Monday, August 24, 2026
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Women IPS: अगर वह फिट और तैयार है, तो मातृत्व लाभ नीति उसके अधिकार कैसे छीन सकती है?…महिलाओं की IPS ट्रेनिंग पर क्यों उठे सवाल

Women IPS: महिला सशक्तिकरण, मातृत्व अधिकारों (Maternity Rights) और सिविल सेवाओं में प्रशासनिक नियमों की व्यावहारिक व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की खंडपीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के उस 33 साल पुराने नियम के तार्किक आधार पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जो महिला आईपीएस प्रोबेशनर्स को बच्चे के जन्म के बाद एक साल तक ट्रेनिंग में शामिल होने से पूरी तरह रोकता है, भले ही वे चिकित्सकीय रूप से फिट (Medically Fit) होने का दावा क्यों न करें।

यह रही शीर्ष अदालत की टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने कहा, केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) का 1993 का जो कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum – OM) है, वह बुनियादी रूप से महिला अधिकारियों के कल्याण और लाभ (Maternity Benefit) के लिए बनाया गया था। इसे किसी स्वस्थ और इच्छुक महिला पर इस तरह थोपा नहीं जा सकता कि वह उसके ट्रेनिंग करने के अधिकार को ही छीन ले। अगर कोई महिला आईपीएस (IPS) प्रोबेशनर प्रसव के बाद शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट है और स्वेच्छा से कठिन ट्रेनिंग में भाग लेना चाहती है, तो सरकार उसे सिर्फ इसलिए एक साल तक घर बैठने पर मजबूर नहीं कर सकती कि ‘नियमों में ऐसा लिखा है’।”

मामला क्या है?: IPS उर्वशी सेंगर बनाम भारत सरकार का विवाद

यह पूरा कानूनी विवाद मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की महिला आईपीएस (IPS) प्रोबेशनर उर्वशी सेंगर की ट्रेनिंग से जुड़ा है।

बच्चे का जन्म और ट्रेनिंग का शेड्यूल: उर्वशी सेंगर ने 20 सितंबर, 2025 को एक बच्चे को जन्म दिया। इसके लगभग 9 महीने बाद, 22 जून, 2026 से हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (NPA) में आईपीएस प्रोबेशनर्स की फेज-2 (Phase-II) की कठिन ट्रेनिंग शुरू होनी थी।

गृह मंत्रालय का अड़ंगा: उर्वशी ने दावा किया कि वह प्रसव के बाद पूरी तरह उबर चुकी हैं और मेडिकल रूप से इस ट्रेनिंग के लिए फिट हैं। लेकिन गृह मंत्रालय ने अपने 1993 के एक पुराने नियम (OM) का हवाला देकर उन्हें ट्रेनिंग में शामिल होने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इस नियम के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद महिला अधिकारी को ट्रेनिंग से एक साल का अनिवार्य विश्राम (Hiatus) लेना होता है।

ट्रिब्यूनल (CAT) से सुप्रीम कोर्ट तक की जंग

उर्वशी ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का रुख किया। कैट ने उनके पक्ष में अंतरिम राहत देते हुए मेडिकल फिटनेस के अधीन ट्रेनिंग में शामिल होने की अनुमति दे दी। केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ तुरंत दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंच गई। दिल्ली हाई कोर्ट ने उसी दिन (22 जून को, जिस दिन ट्रेनिंग शुरू होनी थी) कैट के आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी। हाई कोर्ट से झटका लगने के बाद उर्वशी सेंगर ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट के कड़े सवाल: “हर महिला को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता”

सुनवाई के दौरान जब केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल कौशिक ने गृह मंत्रालय के नियम का बचाव किया, तो सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने नीति की कमियों और रूढ़िवादिता को उजागर किया।

लाभार्थी प्रावधान (Beneficiary Provision) को हथियार मत बनाओ

जस्टिस मनोज मिश्रा ने एएसजी से पूछा, यह नीति मूल रूप से महिलाओं की सुविधा के लिए बनाई गई थी ताकि उन पर प्रसव के तुरंत बाद दबाव न आए। लेकिन अगर कोई महिला खुद को फिट महसूस करती है और ट्रेनिंग करना चाहती है, तो यह नियम उसके खिलाफ क्यों पढ़ा जाना चाहिए? यह उसके फायदे के लिए है, नुकसान के लिए नहीं। आपको इस नीति के मूल उद्देश्य (Purpose) को देखना होगा।

