Tuesday, June 16, 2026
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Divorce Case: क्या पत्नी घर के झगड़े का बहाना बना पति पर जातिसूचक शब्द का आरोप व SC-ST एक्ट का केस कर सकती है, जवाब यहां पढ़िए

Divorce Case: कर्नाटक हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच घर की चार दीवारों के भीतर होने वाले आपसी झगड़ों और जातिसूचक बयानों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कानून की बारीकियों पर आधारित विधिक व्यवस्था दी है।

पति ने दायर की थी याचिका

हाई कोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने आदेश में एक पति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) और निचली अदालत की कार्यवाही को आंशिक रूप से खारिज (Partly Quashed) कर दिया। कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के आरोपों को पूरी तरह से हटा दिया, हालांकि पति के खिलाफ दहेज उत्पीड़न (498A) और दहेज निषेध अधिनियम के तहत मुकदमा जारी रखने का निर्देश दिया है।

सार्वजनिक रूप से जातिसूचक शब्द का प्रयोग हो

अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी के खिलाफ घर के अंदर कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह स्वतः एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं बन जाता, क्योंकि इस कानून की बुनियादी शर्त यह है कि अपमान ‘सार्वजनिक रूप से’ या ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण (Public View) वाले स्थान’ पर होना चाहिए।

कानून के मूल सिद्धांतों को किया स्पष्ट

कानून के मूल सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में कहा, शिकायत में लगाए गए आरोप पूरी तरह से अस्पष्ट हैं और सार्वजनिक स्थान पर या जनता के सामने गाली-गलौज करने का कोई विशिष्ट उदाहरण नहीं दिया गया है। घर की चार दीवारों के भीतर, जहां पति और पत्नी आपसी झगड़े में कथित रूप से जाति का नाम लेकर एक-दूसरे को गाली देते हैं, उसका मतलब यह नहीं होगा कि यह एससी/एसटी अधिनियम के तहत एक दंडनीय अपराध बन जाएगा।

मामला क्या था? (शादी के बाद दर्जनों मुकदमों की झड़ी)

विवाह और विवाद की शुरुआत: यह विधिक विवाद एक दंपत्ति के बीच के गंभीर वैवाहिक कलह से उपजा है, जिसकी पृष्ठभूमि कुछ इस प्रकार है। याचिकाकर्ता (पति) और शिकायतकर्ता (पत्नी) की शादी अक्टूबर 2017 में हैदराबाद में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के रिश्ते खराब हो गए और उनके बीच कानूनी मुकदमों का सिलसिला शुरू हो गया।

चाकू मारने का आरोप: सबसे पहले पति ने पुलिस से शिकायत की थी कि उसकी पत्नी ने उस पर चाकू से हमला करने (Stab) की कोशिश की थी। इस शिकायत के तुरंत बाद, पत्नी ने फैमिली कोर्ट का रुख किया और शादी को शून्य (Annulment) घोषित करने की मांग की। ये दोनों मामले अदालतों में लंबित हैं।

दहेज और जातिसूचक गाली की FIR: इसके बाद, नवंबर 2022 में पत्नी ने बेंगलुरु पुलिस में एक नई शिकायत दर्ज कराई। उसने आरोप लगाया कि पति उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करता है और उसे जातिसूचक गालियां देता है। पुलिस ने जांच पूरी कर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी, जिसके बाद विशेष अदालत ने मामला दर्ज कर लिया। इस चार्जशीट और कार्यवाही को चुनौती देने के लिए पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

कोर्ट रूम बहस: पड़ोसियों को आवाज सुनाई देना सार्वजनिक दृष्टिकोण नहीं

सुनवाई के दौरान पति ने अदालत में खुद व्यक्तिगत रूप से (In Person) जिरह की। उसका तर्क था कि पत्नी की शिकायत में उन बुनियादी तत्वों (Ingredients) का पूरी तरह अभाव है जो एससी/एसटी एक्ट के तहत केस चलाने के लिए जरूरी हैं। उसने दावा किया कि उसकी पत्नी की कभी शादी में दिलचस्पी नहीं थी और उसे घर से भागने की आदत थी।

दूसरी ओर, अतिरिक्त राज्य लोक अभियोजक (Addl. SPP) बी.एन. जगदीशा ने पति की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों की सच्चाई को केवल मुकदमे (Trial) के दौरान गवाही और सबूतों के आधार पर ही परखा जा सकता है, महज़ पति के बयानों के आधार पर इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या

सार्वजनिक दृष्टिकोण (Public View) अनिवार्य: एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3 के तहत किसी भी अपमान को अपराध मानने के लिए यह अनिवार्य है कि वह घटना किसी ऐसे स्थान पर हुई हो जो जनता की नजरों में हो।

पड़ोसियों का सुनना काफी नहीं: कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि घर के अंदर हो रहा झगड़ा या गालियां बाहर पड़ोसियों को सुनाई दे रही थीं (Mere Audibility), कानून की इस शर्त को पूरा नहीं करता कि अपमान सार्वजनिक रूप से किया गया था।

मुकदमे का दुरुपयोग: अदालत ने माना कि एससी/एसटी एक्ट के तहत इस दंपत्ति के मामले में मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) और न्याय का मज़ाक होगा, क्योंकि यह पूरी तरह से एक घरेलू और व्यक्तिगत विवाद है।

विधिक विश्लेषण: कर्नाटक हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश

अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आईपीसी और विशेष कानूनों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींची है।

विधिक धारा / कानूनवर्तमान विधिक स्थिति (High Court’s Verdict)भविष्य की कार्यवाही
एससी/एसटी अधिनियम, 1989पूरी तरह से खारिज (Quashed); क्योंकि कथित घटना घर के भीतर (चार दीवारों में) हुई थी, सार्वजनिक स्थान पर नहीं।इस कानून के तहत पति को आगे किसी अदालती कार्यवाही का सामना नहीं करना होगा।
आईपीसी (जैसे 498A) और दहेज निषेध अधिनियम, 1961बरकरार (Sustained); कोर्ट ने माना कि दहेज प्रताड़ना के आरोपों को प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।पति को निचली अदालत में एक पूर्ण मुकदमे (Full-blown Trial) का सामना करना होगा और खुद को बेगुनाह साबित करना होगा।
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