Friday, June 26, 2026
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WhatsApp Pix: प्रश्नपत्र की फोटो खींचकर WhatsApp Pix के तौर पर भेजना प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं, आईटी एक्ट की धारा 66E को यहां समझिए

WhatsApp Pix: गुजरात हाईकोर्ट ने परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र (Question Paper) की फोटो खींचकर उसे वॉट्सऐप (WhatsApp) के जरिए बाहर भेजने के एक मामले में सुनवाई हुई।

WhatsApp Pix भेजने के तहत प्राइवेसी उल्लंघन

हाईकोर्ट के जस्टिस पी.एम. रावल की एकल पीठ ने साल 2018 में दर्ज एक प्राथमिकी (FIR) को चुनौती देने वाली दो सगे भाइयों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66E के तहत दर्ज प्राइवेसी के उल्लंघन के आरोपों को पूरी तरह खारिज (Quash) कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी है कि परीक्षा के प्रश्नपत्र की फोटो खींचना किसी व्यक्ति के ‘निजी क्षेत्र’ (Private Area) की तस्वीर लेने के दायरे में नहीं आता, इसलिए इस पर आईटी एक्ट की यह धारा लागू नहीं हो सकती।

मामले की पृष्ठभूमि: परीक्षा में मोबाइल और WhatsApp Pix का खेल

घटनाक्रम: ब्लॉक नंबर 13 के एक निरीक्षक (Invigilator) ने शिकायतकर्ता को सूचित किया कि एक अभ्यर्थी अपने मोबाइल से प्रश्नपत्र की तस्वीरें खींचकर बाहर भेज रहा है। पकड़े जाने पर अभ्यर्थी ने स्वीकार किया कि उसने प्रश्नपत्र की फोटो अपने भाई को वॉट्सऐप पर भेजी थी।

दर्ज की गई धाराएं: इस कृत्य के लिए दोनों भाइयों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 (लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा), 120-B (आपराधिक साजिश) और आईटी एक्ट की धारा 66-E (निजता के उल्लंघन के लिए सजा) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

विपक्ष की दलील: मूल शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि आयोग के निर्देशों के अनुसार परीक्षा हॉल में मोबाइल फोन ले जाना पूरी तरह प्रतिबंधित था, इसलिए यह एक गंभीर विधिक अपराध है।

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हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: क्या कहती है आईटी एक्ट की धारा 66E?

न्यायाधीश ने आईटी एक्ट की धारा 66E की वैधानिक परिभाषा को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य क्या है।

धारा 66E की विधिक सीमा (Scope of Section 66E)

अदालत ने कहा कि धारा 66E के तहत अपराध तब बनता है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति की सहमति के बिना उसके ‘निजी क्षेत्र’ (Private Area – शरीर के गुप्त अंग या निजी पल) की तस्वीर खींचता है, प्रकाशित करता है या प्रसारित करता है।

विधिक निष्कर्ष: वर्तमान मामले में अभ्यर्थी ने केवल एक प्रश्नपत्र (Question Paper) की तस्वीर खींची थी। किसी प्रश्नपत्र की फोटो को किसी व्यक्ति के निजी क्षेत्र की तस्वीर नहीं माना जा सकता। इसलिए, वॉट्सऐप पर पेपर भेजना प्राइवेसी उल्लंघन का आपराधिक मामला नहीं बनता।

धारा 188 IPC और CrPC की धारा 195 का विधिक रोड़ा

अदालत ने आईपीसी की धारा 188 के तहत लगाए गए आरोपों की भी तकनीकी और विधिक समीक्षा की।

आयोग के निर्देश ‘आदेश’ नहीं: कोर्ट ने पाया कि GPSC द्वारा परीक्षार्थियों को दिए गए ‘क्या करें और क्या न करें’ के निर्देश (Instructions) किसी लोक सेवक द्वारा कानूनन जारी किया गया कोई आधिकारिक आदेश या घोषणा (Promulgation of Order) नहीं हैं।

