Physical Attendance: मद्रास हाईकोर्ट ने कानूनी शिक्षा (Legal Education) में अनुशासन, नैतिकता और शारीरिक उपस्थिति (Physical Attendance) की विधिक अनिवार्यता को सर्वोपरि बताते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
अटेंडेंस की कमी वाले 3 लॉ छात्रों को परीक्षा में बैठने का मामला
हाई कोर्ट के जस्टिस एस.एम. सुब्रमण्यम और जस्टिस एन. सेंथिलकुमार की खंडपीठ (Division Bench) ने तमिलनाडु डॉ. अंबेडकर लॉ यूनिवर्सिटी द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए एकल पीठ (Single Judge) के उस पुराने आदेश को पूरी तरह पलट (Set Aside) दिया। जिसके तहत अटेंडेंस की कमी वाले 3 लॉ छात्रों को परीक्षा में बैठने की विशेष विधिक राहत दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) उपकरण जैसे ChatGPT या ऑनलाइन कक्षाएं कभी भी एक जीवंत भौतिक कक्षा (Physical Classroom) और एक योग्य शिक्षक का विकल्प नहीं बन सकतीं।
तकनीकी युग में मानवीय विधिक शिक्षा के महत्व को समझाया
अदालत ने तकनीकी युग में मानवीय विधिक शिक्षा के महत्व को समझाते हुए अपने ऐतिहासिक निष्कर्ष में कहा, नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित होने के कई विधिक और नैतिक लाभ हैं, जो केवल ज्ञान प्राप्त करने से कहीं आगे जाते हैं। यह छात्रों में आत्म-अनुशासन, समयबद्धता, सक्रिय भागीदारी और सकारात्मक सामाजिक व्यवहार की भावना पैदा करता है। इसलिए ऑनलाइन कक्षाओं को भौतिक कक्षाओं के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके अलावा, न तो ChatGPT और न ही कोई अन्य AI टूल कभी भी एक योग्य व्याख्याता (Lecturer) की बराबरी कर सकता है।
मामला क्या था? (दिसंबर 2025 का एकल पीठ का आदेश और यूनिवर्सिटी की अपील)
यूनिवर्सिटी की कार्रवाई: यह पूरा विधिक विवाद लॉ (कानून) के तीन छात्रों द्वारा दायर रिट याचिकाओं से शुरू हुआ। इन छात्रों को सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया था क्योंकि उनकी कुल अटेंडेंस बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा निर्धारित अनिवार्य मानदंडों से काफी कम थी। छात्रों ने यूनिवर्सिटी के इस फैसले को चुनौती दी थी।
एकल पीठ का अंतरिम आदेश: एकल पीठ ने छात्रों के प्रति नरम रुख अपनाते हुए उनकी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था। कोर्ट ने छात्रों को अगले (8वें) सेमेस्टर की पढ़ाई जारी रखने और परीक्षा देने की अनुमति दे दी थी, और 7वें सेमेस्टर की कमी को मई-जून 2026 की छुट्टियों के दौरान ‘फ्लेक्सिबल मोड’ (वैकल्पिक माध्यमों) से पूरा करने की विलासिता प्रदान की थी। साथ ही, एकल पीठ ने बीसीआई को अपने नियमों पर पुनर्विचार करने की सलाह भी दे डाली थी।
खंडपीठ का सख्त रुख: यूनिवर्सिटी ने इस आदेश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी, जिसने एकल पीठ के दृष्टिकोण को पूरी तरह विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण माना।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: कानून केवल पैसा कमाने के लिए नहीं
मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने छात्रों को किसी भी तरह की विधिक रियायत देने से साफ इनकार करते हुए निम्नलिखित कड़े विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए।
बीसीआई नियम 12 (Rule 12 of BCI Rules) की लक्ष्मण रेखा
अदालत ने रेखांकित किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कानूनी शिक्षा नियमों का नियम 12 स्पष्ट रूप से न्यूनतम 70% अटेंडेंस की मांग करता है। यदि छात्र के पास कोई बेहद ठोस और पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) हो, तो भी इसे केवल 65% तक ही शिथिल (Relax) किया जा सकता है। इससे नीचे किसी भी तरह की छूट देना कानून के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा।
AI टूल ‘ईमानदारी और नैतिकता’ नहीं सिखा सकते
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भले ही मानव बुद्धि के करीब पहुंच जाए, लेकिन यह छात्रों को सत्यनिष्ठा (Integrity) और नैतिकता (Morality) नहीं सिखा सकता, जो कानूनी पेशे के मुख्य नैतिक स्तंभ हैं। ये गुण केवल एक जीवंत और विविध विचारों वाले क्लासरूम में सहपाठियों और शिक्षकों के बीच रहकर ही सीखे जा सकते हैं।
नियमित आने वाले छात्रों के साथ अन्याय होगा
अदालत ने कहा कि नियमों को ताक पर रखकर कम अटेंडेंस वाले कुछ चुनिंदा छात्रों को राहत देना उन बहुसंख्यक छात्रों के साथ घोर विधिक अन्याय होगा जो रोज़ लगन से क्लास आते हैं और वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
सामाजिक और संवैधानिक प्रतिबद्धता
अदालत ने लॉ के छात्रों को उनके विशेषाधिकार की याद दिलाते हुए कहा कि भारत जैसे देश में जहां आर्थिक और सामाजिक रूप से चुनौतीपूर्ण पृष्ठभूमि से आने वाले कई योग्य बच्चों को उनकी पसंद का कोर्स नहीं मिल पाता, वहां सीट पाने वाले छात्रों को उसकी कद्र करनी चाहिए। कानूनी शिक्षा केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज और देश के संविधान के प्रति एक प्रतिबद्धता है।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | मद्रास उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक आदेश (जून 2026) |
| अपीलकर्ता | तमिलनाडु डॉ. अंबेडकर लॉ यूनिवर्सिटी (प्रतिनिधित्व: सीनियर एडवोकेट ए. थियागराजन)। |
| विपक्षी पक्ष | बी. वधनन और अन्य 2 लॉ छात्र (प्रतिनिधित्व: सीनियर एडवोकेट पी.एम. सुब्रमण्यन)। |
| बार काउंसिल (BCI) का पक्ष | एडवोकेट एस.आर. रघुनंदन (अनिवार्य 70% अटेंडेंस के नियम का समर्थन)। |
| रद्द आदेश | एकल पीठ का आदेश दिनांक 17.12.2025 (जिसमें लचीले ढंग से अटेंडेंस पूरी करने की छूट थी)। |
| अदालत का अंतिम विधिक आदेश | छात्रों को कोई राहत नहीं; बिना अनिवार्य अटेंडेंस (न्यूनतम 65-70%) के कोई भी छात्र परीक्षा में नहीं बैठ सकता। |

