Dignified Life: वैवाहिक विवादों में पत्नियों के भरण-पोषण के अधिकार को मजबूत करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है।
पीड़ित पत्नी का मासिक गुजारा भत्ता दोगुना कर दिया: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ल की एकल पीठ ने एक फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के पुराने आदेश में संशोधन करते हुए पीड़ित पत्नी का मासिक गुजारा भत्ता 10,000 रुपये से बढ़ाकर सीधे 20,000 रुपये (दोगुना) कर दिया है। अदालत ने साफ किया कि पति की डॉक्टरी की विधिक और सामाजिक स्थिति को देखते हुए पत्नी को सम्मान से जीने का पूरा हक है। अदालत ने कहा, आज के दौर में जब महंगाई चरम पर है, एक अलग रह रही पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता (Interim Maintenance) के रूप में केवल 10,000 रुपये प्रति माह देना उसके साथ क्रूरता है। यह रकम एक सम्मानजनक जीवन (Dignified Life) जीने के लिए ‘बेहद मामूली और नाकाफी’ है। कोर्ट को गुजारा भत्ता तय करते समय पति की संभावित आय, उसकी सामाजिक स्थिति और दोनों पक्षों के जीवन स्तर को ध्यान में रखना चाहिए।
मामला क्या है?: सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर पति बनाम बेरोजगार पत्नी
यह कानूनी लड़ाई एक डॉक्टर और उनकी अलग रह रही पत्नी के बीच चल रही है।
पत्नी की मांग: फैमिली कोर्ट ने पति को आदेश दिया था कि वह पत्नी को ₹10,000 महीना दे। इस आदेश के खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन (पुनरीक्षण याचिका) दाखिल कर इस राशि को बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह करने की गुहार लगाई थी।
पति की कमाई: पत्नी के वकील ने दलील दी कि उसका पति एक प्रतिष्ठित संस्थान में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर के रूप में काम कर चुका है, जहां उसकी सैलरी ₹90,000 से ₹1,000,000 प्रति माह के बीच थी। ऐसे में ₹10,000 का गुजारा भत्ता सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है, जो कहते हैं कि भरण-पोषण की राशि वास्तविक और दोनों पक्षों के स्टेटस के अनुकूल होनी चाहिए।
कोर्ट रूम की दलीलें: नौकरी छुड़वाई और अब कमाई छिपा रहे हैं
पति ने कोर्ट में अपना बचाव करने के लिए पत्नी की पुरानी नौकरी और अपनी मौजूदा कमाई का हवाला दिया।
पति का तर्क: डॉक्टर पति ने दलील दी कि उसकी पत्नी खुद एक समय कॉन्ट्रैक्ट पर डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में ₹10,000 महीना कमाती थी। इसके अलावा, वह अब सरकारी नौकरी में नहीं है बल्कि प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहा है, इसलिए उसकी कमाई उतनी नहीं है जितनी पत्नी बता रही है।
पत्नी का करारा जवाब: इसके जवाब में पत्नी ने कोर्ट को बताया कि वह केवल शादी से पहले वह नौकरी करती थी। शादी के बाद पति ने खुद (जो उस समय एक बड़े संस्थान में रेजिडेंट डॉक्टर थे) दबाव बनाकर उसकी नौकरी छुड़वा दी थी ताकि वह घर संभाल सके।
हाई कोर्ट का निष्कर्ष: अदालत ने रिकॉर्ड्स को देखने के बाद पाया कि पति साल 2025 तक रेजिडेंट डॉक्टर के रूप में ₹80,000 से ₹1 लाख तक कमा रहा था और वर्तमान में भी वह एक डॉक्टर के रूप में प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहा है। भले ही वह प्राइवेट काम कर रहा हो, लेकिन समाज में उसकी ‘संभावित आय’ (Presumptive Income) और रुतबा बरकरार है, जिसके आधार पर उसकी पत्नी भी उसी जीवन स्तर की हकदार है। कोर्ट ने 8 जुलाई, 2026 के अपने आदेश में प्रतिवादी (पति) को तुरंत प्रभाव से ₹20,000 महीना देने का हुक्म सुनाया।
एक अन्य मामला: ‘1,000 रुपये में तो मजदूर भी गुजारा नहीं कर सकता’
इसी तरह के एक अन्य पारिवारिक विवाद में भी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महंगाई को लेकर बेहद तल्ख और व्यावहारिक टिप्पणी की। जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने एक पति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पहली पत्नी को दिए जाने वाले भरण-पोषण को ₹1,000 से बढ़ाकर ₹5,000 करने के फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
11 मई को इस मामले पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा, “पिछले 11 वर्षों में देश में महंगाई काफी बढ़ गई है। आज के समय में एक दिहाड़ी मजदूर की मजदूरी भी कई गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में किसी महिला से यह उम्मीद करना कि वह महज एक हजार रुपये में अपना पूरा महीना काट लेगी, पूरी तरह असंभव और अमानवीय है।”कोर्ट ने सबूतों के आधार पर पाया कि पति भले ही एक मजदूर है, लेकिन वह इतना सक्षम जरूर है कि अपनी पहली पत्नी को ₹5,000 का बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता दे सके।
केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट भरण-पोषण समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज |
| माननीय न्यायाधीश (केस 1) | जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ल (आदेश तिथि: 8 जुलाई, 2026) |
| माननीय न्यायाधीश (केस 2) | जस्टिस अचल सचदेव (आदेश तिथि: 11 मई, 2026) |
| केस 1 का मुख्य संशोधन | अंतरिम गुजारा भत्ता ₹10,000 से बढ़ाकर ₹20,000 प्रति माह किया गया। |
| केस 2 का मुख्य संशोधन | 11 साल पुरानी राशि ₹1,000 से बढ़ाकर ₹5,000 प्रति माह करने का आदेश बरकरार। |
| अदालत का कानूनी सिद्धांत | भरण-पोषण की राशि महंगाई और पति के सामाजिक/आर्थिक स्टेटस के ‘यथार्थवादी’ (Realistic) अनुपात में होनी चाहिए। |

