी तरह से बेलगाम (Haywire) होने का फैसला कर लिया है? ऐसे कई मामले हैं जहां लोगों को सीधे जेल भेजा गया है, इसलिए यह न कहें कि हम नरम रहे हैं।

सोशल एक्टिविस्ट डॉ. कपिल कक्कड़ का विवादित पोस्ट

अदालत ने एक विवादित सोशल एक्टिविस्ट डॉ. कपिल कक्कड़ द्वारा हाई कोर्ट के सिटिंग जज के खिलाफ बनाए गए अतिरिक्त आपत्तिजनक वीडियो को तुरंत हटाने (Take Down) का आदेश दिया है। अकाउंट ब्लॉक होने और पुराने वीडियो हटाए जाने के अदालती आदेश के बावजूद आरोपी द्वारा नए अकाउंट से जज को निशाना बनाने और जनता से पैसों की मांग (चंदा) करने पर हाई कोर्ट ने व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए।

विवाद की शुरुआत: साकेत बिल्डिंग हादसा और ‘जज को मर्डरर’ कहना

यह पूरा मामला 30 मई 2026 को दिल्ली के साकेत इलाके में एक इमारत गिरने (Saket Building Collapse) से जुड़ा हुआ है, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी।

कपिल कक्कड़ का आरोप: डॉ. कपिल कक्कड़ ने सोशल मीडिया पर वीडियो डालकर दावा किया कि इस अवैध निर्माण को रोकने के लिए हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसे एक सिटिंग जज ने नगर निगम अधिकारियों के साथ कथित ‘भ्रष्ट सांठगांठ’ के चलते खारिज कर दिया था। कक्कड़ ने वीडियो में सीधे जज को इन 6 मौतों का हत्यारा (Murderer) करार दिया और न्यायपालिका को भ्रष्ट बताते हुए जनता से इस अन्याय के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया।

बार एसोसिएशन (DHCBA) का प्रतिवाद: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इन वीडियो के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt of Court) की याचिका दायर की। बार एसोसिएशन ने कोर्ट को बताया कि कक्कड़ का दावा पूरी तरह झूठ और मनगढ़ंत है। असल में, जिस अदालती आदेश का हवाला कक्कड़ दे रहा था, उसमें जज ने याचिका खारिज नहीं की थी, बल्कि याचिकाकर्ता को सिर्फ इसलिए अपनी याचिका वापस लेने (Withdraw) की अनुमति दी थी क्योंकि उसने संपत्ति के मूल मालिक को केस में पक्षकार (Party) नहीं बनाया था। कोर्ट ने उसे नए सिरे से याचिका दाखिल करने की छूट भी दी थी।

8 जून 2026 के आदेश की धज्जियां उड़ाईं, नया पैंतरा अपनाया

इससे पहले, 8 जून 2026 को इसी खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कपिल कक्कड़ के एक्स (X/Twitter), मेटा (Facebook/Instagram) और यूट्यूब (YouTube) अकाउंट्स को तुरंत ब्लॉक करने और सभी विवादित वीडियो हटाने का आदेश दिया था।

12 जून 2026 को सुनवाई के दौरान DHCBA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कोर्ट को बताया कि कक्कड़ पर इस आदेश का कोई असर नहीं हुआ।

नया अकाउंट और फॉलोअर्स की मांग: 8 जून 2026 को मुख्य अकाउंट्स ब्लॉक होने के बाद कक्कड़ ने सोशल मीडिया पर नए वीडियो अपलोड कर दिए। इन वीडियो में उसने छाती ठोककर जनता को बताया कि कोर्ट ने उसके अकाउंट ब्लॉक करने के आदेश दिए हैं, इसलिए लोग अब उसके ‘पर्सनल अकाउंट’ को फॉलो करें।

चंदे की अपील: कक्कड़ ने इन नए वीडियो के माध्यम से जनता से अपने इस अभियान के लिए वित्तीय सहायता (Monetary Support/चंदा) देने की भी अपील शुरू कर दी।

अन्य मामलों से जुड़ाव: याचिका में आरोप लगाया गया कि 4 और 5 जून को डाले गए वीडियो में कक्कड़ ने आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) से जुड़े एक असंबंधित दीवानी विवाद को भी इस जज से जोड़कर न्यायपालिका और कॉर्पोरेट घरानों के बीच भ्रष्ट संबंधों के झूठे आरोप लगाए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कोर्ट की सख्त हिदायत: ‘मूकदर्शक न बनें’

इस मामले में कोर्ट ने सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज (Meta, Google, X Corp, LinkedIn) की जिम्मेदारी भी तय की है। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया है।

अदालती आदेश का इंतजार न करें: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल ‘मूकदर्शक’ (Silent Spectators) बनकर नहीं बैठ सकते। जैसे ही उनके संज्ञान में यह आता है कि उनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किसी गैर-कानूनी कार्य, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमतर आंकने या किसी संस्था को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है, उन्हें स्वतः (Promptly) उस सामग्री को हटा देना चाहिए।

अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा: कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया तक आसान पहुंच के फायदे जरूर हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल समाज को नुकसान पहुंचाने या संवैधानिक संस्थाओं को दुर्भावनापूर्वक निशाना बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।

विश्लेषण: क्रिमिनल कन्टेंप्ट (आपराधिक अवमानना) और सोशल मीडिया रेग्युलेशन

यह मामला देश में ‘सोशल मीडिया ट्रायल’ और जजों को व्यक्तिगत रूप से ट्रोल या प्रताड़ित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए एक ऐतिहासिक नजीर बन रहा है।

कानूनी और प्रशासनिक पहलूहाई कोर्ट का स्टैंड और कानूनी स्थिति
आपराधिक अवमानना (Sec 2(c) Contempt Act)किसी भी सिटिंग जज पर बिना सबूत भ्रष्टाचार, मिलीभगत या ‘हत्या’ के आरोप लगाना अदालत को बदनाम करने और न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप (Scandalising the Court) करने के दायरे में आता है।
अकाउंट और URL सस्पेंशनकोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को कक्कड़ के सभी नए वीडियो के यूआरएल (URLs) को अगले 24 घंटे के भीतर ब्लॉक करने और संबंधित हैंडल्स को निलंबित करने का कड़ा निर्देश दिया है।
जेल की चेतावनीखंडपीठ की तल्ख टिप्पणियों से साफ है कि यदि अदालती आदेशों की इसी तरह अवहेलना जारी रही, तो आरोपी को सीधे न्यायिक हिरासत (जेल) भेजने में कोर्ट कोई संकोच नहीं करेगा।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
clear sky
35.7 ° C
35.7 °
35.7 °
38 %
7.1kmh
6 %
Fri
36 °
Sat
43 °
Sun
43 °
Mon
44 °
Tue
45 °

Recent Comments