Public Servant:कर्नाटक हाई कोर्ट हे देश में सूचना का अधिकार (RTI) कानून के बढ़ते इस्तेमाल और इसकी आड़ में सरकारी कर्मचारियों की व्यक्तिगत जिंदगी में तांक-झांक की कोशिशों पर नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
यह रही अदालत की टिप्पणी
हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने अपने आदेश में कानून की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, सिर्फ इस तथ्य से कि किसी लोक सेवक को लागू सेवा नियमों के तहत अपने नियोक्ता (Employer) या किसी वैधानिक प्राधिकरण को अपनी व्यक्तिगत जानकारी सौंपनी पड़ती है, वह जानकारी स्वतः ही आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक रूप से प्रकट करने योग्य नहीं हो जाती। यदि ऐसी व्याख्या को स्वीकार कर लिया गया, तो केवल सरकारी पद पर होने के कारण लोगों के एक पूरे वर्ग का निजता संरक्षण (RTI की धारा 8(1)(j) के तहत) पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा।
निजता के अधिकार को विस्तार से समझाया
अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए अपने निजता के अधिकार (Right to Privacy) को नहीं खो देता क्योंकि वह एक सरकारी कर्मचारी या लोक सेवक (Public Servant) है। अदालत ने लोक सेवकों की संपत्ति, देनदारियों, टैक्स रिकॉर्ड और पारिवारिक मामलों से जुड़ी जानकारियों को सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत किसी तीसरे पक्ष (Third Party) को सौंपने से साफ इनकार कर दिया।
मामला क्या था? (निजी कानूनी लड़ाई के लिए मांगी सरकारी कर्मचारी की संपत्ति का ब्योरा)
यह पूरा कानूनी विवाद एक निजी संपत्ति विवाद से शुरू हुआ था, जिसे आरटीआई के जरिए सुलझाने की कोशिश की जा रही थी।
आरटीआई आवेदन और अस्वीकृति: एस. सवित्रम्मा नामक महिला ने कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के केंद्रीय कार्यालय में तैनात डिप्टी कंट्रोलर एस. पी. जयपाल की संपत्ति और देनदारियों (Assets and Liabilities) का पूरा ब्योरा आरटीआई के तहत मांगा था। KSRTC ने इस जानकारी को व्यक्तिगत बताते हुए देने से मना कर दिया, जिसे कर्नाटक सूचना आयोग ने भी सही ठहराया। इसके बाद महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ता का तर्क: महिला के वकील जी. बी. नंदिश गौड़ा ने अदालत में दलील दी कि चूंकि जयपाल एक लोक सेवक हैं, इसलिए सेवा नियमों के तहत उनके द्वारा खरीदी गई कोई भी अचल संपत्ति और उसका विवरण ‘सार्वजनिक सूचना’ (Public Information) के दायरे में आता है। महिला का दावा था कि जयपाल ने उनके साथ कथित तौर पर धोखाधड़ी करके एक सेल डीड (बिक्री विलेख) हासिल की थी, और अदालती सिविल मुकदमों में मदद के लिए उन्हें इस जानकारी की जरूरत थी।
कोर्ट रूम एनालिसिस: सर्विस रूल्स का मकसद पारदर्शिता है, पब्लिक तमाशा नहीं
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने याचिकाकर्ता की दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सरकार या विभाग द्वारा अपने कर्मचारियों से संपत्ति का विवरण मांगने का एक विशिष्ट प्रशासनिक उद्देश्य होता है।
आंतरिक निगरानी के लिए है डेटा: कोर्ट ने नोट किया कि नियोक्ता या सक्षम प्राधिकारी द्वारा संपत्ति और देनदारियों के विवरण आमतौर पर सेवा नियमों का पालन सुनिश्चित करने, सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी (Probity) को बढ़ावा देने, हितों के टकराव (Conflict of Interest) की पहचान करने और सतर्कता या अनुशासनात्मक निगरानी (Vigilance Oversight) के लिए एकत्र किए जाते हैं।
तीसरे पक्ष को डेटा देने का ऑटोमैटिक अधिकार नहीं: जिस उद्देश्य के लिए विभाग यह जानकारी एकत्र करता है, उसके आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि इसे किसी तीसरे पक्ष (Third Party) को भी दिखाया जाए।
विश्लेषण: RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) और निजता का संतुलन
कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) को रेखांकित किया, जो किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है।
| आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के कड़े नियम | हाई कोर्ट का इस मामले में विधिक निष्कर्ष |
| व्यक्तिगत जानकारी का संरक्षण | लोक सेवक की व्यक्तिगत संपत्ति, देनदारियां, वित्तीय मामले, आय का विवरण, टैक्स रिकॉर्ड, पारिवारिक मामले और मेडिकल रिकॉर्ड आरटीआई के तहत सुरक्षित हैं। |
| जनहित बनाम निजता (Public Interest Test) | व्यक्तिगत जानकारी केवल तभी दी जा सकती है जब आवेदक यह साबित करे कि इसमें कोई ‘व्यापक जनहित’ (Larger Public Interest) शामिल है जो निजता के अधिकार से बड़ा है। |
| सबूत का बोझ (Burden of Proof) | व्यापक जनहित को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी उस व्यक्ति (आवेदक) पर होगी जो आरटीआई के तहत जानकारी मांग रहा है। |
| निजी दावों के लिए नो एंट्री | कोर्ट ने साफ कहा कि किसी निजी दीवानी मुकदमे या व्यक्तिगत दावे को मजबूत करने के लिए कानून द्वारा संरक्षित व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त करने के लिए आरटीआई का उपयोग नहीं किया जा सकता। |
अंतिम निर्णय: याचिका खारिज
हाई कोर्ट ने पाया कि सवित्रम्मा और जयपाल के बीच संपत्ति के लेन-देन को लेकर एक निजी कानूनी विवाद चल रहा है। महिला आरटीआई के जरिए जयपाल के निजी वित्तीय रिकॉर्ड हासिल करके अपने व्यक्तिगत सिविल सूट को आगे बढ़ाना चाहती थी। अदालत ने इसे कानून का दुरुपयोग मानते हुए महिला की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।

