Friday, June 19, 2026
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Interfaith Couple: स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत 30 दिनों का नोटिस पीरियड माफ करने से क्यों किया कोर्ट ने इनकार…जानें इसकी वजह

Interfaith Couple: विदेशों में नौकरी या व्यक्तिगत व्यस्तताओं के नाम पर विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act, 1954) के तहत अनिवार्य 30 दिनों की प्रतीक्षा अवधि (Waiting Period) में ढील मांगने वाले जोड़ों को दिल्ली हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है।

एक अंतरधार्मिक जोड़े की दायर रिट याचिका खारिज

हाई कोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने एक अंतरधार्मिक जोड़े (Interfaith Couple) द्वारा दायर रिट याचिका (Writ Petition) को पूरी तरह खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी। याचिकाकर्ताओं ने कालकाजी (दिल्ली) के विवाह अधिकारी (Marriage Officer) को निर्देश देने की मांग की थी कि उनके विवाह के नोटिस की अनिवार्य 30 दिनों की अवधि को माफ (Waive/Exempt) कर उनके विवाह को तुरंत संपन्न कराया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून के स्पष्ट प्रावधानों को व्यक्तिगत सहूलियत या दिक्कतों के आधार पर बदला या कम नहीं किया जा सकता।

संवैधानिक सीमाओं और विधायी शक्तियों का हवाला

न्यायालय ने संवैधानिक सीमाओं और विधायी शक्तियों का हवाला देते हुए अपने विधिक आदेश में दर्ज किया। कहा, एक बार जब कानून ने स्वयं स्पष्ट कर दिया है कि विवाह केवल 30 दिनों की अवधि बीतने के बाद ही संपन्न हो सकता है, तो यह अदालत रिट क्षेत्राधिकार (Article 226) के तहत अधिकारियों को कानून के विपरीत काम करने का निर्देश नहीं दे सकती। वैधानिक जनादेश (Statutory Mandate) का उल्लंघन करने पर अधिकारियों को इस कानून के तहत दंडात्मक परिणाम (Penal Consequences) भी भुगतने पड़ सकते हैं। अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं, लेकिन वे संसद द्वारा बनाए गए ढांचे को नए सिरे से नहीं लिख सकतीं।

मामला क्या था? (विदेश में नौकरी की मजबूरी बनाम विधिक औपचारिकता)

यह याचिका एक ऐसे जोड़े द्वारा दायर की गई थी जिसकी निजी परिस्थितियां बेहद जरूरी थीं।

नौकरी का दबाव: याचिकाकर्ता संख्या-1 (दूल्हा) को विदेश में एक नई नौकरी (Overseas Employment) मिली थी और उसे हर हाल में 10 जून 2026 से पहले वहां ज्वाइन करना अनिवार्य था।

समय का विधिक गणित: जोड़े ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह का आधिकारिक नोटिस 11 मई 2026 को विवाह अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया था। कानून के नियमों के अनुसार, 30 दिनों की वैधानिक प्रतीक्षा अवधि पूरी होने के बाद उनके विवाह की तिथि 19 जून 2026 तय की गई थी।

जोड़े की गुहार: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यदि उन्हें जून के पहले सप्ताह में शादी करने की अनुमति नहीं दी गई, तो दूल्हे की अंतरराष्ट्रीय नौकरी हाथ से निकल जाएगी, जिससे उन्हें अपूरणीय व्यक्तिगत और वित्तीय क्षति होगी।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “कानून सख्त है, लेकिन वह कानून है”

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने याचिकाकर्ताओं की सभी दलीलों को खारिज करते हुए देश की विधिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित किया।

वैधानिक सिद्धांत: Dura Lex Sed Lex (कानून कड़ा है, पर कानून है)

जोड़े की व्यक्तिगत कठिनाई पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने इस प्रसिद्ध विधिक सूक्ति का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा, “व्यक्तिगत असुविधा या कठिनाई, चाहे वह कितनी भी वास्तविक क्यों न हो, अनिवार्य वैधानिक अनुपालन को कमजोर या बायपास करने का आधार नहीं बन सकती।” कानून बनाते समय संसद को उन सभी व्यावहारिक कठिनाइयों का अंदाजा होता है जो नागरिकों को आ सकती हैं, फिर भी सार्वजनिक हित में नियम तय किए जाते हैं।

यह केवल ‘प्रक्रिया’ नहीं, बल्कि ‘मूल ढांचा’ है

अदालत ने स्पष्ट किया कि 30 दिनों का नोटिस पीरियड कोई महज कागजी या प्रशासनिक औपचारिकता (Procedural Formality) नहीं है। यह अधिनियम की धारा 16 और पूरी विधायी योजना का एक अभिन्न हिस्सा है, ताकि यदि किसी को इस विवाह पर विधिक आपत्ति (Objections) दर्ज करानी हो, तो उसे पर्याप्त समय मिल सके।

मेंडेमस (Mandamus) के जरिए कानून तोड़ने का आदेश नहीं

सुप्रीम कोर्ट के पुराने स्थापित फैसलों की नजीर देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि अदालतों को सरकार या अधिकारियों को ऐसा कोई ‘परमादेश’ (Mandamus) जारी करने का अधिकार नहीं है जो उन्हें देश के कानून का उल्लंघन करने के लिए मजबूर करे। अगर अदालतें ऐसा करने लगेंगी, तो यह व्याख्या नहीं बल्कि न्यायिक कानून-निर्माण (Judicial Legislation) कहलाएगा, जो न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में नहीं आता।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुदिल्ली उच्च न्यायालय का विधिक आदेश (18 जून 2026)
याचिकाकर्ताअंतरधार्मिक विवाह करने का इच्छुक जोड़ा।
संबंधित सरकारी कार्यालयमैरिज ऑफिसर (विवाह अधिकारी), कालकाजी, दिल्ली।
अधिनियम/धारास्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 (Special Marriage Act) की धारा 6, 7 और 16।
सुनवाई करने वाले जजजस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव।
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका खारिज। जोड़ा 19 जून 2026 को वैधानिक अवधि पूरी होने के बाद ही शादी कर सकता है।
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