Surrogacy Service: मद्रास हाईकोर्ट ने देश में सरोगेसी (Surrogacy) यानि किराए की कोख से जुड़े विधिक विवादों को सुलझाने और न्यायिक प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
Surrogacy Service से जुड़े मामले में हुई सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस शमीम अहमद की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेटों की भूमिका केवल विधिक अनुपालन, इच्छा की स्वैच्छिकता और बच्चे के कल्याण तक सीमित है। वे मेडिकल बोर्ड या सक्षम प्राधिकारी के फैसलों के खिलाफ ‘अपीलीय अदालत’ की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। अदालत ने सरोगेसी अधिनियम के तहत बच्चे की कस्टडी (अभिरक्षा) और पेरेंटेज (माता-पिता होने का विधिक दर्जा) के आवेदनों पर सुनवाई करने वाले प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेटों (Magistrates) के लिए व्यापक और कड़े दिशानिर्देश (Guidelines) जारी किए हैं।
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मामला क्या था? 50 वर्ष से अधिक उम्र और पति की गवाही पर अटका था केस
दुखद पृष्ठभूमि: यह कानूनी मामला एक दंपति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) से जुड़ा था। दंपति की शादी 2005 में हुई थी। उनका एक बेटा था, जिसका 2024 में दिल का दौरा पड़ने (Cardiac Arrest) से असामयिक निधन हो गया। इसके बाद, चूंकि महिला के पास गर्भाशय (Uterus) नहीं था, इसलिए उन्होंने सरोगेसी के जरिए संतान प्राप्ति का फैसला किया।
सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी: ‘सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021’ के तहत सभी मेडिकल स्क्रूटनी के बाद सक्षम प्राधिकारी ने दंपति को ‘पात्रता प्रमाणपत्र’ (Eligibility Certificate) जारी कर दिया। दंपति की एक रिश्तेदार ही सरोगेट मदर (Surrogate Mother) बनने को तैयार हुई, जिसे अपीलीय प्राधिकारी ने भी मंजूरी दे दी।
मजिस्ट्रेट ने खारिज किया आवेदन: जब कस्टडी और पेरेंटेज के विधिक आदेश के लिए वे मजिस्ट्रेट कोर्ट गए, तो मजिस्ट्रेट ने दो ‘हाइपर-टेक्निकल’ आधारों पर याचिका खारिज कर दी— पहला, आवेदन के समय महिला की उम्र 50 वर्ष से अधिक (50 वर्ष 9 महीने) थी, और दूसरा, सरोगेट मदर के पति का परीक्षण/गवाही नहीं कराई गई थी।
Surrogacy Service: हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और मजिस्ट्रेट को फटकार
मददगार और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए जस्टिस शमीम अहमद ने मजिस्ट्रेट के आदेश को क्षेत्राधिकार से बाहर (Exceeding Jurisdiction) माना और उसे रद्द कर दिया।
उम्र सीमा की उदार व्याख्या (Liberal Interpretation of Age)
अधिनियम में महिला की उम्र सीमा 50 वर्ष तय है। हाई कोर्ट ने केरल उच्च न्यायालय के एक खंडपीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक महिला 51 वर्ष की नहीं हो जाती, तब तक उसे अयोग्य नहीं माना जा सकता। आवेदन के समय याचिकाकर्ता 50 साल 9 महीने की थीं, इसलिए वे पूरी तरह पात्र हैं। कोर्ट ने कहा, अदालतों को वैधानिक सुरक्षा उपायों का अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए, लेकिन साथ ही ‘हाइपर-टेक्निकल’ (अत्यधिक तकनीकी) दृष्टिकोण अपनाकर कल्याणकारी कानूनों के मूल उद्देश्य को विफल करने से बचना चाहिए।
सरोगेट मदर के पति की गवाही अनिवार्य नहीं