गर्भावस्था और फिटनेस कोई यांत्रिक (Mechanical) फार्मूला नहीं हैं

अदालत ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें सबको एक ही ढर्रे पर रखने की बात कही गई थी। जस्टिस मिश्रा ने बेहद व्यावहारिक टिप्पणी की, आपको इस बात पर अपना दिमाग लगाना होगा कि संबंधित व्यक्ति ट्रेनिंग के लिए फिट है या नहीं। आप बस यह नहीं कह सकते कि आप हर किसी के साथ एक ही तरह की शर्त लागू करेंगे। एक महिला प्रसव के 9 महीने बाद बिल्कुल फिट हो सकती है, जबकि दूसरी महिला शायद दो साल तक भी फिट न हो पाए—यह पूरी तरह से प्रसव की प्रकृति, ऑपरेशन या जटिलताओं (Complications) पर निर्भर करता है।

सरकार की दलील और कोर्ट का व्यावहारिक असमंजस

सरकार का ‘फ्लडगेट’ तर्क: एएसजी अनिल कौशिक ने दलील दी कि वर्तमान में हर साल आईपीएस ट्रेनिंग में शामिल होने वाले प्रोबेशनर्स में लगभग 30 प्रतिशत महिलाएं हैं। अगर इस तरह से व्यक्तिगत रूप से नियमों में छूट दी जाने लगी, तो इससे ‘फ्लडगेट’ (मांगों की बाढ़) खुल जाएगा और पूरी ट्रेनिंग व्यवस्था प्रभावित होगी। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रेनिंग टलने से उर्वशी की सीनियरिटी (वरिष्ठता) पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

उर्वशी के वकील का तर्क: याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि यदि इस साल अनुमति नहीं मिली, तो अगली फेज-2 ट्रेनिंग अगले साल जून (2027) में होगी, जिससे पूरा एक साल बर्बाद हो जाएगा। उन्होंने कहा कि उर्वशी अतिरिक्त कक्षाएं (Extra Classes) लेकर छूटे हुए सिलेबस को पूरा करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि पुलिस अकादमी ने पहले उन्हें अनुमति पत्र जारी कर दिया था, लेकिन गृह सरकार के दबाव में कोर्ट जाने से पहले ही 18 जून को उसे वापस ले लिया गया।

कोर्ट ने अभी तुरंत आदेश क्यों नहीं दिया?

सुप्रीम कोर्ट इस नियम को भेदभावपूर्ण मान रहा था, लेकिन व्यावहारिक अड़चन यह थी कि 22 जून की तारीख निकल चुकी थी और ट्रेनिंग शुरू हुए दो हफ्ते से अधिक का समय हो गया था। जस्टिस मिश्रा ने कहा, “समस्या यह है कि फेज-2 शुरू हो चुका है। अब क्या दिक्कत है अगर आप 3 महीने और इंतजार कर लें?” लेकिन जब वकील ने बताया कि अगली ट्रेनिंग में पूरा साल लगेगा, तो कोर्ट ने मामले को खुला रखने का फैसला किया।

अदालत का अंतिम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई जल्दबाजी में अंतरिम आदेश जारी करने के बजाय केंद्र सरकार को दो स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसमें केंद्र सरकार 1993 के इस कार्यालय ज्ञापन (OM) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना आधिकारिक जवाब (Reply) दाखिल करे। सरकार शीर्ष अधिकारियों से यह विशेष निर्देश (Instructions) लेकर कोर्ट को बताए कि क्या उर्वशी सेंगर को कुछ दिनों की देरी के बावजूद, अतिरिक्त कक्षाओं की व्यवस्था करके, इसी चल रहे (Ongoing) ट्रेनिंग बैच में समायोजित (Accommodate) किया जा सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट इस बेहद महत्वपूर्ण मामले पर अगली सुनवाई 10 जुलाई, 2026 को करेगा।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट विधिक विमर्श (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांसर्वोच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और रुख
संबंधित अदालतसुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (Supreme Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
याचिकाकर्ता अधिकारीIPS उर्वशी सेंगर (2023 बैच, मध्य प्रदेश कैडर)
चुनौती के दायरे में नीतिकेंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) का 1993 का कार्यालय ज्ञापन (OM)
मुख्य कानूनी विवादक्या प्रसव के बाद शारीरिक रूप से फिट महिला अधिकारी को अनिवार्य रूप से 1 साल के लिए ट्रेनिंग से रोका जा सकता है?
अगली सुनवाई की तिथि10 जुलाई, 2026
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