Thursday, June 18, 2026
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Case In Trial: UAPA के मामलों में 12 साल की कैद और जमानत का विधिक संकट…यहां जानिए केए नजीब के सिद्धांत के बारे में विस्तार से

Case In Trial: सुप्रीम कोर्ट ने आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत आरोपियों के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 21) और जमानत की कठोर शर्तों के बीच विधिक संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया है।

मुकदमे में अत्यधिक देरी होने पर यूएपीए मामले में जमानत संभव

जस्टिस जॉयमालय बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) पर सुनवाई की। अदालत ने दिल्ली में एक कथित अवैध हथियार और गोला-बारूद फैक्ट्री से जुड़े आतंकी साजिश के मामले में पिछले 12 से अधिक वर्षों से सलाखों के पीछे बंद कथित इंडियन मुजाहिद्दीन (IM) के दो गुर्गों की जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही कोर्ट ने मौखिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले पर विचार करते समय देश के बहुचर्चित ‘के.ए. नजीब (KA Najeeb)’ फैसले के सिद्धांत पूरी ताकत से लागू होंगे, जिसमें कहा गया था कि मुकदमे (Trial) में अत्यधिक देरी होने पर यूएपीए मामलों में भी जमानत दी जा सकती है।

मामला क्या था? (2011 की एफआईआर और राजस्थान मॉड्यूल)

यह विधिक विवाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा नवंबर 2011 में कथित इंडियन मुजाहिद्दीन के सदस्य मोहम्मद कतील सिद्दीकी की गिरफ्तारी के बाद दर्ज की गई एक प्राथमिकी (FIR) से उपजा है।

अभियोजन का दावा: पुलिस का आरोप था कि जांच के दौरान प्रतिबंधित संगठन की एक बड़ी साजिश का खुलासा हुआ, जिसके तहत दिल्ली में हथियारों की अवैध फैक्ट्री चलाई जा रही थी।

2014 में गिरफ्तारियां: याचिकाकर्ता अंसारी और अजहर को मार्च 2014 में पाकिस्तानी नागरिक जिया-उर-रहमान उर्फ ​​वकास की गिरफ्तारी के बाद पकड़ा गया था। अभियोजन का आरोप है कि ये दोनों इंडियन मुजाहिद्दीन के ‘राजस्थान मॉड्यूल’ के सक्रिय सदस्य थे और आतंकी हमलों की तैयारी में शामिल थे।

हाई कोर्ट से झटका: अप्रैल 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट (जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की पीठ) ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने दलील दी थी कि आरोपियों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं, वे राजस्थान के एक जुड़े हुए मामले में पहले ही दोषी ठहराए जा चुके हैं, और केवल लंबे समय तक जेल में रहने (Prolonged Incarceration) के आधार पर यूएपीए की धारा 43D(5) के कड़े प्रतिबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी और यूएपीए जमानत की विधिक कशमकश

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल कौशिक ने दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश पूरी तरह तर्कसंगत है और उसने सुप्रीम कोर्ट के हालिया ‘गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य’ (जनवरी 2026) के फैसले के सिद्धांतों का सही पालन किया है (जिसमें दिल्ली दंगों के 5 आरोपियों को जमानत मिली थी लेकिन उमर खालिद और शर्जील इमाम को इनकार कर दिया गया था)।

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस तर्क पर कड़ा संदेह व्यक्त करते हुए एएसजी से कहा, कैसा तर्कसंगत आदेश? जिस फैसले (गुलफिशा फातिमा/उमर खालिद केस) का आप हवाला दे रहे हैं, वह खुद बड़ी बेंच के संदर्भ (Reference) के लिए लंबित है। आप क्या कह रहे हैं? इस मामले में ‘के.ए. नजीब’ का सिद्धांत पूरी ताकत (With all force) से लागू होगा, बशर्ते कि उसे गुलफिशा फातिमा के मामले में जिस तरह व्याख्यायित किया गया है। आपको पहले अपना जवाबी हलफनामा (Counter) दाखिल करना होगा।

पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट में यूएपीए बनाम अनुच्छेद 21 की बड़ी कानूनी जंग

जस्टिस बागची की पीठ की यह टिप्पणी इस समय देश में चल रहे एक बड़े विधिक मंथन की ओर इशारा करती है। दरअसल, यूएपीए मामलों में जमानत के नियम वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी खंडपीठ (Larger Bench) के समक्ष विचाराधीन हैं।

न्यायविदों में मतभेद: पिछले महीने, जस्टिस ए. कॉप्टिक कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने दिल्ली दंगों के आरोपी खालिद सैफी और तस्लीम अहमद को अंतरिम जमानत देते हुए यूएपीए की जमानत न्यायशास्त्र (Jurisprudence) से जुड़े कई अहम सवालों को बड़ी बेंच को भेज दिया था।

नजीब बनाम गुलफिशा विवाद: यह संदर्भ तब आवश्यक हुआ जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम एनआईए’ मामले में ‘गुलफिशा फातिमा’ (उमर खालिद की जमानत खारिज होने वाले) फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई थी। जस्टिस नागरत्ना की पीठ का मानना था कि उमर खालिद को जमानत न देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने ‘के.ए. नजीब’ फैसले के सिद्धांतों के विपरीत था।

संवैधानिक प्रश्न: जहां ‘के.ए. नजीब’ फैसला कहता है कि त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के अधिकार के तहत अत्यधिक देरी होने पर यूएपीए की धारा 43D(5) की कठोर शर्तें बेअसर हो जाती हैं; वहीं ‘गुलफिशा फातिमा’ फैसले में कहा गया कि केवल देरी के आधार पर यूएपीए में जमानत नहीं मिल सकती, कोर्ट को आरोपों की गंभीरता भी देखनी होगी। अब बड़ी बेंच यह तय कर रही है कि संसद द्वारा बनाए गए कड़े कानून और संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच सर्वोच्च कौन है।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुविवरण एवं सुप्रीम कोर्ट का तात्कालिक रुख (जून 2026)
याचिकाकर्तामोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर (12+ साल से जेल में बंद)।
प्रतिवादी पक्षदिल्ली पुलिस (स्पेशल सेल) / केंद्र सरकार।
सुनवाई करने वाली पीठजस्टिस जॉयमालय बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली।
मुख्य कानूनी सवालक्या यूएपीए मामले में 12 साल की बिना ट्रायल या सुस्त ट्रायल वाली कैद जमानत का आधार है?
अदालत का अंतरिम आदेशदिल्ली पुलिस को नोटिस जारी; जवाब दाखिल करने का निर्देश।
विधिक नजीरK.A. Najeeb v. Union of India (2021) के सिद्धांत इस मामले पर पूरी तरह प्रभावी होंगे।
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