विधिक रोक (Statutory Bar): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मान भी लिया जाए कि यह धारा 188 के दायरे में आता है, तब भी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 195 के तहत यह स्पष्ट विधिक रोक है कि पुलिस सीधे इस धारा में संज्ञान नहीं ले सकती। इसके लिए संबंधित लोक सेवक या प्राधिकारी द्वारा लिखित शिकायत (Complaint in writing) होना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं थी।

अपर लोक अभियोजक (APP) ने भी अदालत के समक्ष निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया कि मामले के तथ्यों को देखते हुए न तो धारा 188 IPC और न ही आईटी एक्ट की धारा 66-E लागू होती है।

WhatsApp Pix: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांगुजरात उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026)
संबंधित अदालतगुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस पी.एम. रावल (एकल पीठ)
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या प्रश्नपत्र की फोटो वॉट्सऐप पर भेजना आईटी एक्ट की धारा 66E (प्राइवेसी उल्लंघन) के तहत अपराध है?
प्रासंगिक कानूनसूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66E और आईपीसी की धारा 188 व 120-B, CrPC धारा 195
अदालत का अंतिम आदेशधारा 188 IPC और धारा 66E IT Act के आरोपों को खारिज (Quash) किया गया। हालांकि, जांच अधिकारी (IO) अन्य प्रासंगिक धाराओं में एफआईआर की जांच जारी रख सकते हैं।

WhatsApp Pix भेजना और Right to Privacy के बारे में यहां समझिए

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 की धारा 66E डिजिटल युग में किसी भी व्यक्ति की “निजता के अधिकार” (Right to Privacy) की रक्षा करने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी हथियार है। यह धारा विशेष रूप से ‘इलेक्ट्रॉनिक वोयेरिज्म’ (Electronic Voyeurism) यानी किसी की सहमति के बिना उसके निजी अंगों या निजी पलों की तस्वीरें/वीडियो खींचने और उन्हें प्रसारित करने को अपराध घोषित करती है।

आईटी एक्ट की धारा 66E क्या है? (सरल परिभाषा)

यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर (Intentionally or Knowingly) किसी अन्य व्यक्ति की सहमति के बिना उसके ‘निजी क्षेत्र’ (Private Area) की तस्वीर या वीडियो कैप्चर करता है (खींचता या रिकॉर्ड करता है), प्रकाशित करता है (इंटरनेट या किसी माध्यम पर डालता है), या प्रसारित करता है (किसी दूसरे व्यक्ति को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजता है) तो उसे धारा 66E के तहत निजता का उल्लंघन माना जाएगा।

कानून के तहत कुछ मुख्य स्पष्टीकरण (Explanations)

निजी क्षेत्र (Private Area): इसका अर्थ है कपड़े या अंतःवस्त्रों (Undergarments) से ढके हुए या नग्न जननांग (Genitals), नितंब (Buttocks) या महिलाओं के स्तन (Female Breast)।

निजता का उल्लंघन करने वाली परिस्थितियां: ऐसी स्थिति जहां किसी व्यक्ति को यह पूरी ‘उम्मीद’ हो कि वह एकांत में है (जैसे चेंजिंग रूम, वॉशरुम, या उसका अपना बेडरूम) और वहां उसकी सहमति के बिना कोई कैमरा उसे रिकॉर्ड नहीं कर रहा है।

निर्धारित सजा: इस अपराध के लिए 3 साल तक की जेल या 2 लाख रुपये तक का जुर्माना, या फिर दोनों की सजा का प्रावधान है। यह एक ज़मानती (Bailable) और संज्ञेय (Cognizable) अपराध है।

भारतीय अदालतों और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले

चूंकि धारा 66E सीधे तौर पर निजता (Privacy) से जुड़ी है, इसलिए इस पर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न राज्यों के हाई कोर्ट्स ने कई लैंडमार्क और मार्गदर्शक फैसले दिए हैं।

के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017): सुप्रीम कोर्ट (आधारभूत फैसला)

हालांकि यह मामला सीधे तौर पर केवल आईटी एक्ट का नहीं था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने ‘निजता के अधिकार’ (Right to Privacy) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक “मौलिक अधिकार” घोषित किया।

