Thursday, June 18, 2026
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Wish of Minor: कस्टडी के मामलों में केवल बच्चे की इच्छा ही पर्याप्त नहीं; कनाडा में रह रही मां को क्यों सौंपी 12 वर्षीय बेटे की कस्टडी

Wish of Minor: केरल हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बच्चों की कस्टडी (Custody Matters) के विधिक सिद्धांतों को पुनः परिभाषित करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

एक प्रवासी भारतीय (NRI) मां की दायर याचिका हुई स्वीकार

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ (Division Bench) ने एक प्रवासी भारतीय (NRI) मां द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए पिता को निर्देश दिया है कि वह तत्काल 12 वर्षीय बेटे की कस्टडी मां को सौंपे। अदालत ने पिता के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि बच्चा केरल में अपने पिता के साथ ही रहना चाहता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता के अलगाव के मामलों में केवल बच्चे की किसी एक अभिभावक के साथ रहने की इच्छा (Mere Wish of Minor) ही कस्टडी तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। अदालत के लिए बच्चे का समग्र कल्याण और उसका भविष्य (Welfare of the Child) ही विधिक रूप से सर्वोपरि (Paramount Importance) है।

यह रही खंडपीठ की टिप्पणी

खंडपीठ ने कस्टडी मामलों में बच्चों के मनोविज्ञान और कानून के संतुलन पर टिप्पणी करते हुए कहा, “माता-पिता के बीच खिंचे और दोनों के प्रति प्यार की कशमकश में फंसा एक नाबालिग बच्चा अक्सर इस स्थिति में नहीं होता कि वह एक सचेत विधिक निर्णय ले सके या अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण प्राथमिकता (Intelligent Preference) व्यक्त कर सके। कस्टडी तय करने का कोई तय फॉर्मूला नहीं है; बच्चे की इच्छा जानना प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है, लेकिन उसकी तात्कालिक इच्छा से कहीं अधिक उसका दीर्घकालिक कल्याण और भविष्य सर्वोपरि है।”

मामला क्या था? (कनाडा से केरल यात्रा और कस्टडी की हेराफेरी)

यह अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कानूनों के घालमेल से जुड़ा एक संवेदनशील पारिवारिक और विधिक विवाद है।

कनाडा में कस्टडी और समझौता: याचिकाकर्ता महिला और उसका पति वर्ष 2024 में अलग हो गए थे। जनवरी 2024 में ‘कनाडा रेवेन्यू एजेंसी’ को सौंपे गए एक ‘चाइल्ड सपोर्ट अरेंजमेंट’ (Child Support Arrangement) के तहत पिता ने लिखित रूप से बच्चे की कस्टडी छोड़ दी थी और मां को ‘प्राइमरी केयरगिवर’ (मुख्य अभिभावक) स्वीकार करते हुए पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्च उठाने की सहमति दी थी। बच्चा तभी से कनाडा में मां के साथ रहकर पढ़ाई कर रहा था।

भारत यात्रा के दौरान वादाखिलाफी: हाल ही में महिला अपने बीमार पिता को देखने भारत आई थी। इस दौरान उसने सद्भावना दिखाते हुए बच्चे को केरल में रह रहे पिता के साथ कुछ समय बिताने की अनुमति दी ताकि पिता-पुत्र का बंधन (Bond) मजबूत रहे। लेकिन जब महिला की कनाडा वापसी का समय आया, तो पिता ने बच्चे को वापस सौंपने से साफ मना कर दिया।

पिता का विधिक तर्क: पिता के वकील ने दलील दी कि बच्चा अब अपनी मर्जी से भारत में ही रहना चाहता है और वह अपनी मां के साथ वापस कनाडा नहीं जाना चाहता। उसने दावा किया कि यह व्यवस्था दोनों की आपसी सहमति से हुई है।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘अस्थायी स्नेह’ और ‘दीर्घकालिक कल्याण’ का अंतर

मदालसा कोर्ट ने पिता के दावों को पूरी तरह विखंडित करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत सामने रखे।

परिपक्व सोच की आवश्यकता (Matured Thinking)

अदालत ने रेखांकित किया कि 12 वर्ष की आयु में बच्चे के भीतर इतनी परिपक्व सोच विकसित नहीं होती कि वह यह भांप सके कि किस देश या माहौल में रहने से उसका भविष्य और करियर सुरक्षित रहेगा। केरल में रहने के दौरान पिता के प्रति उपजा तात्कालिक स्नेह स्वाभाविक है, लेकिन इसके आधार पर उसकी नियमित स्कूली शिक्षा और कनाडा के स्थापित परिवेश को अचानक नहीं बदला जा सकता।

पिता का आचरण और पूर्व विधिक निष्क्रियता

कोर्ट ने इस बात पर कड़ा संज्ञान लिया कि अलगाव के बाद से पिता ने कभी भी बच्चे की कस्टडी के लिए किसी भी विधिक अदालत (Court of Law) का रुख नहीं किया था। समझौते के तहत उसने स्वेच्छा से मां को कस्टडी दी थी। ऐसे में भारत यात्रा का अनुचित लाभ उठाकर बच्चे को अपने पास रोक लेना विधिक रूप से गलत आचरण है।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक आदेश (जून 2026)
याचिकाकर्ताकनाडा निवासी प्रवासी भारतीय (NRI) मां।
प्रतिवादी पक्षकेरल में रह रहा पति (पिता)।
बच्चे की उम्र12 वर्ष (जो 2024 से कनाडा में पढ़ रहा है)।
मुख्य विधिक आधारगार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत बच्चे का कल्याण (Welfare) ही एकमात्र विधिक पैमाना है।
अदालत का अंतिम आदेशपिता तत्काल प्रभाव से अदालत परिसर में ही बच्चे को मां के सुपुर्द करे, क्योंकि मां की अगले ही दिन कनाडा की फ्लाइट थी।
मुलाकात के अधिकार (Visitation Rights)पिता को भविष्य में आवश्यकतानुसार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Video Conferencing) के जरिए बच्चे से बातचीत करने और वर्चुअली जुड़ने की अनुमति दी गई है।
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