मजिस्ट्रेट के दूसरे तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत पेरेंटेज और कस्टडी की कार्यवाही शुरू करने के लिए केवल इच्छुक दंपति/महिला और सरोगेट मदर का शामिल होना आवश्यक है। कानूनन मजिस्ट्रेट द्वारा सरोगेट मां के पति की जांच या गवाही पर जोर देना विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण और टिकाऊ नहीं है।
मजिस्ट्रेट अपीलीय अथॉरिटी नहीं हैं
अदालत ने साफ किया कि एक बार जब डिस्ट्रिक्ट मेडिकल बोर्ड या उपयुक्त प्राधिकारी ने पात्रता प्रमाण पत्र जारी कर दिया है, तो मजिस्ट्रेट को उसके गुणों-दोषों की दोबारा समीक्षा नहीं करनी चाहिए, जब तक कि वहां कोई स्पष्ट धोखाधड़ी (Fraud) या पेटेंट अवैधता न दिख रही हो। मजिस्ट्रेट को मेडिकल बोर्ड, बीमा प्राधिकरण या एआरटी क्लिनिक के ऊपर अपील की अदालत के रूप में कार्य नहीं करना है।
मजिस्ट्रेटों के लिए हाई कोर्ट के मुख्य दिशानिर्देश (Guidelines)
अदालत ने न्यायिक अभ्यास में एकरूपता लाने और इच्छुक जोड़ों, सरोगेट माताओं और बच्चों को होने वाली अनावश्यक परेशानी से बचाने के लिए निम्नलिखित विधिक मार्गदर्शक सिद्धांत तय किए हैं।
सीमित भूमिका: धारा 4(iii)(a)(II) के तहत मजिस्ट्रेट की भूमिका केवल यह सुनिश्चित करने तक सीमित है कि सरोगेसी स्वैच्छिक है, वैधानिक नियमों का पालन हुआ है, और बच्चे का विधिक कल्याण सुरक्षित है।
व्यक्तिगत बातचीत (Personal Interaction): मजिस्ट्रेट को पक्षों की स्वैच्छिकता जांचने के लिए व्यक्तिगत बातचीत करनी चाहिए।
कमर्शियल सरोगेसी पर रोक: व्यावसायिक सरोगेसी (Commercial Surrogacy) से जुड़े पहलुओं पर कड़ी नजर रखी जाए, क्योंकि भारत में केवल परोपकारी (Altruistic) सरोगेसी ही मान्य है।
समय सीमा (Time Limit): ऐसे संवेदनशील मामलों का निपटारा एक निश्चित समय सीमा के भीतर किया जाए ताकि अजन्मे या नवजात बच्चे के माता-पिता के विधिक अधिकारों (Birth Affidavit) में देरी न हो।
Surrogacy Service: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | मद्रास उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस शमीम अहमद (एकल पीठ) |
| केस साइटेशन | 2026 LiveLaw (Mad) 281 |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या कस्टडी आवेदन पर सुनवाई करते समय मजिस्ट्रेट मेडिकल बोर्ड के फैसले की दोबारा मेरिट समीक्षा कर सकता है? |
| उम्र सीमा पर विधिक रुख | महिला के लिए 50 वर्ष की सीमा को तब तक वैध माना जाएगा जब तक वह पूरे 51 वर्ष की नहीं हो जाती। |
| अदालत का अंतिम आदेश | मजिस्ट्रेट का खारिज करने वाला आदेश रद्द (Set Aside); मामला नए सिरे से दिशानिर्देशों के तहत विचार के लिए रिमांड (वापस भेजा) किया गया। |
Surrogacy Service और Surrogacy Regulation Act के बारे में यहां विस्तार से समझें
सरोगेसी (Surrogacy) का सीधा अर्थ है—’किराए की कोख’। जब कोई निसंतान दंपत्ति (Intending Couple) चिकित्सीय कारणों से माता-पिता बनने में असमर्थ होता है, तो वे किसी अन्य महिला की कोख के जरिए बच्चे को जन्म दिलाते हैं। भारत में व्यावसायिक सरोगेसी पर रोक लगाने और महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए सरकार ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Surrogacy Regulation Act) लागू किया था।
नीचे इस कानून के मुख्य प्रावधानों और इस पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसलों की विस्तृत जानकारी दी गई है:
भारत का नया सरोगेसी कानून (2021) क्या कहता है?