अदालत का संदेश: इस फैसले ने धारा 66E को और अधिक मजबूती दी। कोर्ट ने माना कि किसी भी व्यक्ति का अपने शरीर पर पूरा नियंत्रण है (Bodily Integrity) और उसकी सहमति के बिना उसके निजी अंगों की कोई भी डिजिटल रिकॉर्डिंग सीधे तौर पर उसके मौलिक अधिकार का हनन है।

अभिषेक मिश्रा बनाम कर्नाटक राज्य: कर्नाटक हाई कोर्ट

इस मामले में आरोपी और पीड़िता पहले से एक आपसी रिश्ते (Consensual Relationship) में थे। आरोपी ने शादी के बहाने पीड़िता के कुछ निजी वीडियो रिकॉर्ड कर लिए थे।

अदालत का सिद्धांत: अदालत ने साफ किया कि “भले ही दो लोगों के बीच अतीत में आपसी सहमति से संबंध रहे हों, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई भी पार्टनर दूसरे की जानकारी या सहमति के बिना उसके निजी अंगों या पलों को गुप्त रूप से रिकॉर्ड कर सकता है।” गुप्त रूप से की गई रिकॉर्डिंग धारा 66E और तत्कालीन आईपीसी की धारा 354C (वोयेरिज्म) के तहत मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त है।

वरुण जी.ए. बनाम कर्नाटक राज्य: हाई कोर्ट निर्णय

इस मामले में एक प्रेमी द्वारा अपनी पूर्व पार्टनर की निजी तस्वीरों को इंटरनेट पर साझा करने और ब्लैकमेल करने के कारण पीड़िता ने आत्महत्या कर ली थी।

अदालत का सिद्धांत: अदालत ने माना कि डिजिटल माध्यमों पर किसी की निजी तस्वीरें उसकी सहमति के बिना प्रसारित करना और उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करना मानसिक प्रताड़ना की पराकाष्ठा है। ऐसे मामलों में धारा 66E के साथ-साथ आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment to Suicide) जैसी धाराएं भी पूरी तरह लागू होंगी और मामले को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

‘बॉइज लॉकर रूम’ (Bois Locker Room) केस प्रकरण: दिल्ली

सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम) पर नाबालिगों द्वारा बनाए गए ग्रुप में लड़कियों की तस्वीरों को आपत्तिजनक रूप से साझा करने और उन पर अश्लील टिप्पणियां करने का मामला सामने आया था।

अदालत का रुख: इस मामले के बाद कानून ने यह रेखांकित किया कि धारा 66E ‘जेंडर न्यूट्रल’ (Gender Neutral) है। यानी यह कानून पुरुषों और महिलाओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है। किसी पुरुष के निजी अंगों की फोटो भी अगर उसकी मर्जी के बिना ली या भेजी जाती है, तो वह भी इस धारा के तहत अपराध है।

आईपीसी/बीएनएस के साथ टकराव और कोर्ट का स्पष्टीकरण

अक्सर अदालतों के सामने यह सवाल आता है कि धारा 66E (IT Act) और तत्कालीन आईपीसी की धारा 354C / नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 78 (जो महिलाओं को छिपकर देखने या वोयेरिज्म से जुड़ी है) में क्या अंतर है?

अदालतों ने स्पष्ट किया है कि आईपीसी/बीएनएस की धाराएं विशेष रूप से केवल महिला पीड़ितों की सुरक्षा के लिए हैं। जबकि आईटी एक्ट की धारा 66E लैंगिक रूप से तटस्थ (Gender Neutral) है, यानी पीड़ित कोई पुरुष या अन्य जेंडर भी हो सकता है। यदि अपराध किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (स्मार्टफोन, हिडन कैमरा, इंटरनेट) से किया गया है, तो पुलिस इन दोनों धाराओं को एक साथ जोड़कर चार्जशीट दाखिल करती है। यह विधिक विवाद गुजरात लोक सेवा आयोग (GPSC) की एक परीक्षा के दौरान शुरू हुआ था।

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