Thursday, June 18, 2026
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Matrimonial Status: कथित पति की मृत्यु के बाद फैमिली कोर्ट में केस क्यों नहीं चल सकता…केरल हाईकोर्ट ने यह दिया जवाब

Matrimonial Status: फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को लेकर केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्याख्या की है।

अदालत ने मूल याचिका को किया वापस

हाई कोर्ट के डॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की खंडपीठ (Division Bench) ने रेणुका कुमारी द्वारा दायर वैवाहिक अपील (Mat. Appeal No. 194 of 2026) को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। अदालत ने तिरुवनंतपुरम फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह सही ठहराया जिसमें याचिकाकर्ता की मूल याचिका (Original Petition) को क्षेत्राधिकार के अभाव में वापस (Return) कर दिया गया था।

दीवानी अदालत में जाने की दी सलाह

अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला के कथित पति की मृत्यु मुकदमा दायर करने से पहले ही हो चुकी है, तो वह महिला अपनी वैवाहिक स्थिति (Matrimonial Status) घोषित करने या संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकती। ऐसी स्थिति में विवाद ‘पारिवारिक’ न रहकर विशुद्ध रूप से दीवानी (Civil Dispute) बन जाता है, जिसकी सुनवाई का अधिकार केवल सक्षम सिविल कोर्ट (Civil Court of Competent Jurisdiction) को है।

कोर्ट का यह वक्तव्य पर ध्यान दें

खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 के विधिक उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा, फैमिली कोर्ट का गठन जीवित पक्षों के बीच चल रहे वैवाहिक संबंधों और उससे उपजे पारिवारिक विवादों को सुलझाने और काउंसलिंग के माध्यम से विवाह संस्था को बचाने के लिए किया गया है। यदि याचिका दायर करने से पहले ही पति की मृत्यु हो चुकी है, तो वहां ‘वर्तमान वैवाहिक स्थिति’ (Matrimonial Status in praesenti) अस्तित्व में नहीं रहती। ऐसे में यह केवल संपत्ति का दीवानी विवाद है, न कि कोई पारिवारिक विच्छेद।

मामला क्या था? (पति की मौत के बाद मालिकाना हक की कानूनी लड़ाई)

यह मामला कानूनी दांव-पेच और फैमिली कोर्ट के दायरे के गलत इस्तेमाल से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता का दावा: रेणुका कुमारी ने वर्ष 2018 में तिरुवनंतपुरम फैमिली कोर्ट में एक याचिका (O.P. No. 18 of 2018) दायर की थी। उन्होंने दावा किया कि वह स्वर्गीय शशिकुमार की विधिक रूप से ब्याहता पत्नी हैं। उन्होंने शशिकुमार के साथ रहने वाली एक अन्य महिला और उसके दो बच्चों को प्रतिवादी (Respondents) बनाया था।

तीन मुख्य मांगें: याचिकाकर्ता ने कोर्ट से तीन राहतें मांगी थीं। इसमें पहली, उन्हें शशिकुमार की वैध पत्नी घोषित किया जाए; दूसरी, शशिकुमार की संपत्तियों का बंटवारा (Partition) किया जाए; और तीसरी, उन संपत्तियों से मिलने वाले मुनाफे (Mesne Profits) का हिस्सा उन्हें मिले।

विधिक पेच: प्रतिवादियों ने अदालत के सामने तथ्य रखा कि शशिकुमार की मृत्यु 3 दिसंबर 2016 को ही हो चुकी थी, जबकि रेणुका कुमारी ने फैमिली कोर्ट में यह मुकदमा उसकी मौत के दो साल बाद यानी 2018 में दायर किया। इसलिए फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7(1) के तहत यह केस यहां चलने योग्य ही नहीं है। फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इस तर्क को स्वीकार करते हुए याचिका वापस कर दी थी, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘कस्तूरी आर’ बनाम ‘बलराम यादव’ सिद्धांत

हाई कोर्ट ने कानून की बारीकियों और सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग फैसलों का विश्लेषण कर क्षेत्राधिकार की स्थिति साफ की।

मुख्य उद्देश्य संपत्ति है, विवाह केवल जरिया (Ancillary Claim)

जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार ने फैसले में नोट किया कि याचिकाकर्ता की मांगों को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसका मुख्य उद्देश्य मृत शशिकुमार की संपत्ति पर अधिकार पाना है। पत्नी घोषित करने की मांग केवल उस संपत्ति तक पहुंचने का एक कानूनी जरिया (सहायक मांग) है।

कस्तूरी आर. बनाम एम. कस्तूरी (2018) की नजीर

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले कस्तूरी आर. बनाम एम. कस्तूरी (2018) और केरल हाई कोर्ट के ही वृंदा बनाम मुक्ता (2022) के फैसलों को अपना मुख्य आधार बनाया। इन मामलों में तय किया गया था कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद दो पक्षकार खुद को उसकी पत्नी या संतान बताकर आपस में लड़ते हैं, तो वह ‘पारिवारिक विवाद’ के दायरे से बाहर हो जाता है।

‘बलराम यादव (2016)’ का सिद्धांत क्यों लागू नहीं होता?

याचिकाकर्ता के वकील किशोर डी. ने बलराम यादव बनाम फुलमनिया यादव (2016) के मामले का हवाला देकर दलील दी थी कि पति की मृत्यु के बाद भी फैमिली कोर्ट में शादी की वैधता तय हो सकती है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उस केस की परिस्थितियां अलग थीं। फैमिली कोर्ट का क्षेत्राधिकार तभी सक्रिय हो सकता है जब मुकदमा दायर करते समय दोनों पक्ष जीवित हों। मृत व्यक्ति को न तो समन भेजा जा सकता है और न ही उसके साथ समझौते या काउंसलिंग (Conciliation) की कोई कोशिश संभव है।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक निर्णय (11 जून 2026)
अपीलकर्तारेणुका कुमारी (खुद को वैध पत्नी बताने वाली याचिकाकर्ता)।
प्रतिवादी पक्षशशिकुमार के साथ रहने वाली दूसरी महिला और उसके बच्चे।
पीठ (Coram)डॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के.
मूल विधिक प्रश्नक्या पति की मृत्यु के बाद फैमिली कोर्ट में विवाह की घोषणा का केस दायर हो सकता है?
अदालत का विधिक उत्तरनहीं। यह मामला केवल सामान्य सिविल कोर्ट (Civil Court) में ही जा सकता है।
याचिकाकर्ता को विधिक संरक्षणहाई कोर्ट ने आदेश दिया कि फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट में बीते समय को मियाद (Limitation Period) में शामिल नहीं किया जाएगा; सिविल कोर्ट इस देरी को माफ कर नए सिरे से सुनवाई करे।
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