इस कानून के तहत भारत में कमर्शियल (व्यावसायिक) सरोगेसी को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब भारत में केवल परोपकारी (Altruistic) सरोगेसी की ही अनुमति है।
मुख्य प्रावधान: कोई व्यावसायिक लेनदेन नहीं: सरोगेट मां को गर्भावस्था के दौरान केवल मेडिकल खर्च और बीमा (Insurance) कवर दिया जा सकता है। इसके अलावा उसे कोई नकद राशि या व्यावसायिक लाभ नहीं दिया जा सकता।
दंपत्ति के लिए पात्रता (Eligibility): सरोगेसी का लाभ केवल वही विवाहित भारतीय जोड़ा उठा सकता है जिसमें पत्नी की उम्र 23 से 50 वर्ष और पति की उम्र 26 से 55 वर्ष के बीच हो। इसके अलावा, उनका पहले से कोई जीवित जैविक या गोद लिया हुआ बच्चा नहीं होना चाहिए।
सरोगेट मां के लिए नियम: सरोगेट मां बनने वाली महिला विवाहित होनी चाहिए, उसकी उम्र 25 से 35 वर्ष के बीच हो और उसका अपना कम से कम एक बच्चा होना चाहिए। कोई भी महिला अपने जीवनकाल में केवल एक बार ही सरोगेट मां बन सकती है। वह अपना एग (Egg/Gamete) डोनेट नहीं कर सकती।
Surrogacy Service और सरोगेसी कानून पर सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
सरोगेसी कानून लागू होने के बाद कई ऐसे व्यावहारिक मामले सामने आए जहां कानून की सख्त शर्तों के कारण लोग माता-पिता बनने के अधिकार से वंचित हो रहे थे। इन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद मानवीय और ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं:
क. आयु सीमा पर ऐतिहासिक फैसला (अक्टूबर 2025)
मामला (विजय कुमारी बनाम भारत संघ): कानून के अनुसार महिलाओं के लिए अधिकतम आयु 50 वर्ष तय की गई है। कुछ ऐसे दंपत्ति थे जिन्होंने 2021 में कानून लागू होने से पहले ही (जब उम्र की कोई कानूनी सीमा नहीं थी) अपना भ्रूण (Embryo) फ्रीज करवा लिया था, लेकिन जब तक वे सरोगेट मां के गर्भ में उसे ट्रांसफर करवाते, तब तक महिला की उम्र 50 पार हो गई।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने फैसला सुनाया कि “आयु सीमा का यह नियम उन दंपत्तियों पर पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से लागू नहीं होगा, जिन्होंने 25 जनवरी 2022 (कानून लागू होने की तारीख) से पहले ही अपने भ्रूण को फ्रीज कर सरोगेसी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता बनने का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 (प्रजनन स्वायत्तता – Reproductive Autonomy) के तहत एक मौलिक अधिकार है। जब प्राकृतिक गर्भाधान में सरकार उम्र तय नहीं कर सकती, तो पुराने मामलों में सरोगेसी पर यह पाबंदी लगाना अनुचित है।
ख. डोनर एग (Donor Egg) के इस्तेमाल पर फैसला (2023-2024)
मामला: मार्च 2023 में सरकार ने नियमों में संशोधन कर दिया था कि सरोगेसी के लिए जाने वाले दंपत्ति को अपने ही गेमिट्स (पति का स्पर्म और पत्नी का एग) का इस्तेमाल करना होगा। एक महिला, जो ‘मेयर-रोकिटांस्की-कुस्टर-हाउसर (MRKH) सिंड्रोम’ से पीड़ित थी (जिसके कारण उसके पास गर्भाशय नहीं था और वह एग नहीं बना सकती थी), उसने इसे चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस नियम पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा कि सरोगेसी का पूरा उद्देश्य ही उन महिलाओं की मदद करना है जो चिकित्सीय रूप से मां बनने में अक्षम हैं। यदि पत्नी किसी बीमारी के कारण अंडाणु (Egg) पैदा नहीं कर सकती, तो उसे ‘डोनर एग’ (किसी अन्य महिला के अंडे) का उपयोग करने की अनुमति मिलनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य निसंतान जोड़ों को माता-पिता बनने में मदद करना होना चाहिए, न कि उनके रास्ते में बाधाएं खड़ी करना।
ग. मेडिकल बोर्ड्स को संवेदनशीलता बरतने के निर्देश (2025)
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स (जैसे मद्रास हाई कोर्ट) ने निर्देश दिया है कि सरोगेसी की अनुमति देने के लिए गठित जिला और राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड याचिकाओं को सरकारी दफ्तर की तरह रूटीन फाइलों की तरह न निपटाएं। अदालतों ने कहा कि बांझपन से जूझ रहे जोड़ों के मामलों को “संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और करुणा” के साथ देखा जाना चाहिए।
Surrogacy Service और एक्ट को लेकर निष्कर्ष
भारतीय न्यायपालिका ने अपने हालिया फैसलों से साफ कर दिया है कि जहां एक तरफ महिलाओं को सरोगेसी के नाम पर शोषण से बचाना (व्यावसायिक सरोगेसी रोकना) जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ कानून की व्याख्या इतनी कठोर भी नहीं होनी चाहिए कि वह किसी के माता-पिता बनने के मानवीय और संवैधानिक अधिकार को ही छीन ले।

