Saturday, June 13, 2026
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MACT Pendency: सड़क हादसों के मुआवजे के लिए पीड़ितों को 20 साल का इंतजार…क्यों कहा यह तो जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा

MACT Pendency: देश भर के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों (Motor Accident Claims Tribunals – MACT) और हाई कोर्ट्स में मुआवजे के मामलों में होने वाली असाधारण देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ ने 100 से अधिक मामलों का अध्ययन करने के बाद नोट किया कि देश में पीड़ित परिवारों को MACT कोर्ट से मुआवजा मिलने में औसतन 6 साल और हाई कोर्ट में अपील के निपटारे में करीब 8 साल (कुल 14 से 15 साल) का समय लग रहा है। अदालत ने एक चौंकाने वाले विश्लेषण का हवाला देते हुए देश की न्याय प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए कई महत्वपूर्ण और बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा, मोटर वाहन अधिनियम, 1988 एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Legislation) है, जिसका उद्देश्य पीड़ितों को त्वरित और न्यायसंगत मुआवजा देना है। लेकिन दशकों तक मुकदमों का लंबित रहना इस कानून के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है। किसी अपने को खोने के गम को पैसों से तो नहीं तोला जा सकता, लेकिन जब मुआवजे के लिए 20 साल का इंतजार करना पड़े, तो पीड़ितों की पीड़ा और ज्यादा बढ़ जाती है।”

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक मामले से खुली आंखें (2004 का केस, 2024 में फैसला)

सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान दिए जो वर्ष 2004 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में दायर हुआ था और उसका फैसला 2024 के अंत में आया।

अदालत का सवाल: हालांकि 2011 में हाई कोर्ट में लगी एक आग के कारण हजारों रिकॉर्ड जल गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तीखा सवाल पूछा—”पहला सवाल यह कि 2004 का मामला 2011 तक लंबित क्यों रहा? दूसरा यह कि फाइलों को दोबारा तैयार (Reconstruct) करने में 14 साल (2011 से 2024) का समय कैसे लग सकता है?”

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नए अनिवार्य दिशा-निर्देश

ट्रिब्यूनल (MACT) और हाई कोर्ट के स्तर पर मुकदमों को तेजी से निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित व्यवस्थाएं दी हैं।

ट्रिब्यूनल स्तर पर: याचिका के साथ ही पुख्ता सबूत देना अनिवार्य

अदालत ने पाया कि अक्सर दावेदार बिना जरूरी दस्तावेजों के याचिका दायर कर देते हैं, जिससे बार-बार तारीखें (Adjournments) बढ़ानी पड़ती हैं। अब याचिका के साथ ये दस्तावेज लगाने होंगे।

उम्र का प्रमाण (Proof of Age): मुआवजे की राशि तय करने में उम्र सबसे बड़ा कारक है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि इसके लिए वैध और पुख्ता दस्तावेज जमा करने होंगे (जिसमें आधार कार्ड के इतर अन्य कानूनी रूप से स्वीकृत आयु प्रमाणों को प्राथमिकता दी जाए)।

दिव्यांगता का दावा: सक्षम डॉक्टरों द्वारा जारी प्रमाण पत्र, जिसमें दिव्यांगता का प्रतिशत और कामकाजी क्षमता पर पड़े असर (Functional Disability) का साफ जिक्र हो।

आय का प्रमाण: यदि किसी निश्चित आय का दावा किया जा रहा है, तो इनकम टैक्स रिटर्न (ITR), सैलरी स्लिप या नियोक्ता द्वारा मुहर और हस्ताक्षर के साथ जारी वेतन प्रमाण पत्र।

खर्चों के बिल: अस्पताल या क्लिनिक के सत्यापित मेडिकल बिल और अटेंडेंट (देखभाल करने वाले) के खर्च के दावे के लिए उसकी सैलरी का खुलासा करने वाला नोटरीकृत हलफनामा।

समरी प्रोसीजर (Summary Procedure): कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल मोटर वाहन अधिनियम की धारा 169 के तहत संक्षिप्त प्रक्रिया (Summary Procedure) का अधिक से अधिक उपयोग करें। यदि कोई ट्रिब्यूनल ऐसा नहीं करता है, तो उसे आदेश में इसका लिखित कारण (Reasons) दर्ज करना होगा।

हाई कोर्ट स्तर पर: उम्र के हिसाब से लिस्टिंग और विशेष बेंच

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) से अनुरोध किया।

सबसे पुराने केस पहले: लंबे समय से लंबित MACT अपीलों को उनकी पेंडेंसी (उम्र) के हिसाब से लिस्ट किया जाए। जो मामले ४ साल से अधिक पुराने हैं, उन्हें प्राथमिकता दी जाए। (जैसे- साढ़े आठ साल पुराने मामले ‘A’ की सुनवाई ४ साल पुराने मामले ‘B’ से पहले होगी)।

अतिरिक्त बेंच का गठन: पेंडेंसी के बोझ को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश इस बात की समीक्षा करें कि क्या उनके हाई कोर्ट में इसके लिए अतिरिक्त विशेष बेंच (Additional Benches) की आवश्यकता है।

विश्लेषण: MACT मामलों में देरी की कड़वी सच्चाई

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के स्तर पर किए गए आंतरिक विश्लेषण से देश में दुर्घटना दावों की जो तस्वीर उभरती है, वह बेहद चिंताजनक है।

देरी का पैमानासुप्रीम कोर्ट का डेटा और विश्लेषण (The Matrix)
ट्रिब्यूनल में औसत समयदावों के निपटारे में लगभग 6 वर्ष का समय बर्बाद हो जाता है।
हाई कोर्ट में औसत समयट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ अपील पर निर्णय आने में करीब 8 वर्ष लग जाते हैं।
ब्याज का बोझकोर्ट ने नोट किया कि कई मामलों में इतनी लंबी देरी हो जाती है कि जितने समय तक केस लंबित रहता है, उसका ब्याज (Interest) ही मूल मुआवजे की राशि का एक बड़ा हिस्सा बन जाता है, जिससे बीमा कंपनियों और सरकारी खजाने पर भी बोझ बढ़ता है।
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