Sunday, August 30, 2026
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Civil Tort: शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाते हैं तो दीवानी अपराध माना जाएगा…बरी होने पर भी देना होगा मुआवजा, जानिए फैसले को

Civil Tort: महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को विधिक संरक्षण देते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद युगांतकारी और महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

हाईकोर्ट के डॉ. जस्टिस ए.डी. मारिया क्लीट की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों में यदि सहमति ‘धोखे या झूठे वादे’ (Misrepresentation) से हासिल की गई हो, तो वह दीवानी कानून के तहत एक गंभीर चोट (Injury) है, जिसके लिए हर्जाना देना ही होगा। हाई कोर्ट ने एक आरोपी की ‘द्वितीय अपील’ (Second Appeal) को पूरी तरह खारिज करते हुए निचली अदालतों द्वारा पीड़िता के पक्ष में सुनाए गए मुआवजे के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है।

किसी महिला को शारीरिक संबंध के लिए राजी करना दीवानी अपकृत्य भी है: अदालत

अदालत ने कहा, शादी का झूठा वादा करके किसी महिला को शारीरिक संबंध (Sexual Intercourse) के लिए राजी करना न केवल एक आपराधिक कृत्य है, बल्कि यह कानूनन एक गंभीर दीवानी अपकृत्य (Civil Tort/Actionable Tortious Conduct) भी है। यदि कोई आरोपी आपराधिक मामले में तकनीकी आधार पर बरी (Acquit) भी हो जाता है, तो भी पीड़िता नागरिक अदालत (Civil Court) में अपनी गरिमा, मानसिक प्रताड़ना और प्रतिष्ठा को पहुंचे नुकसान के लिए मौद्रिक मुआवजे (Monetary Damages) का स्वतंत्र दावा कर सकती है। आपराधिक कोर्ट से बरी होना, दीवानी मुआवजे के रास्ते को बंद नहीं करता।

मामला क्या है?: जेल से छूटा, भरण-पोषण से बचा, पर सिविल कोर्ट में फंसा आरोपी

यह पूरा मामला एक लंबा विधिक सफर तय करके हाई कोर्ट पहुंचा था, जिसकी पृष्ठभूमि इस प्रकार है।

धोखे की कहानी: पीड़िता (वादी) का आरोप था कि उसकी नाबालिग उम्र के दौरान आरोपी ने उसके माता-पिता की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर शादी का झांसा दिया और दो बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इस झांसे में आकर पीड़िता गर्भवती हो गई और उसने एक बेटे को जन्म दिया। इसके बाद आरोपी ने शादी करने से साफ इनकार कर दिया।

आपराधिक और भरण-पोषण के मामलों का इतिहास: पीड़िता ने पहले आपराधिक मुकदमा लड़ा, जहां निचली अदालत ने आरोपी को सजा सुनाई थी, लेकिन अपील में हाई कोर्ट ने उसे इस तकनीकी आधार पर बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय लड़की 16 साल से कम उम्र की थी (यानी उसे बालिग मानकर छोड़ दिया गया)। इसके बाद पितृत्व (Paternity) साबित न होने के तकनीकी आधार पर भरण-पोषण (Maintenance) की याचिका भी खारिज हो गई।

सिविल कोर्ट का दरवाजा: हार न मानते हुए पीड़िता ने सिविल कोर्ट में ₹2 लाख के मुआवजे (Damages) के लिए एक दीवानी मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 2008 में उसके पक्ष में डिक्री (Decree) दी, जिसे 2012 में प्रथम अपीलीय अदालत ने भी बरकरार रखा। इसके खिलाफ आरोपी ने मद्रास हाई कोर्ट में दूसरी अपील दायर की थी।

हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: गरिमा और मानसिक शांति का कोई गणितीय मूल्य नहीं होता

जस्टिस ए.डी. मारिया क्लीट ने आरोपी की उन सभी दलीलों को खारिज कर दिया जिसमें उसने दावा किया था कि जब वह क्रिमिनल केस से बरी हो चुका है, तो सिविल केस का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने निम्नलिखित ऐतिहासिक कानूनी बिंदु स्पष्ट किए।

आपराधिक कोर्ट का फैसला, सिविल कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं

हाई कोर्ट ने स्थापित विधिक सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि आपराधिक कार्यवाही और दीवानी कार्यवाही का उद्देश्य बिल्कुल अलग होता है। क्रिमिनल कोर्ट ने केवल यह देखा कि लड़की 16 साल से कम की थी या नहीं; उसने इस बात पर कोई फैसला नहीं सुनाया कि क्या आरोपी ने शादी का झूठा वादा करके उसकी सहमति ली थी या नहीं। इसलिए क्रिमिनल केस का बरीनामा (Acquittal) सिविल डिक्री में कोई रुकावट नहीं है।

आत्मसम्मान और भावनात्मक ठेस ‘ Legally Recognised Injury’ है

अदालत ने मुआवजे के मूल्यांकन को लेकर एक बेहद संवेदनशील और प्रगतिशील टिप्पणी की, वादी (महिला) को पहुंची चोट ऐसी नहीं है जिसका कोई सटीक अंकगणितीय हिसाब (Arithmetical Calculation) लगाया जा सके या जिसका कोई व्यावसायिक मूल्यांकन (Commercial Valuation) हो। यह पैसों या संपत्ति के नुकसान का मामला नहीं है जिसे बही-खातों से साबित किया जाए। इस धोखे ने महिला की गरिमा (Dignity), समाज में प्रतिष्ठा (Reputation), मानसिक शांति और भावनात्मक कल्याण (Emotional well-being) को प्रभावित किया है। भले ही इसे गणितीय शुद्धता से न मापा जा सके, फिर भी यह कानून की नजर में एक स्वीकृत चोट है और इसके लिए मुआवजा दिया जाना पूरी तरह न्यायोचित है।

देरी (Limitation Act) का तर्क भी हुआ फेल

आरोपी ने दलील दी थी कि दीवानी मुकदमा बहुत देर से दायर किया गया। कोर्ट ने लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 6 को लागू करते हुए कहा कि चूंकि घटना के समय लड़की नाबालिग थी, इसलिए बालिग (Majority) होने के तीन साल के भीतर उसने यह याचिका दायर कर दी थी, जो कानूनन समय सीमा के भीतर है।

केस शीट: मद्रास हाई कोर्ट सिविल हर्जाना समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय, चेन्नई
माननीय न्यायाधीशडॉ. जस्टिस ए.डी. मारिया क्लीट (एकल पीठ)
प्रासंगिक कानूनटॉर्ट कानून (Law of Torts) एवं लिमिटेशन एक्ट की धारा 6
विवाद का मुख्य आधारशादी के झूठे वादे से सहमति लेकर शारीरिक संबंध बनाने पर मुआवजे का दावा।
आरोपी का विधिक बचावक्रिमिनल केस में बरी होना और भरण-पोषण केस खारिज होना।
अदालत का अंतिम निर्णयआरोपी की अपील खारिज; निचली अदालत की हर्जाना डिक्री की पुष्टि।
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