Thursday, November 5, 2026
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Maintenance Case: मृतक पति की संपत्ति से गुजारा भत्ते का बकाया वसूल सकती है पूर्व पत्नी…लेकिन रकम बढ़ाने की मांग नहीं कर सकती

Maintenance Case: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूर्व पत्नी और मृतक पति की संपत्ति (Estate) के विधिक अधिकारों के मध्य एक महत्वपूर्ण कानूनी संतुलन स्थापित करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है।

पत्नी से दायर अपील को किया खारिज

हाई कोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने मई (2026) में पारित अपने आदेश में यह महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी। अदालत ने 62 वर्षीय वर्षा (दिवंगत नरेन गोरेगांवकर की पूर्व पत्नी) द्वारा दायर एक अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक तलाकशुदा महिला अपने दिवंगत पति की संपत्ति या उसके कानूनी वारिसों से गुजारा भत्ते (Maintenance) की बकाया राशि (Arrears) तो वसूल सकती है, लेकिन पति की मृत्यु के बाद उस भत्ते की रकम को बढ़ाने (Enhancement) की मांग नहीं कर सकती। अदालत ने माना कि ऐसी अनुमति देने से “मुकदमेबाजी के बाढ़ के द्वार (Floodgates to litigation)” खुल जाएंगे।

भत्ते की राशि बढ़ाने के विधिक सिद्धांत को स्पष्ट किया

न्यायालय ने भत्ते की राशि बढ़ाने के विधिक सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा, गुजारा भत्ते में न्यायसंगत वृद्धि तय करने के लिए अदालत को हमेशा ‘पत्नी की आवश्यकताओं’ और ‘पति की वास्तविक वित्तीय क्षमता’ के बीच संतुलन बनाना होता है। जब पति की मृत्यु हो चुकी हो, तो इस न्यायिक समीकरण का वह महत्वपूर्ण दूसरा पक्ष (पति की क्षमता और पक्ष रखने का अधिकार) पूरी तरह गायब हो जाता है। ऐसी स्थिति में भत्ते को बढ़ाना विधिक रूप से अनुचित होगा।

मामला क्या था? (50 साल पुराना वैवाहिक सफर और विधिक विवाद)

यह विधिक विवाद करीब पांच दशक पुरानी वैवाहिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है।

विवाह और तलाक: वर्षा और नरेन गोरेगांवकर का विवाह जनवरी 1974 में हुआ था, लेकिन वे 1977 में बिना किसी संतान के अलग हो गए। साल 1980 में नरेन द्वारा दायर तलाक की याचिका को अदालत ने मंजूर कर लिया और नरेन को आदेश दिया कि वह वर्षा को ₹6,000 प्रति माह गुजारा भत्ता दे।

पति की मृत्यु और याचिका: मार्च 2012 में नरेन की मृत्यु हो गई। इसके बाद वर्षा ने फैमिली कोर्ट का रुख कर नरेन की संपत्ति से गुजारे भत्ते के लंबित बकाए (Arrears) की मांग की और साथ ही बदलती महंगाई व चिकित्सा खर्चों का हवाला देकर भत्ते की रकम बढ़ाने की भी विधिक गुहार लगाई।

फैमिली कोर्ट का रुख: फरवरी 2023 में फैमिली कोर्ट ने वर्षा को बकाया राशि वसूलने की अनुमति तो दे दी, लेकिन भत्ता बढ़ाने की मांग खारिज कर दी। इसी फैसले के खिलाफ वर्षा ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘सिविल डिक्री’ बनाम ‘वारिसों की कमाई’

नरेन के कानूनी वारिसों की ओर से पेश अधिवक्ता प्रदीप चव्हाण के तर्कों से सहमति जताते हुए हाई कोर्ट ने दो अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांतों को रेखांकित किया।

गुजारा भत्ते की डिक्री ‘सिविल डिक्री’ की तरह लागू रहती है

अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबित वैवाहिक विवाद (जैसे तलाक का मुकदमा) पति की मृत्यु के साथ ही समाप्त (Abate) हो जाते हैं। लेकिन, यदि गुजारा भत्ते की डिक्री पहले ही फाइनल (Finalised Decree) हो चुकी है, तो उसे एक सामान्य ‘सिविल डिक्री’ की तरह माना जाएगा। इसका अर्थ यह है कि पति की मृत्यु के बाद भी उसकी संपत्ति या वारिस उस डिक्री के तहत संचित बकाए को चुकाने के लिए विधिक रूप से बाध्य हैं।

वारिसों की वित्तीय तरक्की में पूर्व पत्नी का कोई विधिक हिस्सा नहीं

अदालत ने भत्ता बढ़ाने की मांग को खारिज करते हुए तर्क दिया कि यदि पति की मृत्यु के बाद वारिसों के हाथ में आई संपत्ति की काल्पनिक वृद्धि (Notional Growth) के आधार पर भत्ता बढ़ाया जाता है, तो यह वारिसों के साथ सरासर अन्याय होगा। कोर्ट ने कहा, यदि संपत्ति की तरक्की पूरी तरह से कानूनी वारिसों की अपनी मेहनत और कर्मों के कारण हुई है, तो उसमें पूर्व पत्नी को हिस्सा देना विधिक रूप से बेतुका (Absurdity) होगा। अगर पति ने अपने जीवनकाल में संपत्ति बनाई होती, तो पत्नी निश्चित रूप से वृद्धि की हकदार होती। परंतु, पति के विधिक वारिस अपनी वित्तीय तरक्की को पिता की पूर्व पत्नी के साथ साझा करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुबॉम्बे उच्च न्यायालय का विधिक रुख (मई 2026)
अपीलकर्तावर्षा (62 वर्षीय, दिवंगत नरेन गोरेगांवकर की पूर्व पत्नी)।
प्रतिवादी पक्षनरेन गोरेगांवकर के कानूनी वारिस (Legal Heirs)।
पीठ (Coram)जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे।
स्थापित विधिक नियम 1पति की मृत्यु के बाद भी पूर्व पत्नी उसकी संपत्ति से पुराना बकाया भत्ता वसूल सकती है।
स्थापित विधिक नियम 2पति की मृत्यु के बाद परिस्थितियों के बदलने पर भी भत्ते की रकम को बढ़ाया नहीं जा सकता।
अदालत का अंतिम आदेशफैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज।
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