Tuesday, August 4, 2026
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Ladies’ Advocate: गाजियाबाद कोर्ट परिसर में महिला वकील सुबह 10 बजे के बाद नहीं जाती हैं शौचालय…जानिए बुनियादी सुविधाओं से जुड़े केस से

Ladies’ Advocate: देश भर की अदालतों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी और उनके सम्मान से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक विधिक टिप्पणी की है।

निचली अदालत परिसर में महिला वकील की सुविधाओं का घोर अभाव

शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने महिला अधिवक्ताओं के एक समूह द्वारा देश भर की अदालतों के जमीनी सर्वेक्षण के आधार पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह विधिक व्यवस्था दी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अदालती परिसरों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी ढांचा (Infrastructure) और अलग ‘लेडीज बार रूम’ (Ladies’ Bar Rooms) की उपलब्धता सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत ‘गरिमापूर्ण जीवन’ (Right to Dignity) से जुड़ी हुई है।

देशव्यापी सर्वेक्षण के चौंकाने वाले विधिक तथ्य (Pathetic Reality of Courts)

याचिकाकर्ता महिला वकीलों ने कोर्ट के सामने एक विस्तृत राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण (Nationwide Survey) और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन (PPT) पेश किया, जिसने अदालतों की बदहाल स्थिति को उजागर किया।

“महिलाएं अदालतों के लिए नहीं बनीं” जैसी भावना: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गुसाईं ने दिल्ली से सटे एनसीआर (NCR) क्षेत्रों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा— “गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा जैसे प्रमुख शहरों की अदालतों में भी महिलाओं के लिए कोई समर्पित बार रूम नहीं है। ऐसा महसूस कराया जाता है जैसे हमें वहां होना ही नहीं चाहिए, हम वहां दिखने नहीं चाहिए।”

गाजियाबाद का ’10 से 1 बजे’ का कड़वा नियम: महिला वकील ने कोर्ट को बताया कि गाजियाबाद कोर्ट में बुनियादी सुविधाओं (जैसे साफ टॉयलेट या चेंजिंग रूम) के अभाव के कारण महिला वकीलों को सुबह 10 से केवल दोपहर 1 बजे तक ही रुकने की सलाह दी जाती है। सुबह बच्चों को स्कूल और पति को दफ्तर भेजने के बाद वे कोर्ट आएं और दोपहर 1 बजे तक वापस चली जाएं, क्योंकि वहां शाम 4 बजे तक रुकने की कोई व्यवस्था नहीं है।

रूढ़िवादिता और ताले: कोर्ट को बताया गया कि मथुरा में लेडीज बार रूम में ताला लटका रहता है, जबकि रोहतक जैसी जगहों पर चुनावी वादे के समय मिलने वाली सुविधाएं बाद में निष्क्रिय हो जाती हैं। यहां तक कि कुछ जगहों पर यह दकियानूसी टिप्पणी भी की जाती है कि महिलाओं को बार रूम की जरूरत नहीं है क्योंकि वे वहां “राजनीति शुरू कर देंगी।”

सुप्रीम कोर्ट का विधिक रुख: ‘सिर्फ दरवाजे खोलना काफी नहीं’

सीजेआई की पीठ ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करते हुए और महिला वकीलों के शोध (Research) की सराहना करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्थापित किए।

अनुच्छेद 21 के तहत विधिक बाध्यता

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब महिला वकील अपने दिन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अदालती परिसरों में बिताती हैं, तो उनकी गोपनीयता (Privacy), सुरक्षा, आराम और पेशेवर कामकाज के लिए बैठने की व्यवस्था, स्वच्छ शौचालय, चेंजिंग रूम और नर्सिंग सुविधाएं (Nursing Facilities) देना कोई प्रशासनिक विशेषाधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। ‘लाइफ’ (Life) शब्द के विधिक दायरे में गरिमापूर्ण अस्तित्व शामिल है।

सार्थक भागीदारी के लिए अनुकूल माहौल जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा, पिछले कुछ दशकों में कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। लेकिन सिर्फ अदालतों के दरवाजे खोल देना ही जश्न मनाने का कारण नहीं हो सकता। जब तक हम उन्हें पुरुषों के समान और सुरक्षित विधिक माहौल नहीं देंगे, तब तक उनकी यह भागीदारी सार्थक नहीं कहलाएगी।”

‘यंग लॉयर्स फंड’ और ‘पे-बैक’ विधिक मॉडल

इसी याचिका के दूसरे भाग में जूनियर वकीलों की आर्थिक तंगी का मुद्दा भी जुड़ा था, जिस पर कोर्ट ने “यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड” (Young Lawyers’ Professional Assistance Fund) के गठन की अपनी रूपरेखा को दोहराया:

आर्थिक तंगी से प्रतिभाओं का नुकसान: कोर्ट ने माना कि पहली पीढ़ी (First-generation) के वकीलों को शुरुआत में मुवक्किल या निश्चित आय नहीं मिलती, जिसके कारण वे वकालत छोड़ देते हैं। यह विधिक जगत का एक बड़ा नुकसान (Brain Drain) है।

फंडिंग का ढांचा: वरिष्ठ वकीलों के दान (जिस पर उन्हें टैक्स छूट मिले), कोर्ट फीस का एक हिस्सा और अदालती जुर्मानों से यह कोष तैयार होगा।

3 से 7 साल का सपोर्ट और रिफंड: पहली पीढ़ी और पिछड़े वर्ग के जूनियर वकीलों को शुरुआती 3 साल तक पूरा वजीफा मिलेगा, जो 7 साल तक धीरे-धीरे कम होकर समाप्त हो जाएगा। बाद में सफल होने पर वे वकील मासिक किश्तों में इस फंड को पैसा वापस (Pay back) करेंगे ताकि यह स्व-पोषी (Self-sustaining) बना रहे।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुउच्चतम न्यायालय की महत्वपूर्ण विधिक घोषणा
माननीय पीठ (Coram)मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना।
प्रमुख विधिक मुद्दाअदालतों में महिलाओं के लिए बुनियादी ढांचे की कमी और जूनियर वकीलों की आर्थिक तंगी।
संवैधानिक जुड़ावमहिला वकीलों को ‘लेडीज बार रूम’ और बुनियादी सुविधाएं देना अनुच्छेद 21 के तहत अनिवार्य।
चिह्नित क्षेत्र (उदाहरण)गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा, मथुरा (UP) और रोहतक (Haryana) आदि में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी।
प्रस्तावित विधिक कोषयंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड (शुरुआती वित्तीय सहायता के लिए)।
न्यायालय का अगला कदमभारत के महान्यायवादी (AG), सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं (Advocate Generals) को अदालत की सहायता के लिए नोटिस जारी।
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