Wednesday, July 15, 2026
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Law Handbook: यौन अपराधों में जजों की असंवेदनशीलता बर्दाश्त नहीं…ज्यूडिशियल सेंसिटिविटी हैंडबुक को बार-बेंच और पुलिस सभी जरूर पालन करें

Law Handbook: सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता (Judicial Sensitivity) सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष रिपोर्ट और गाइडलाइंस को तैयार किया है।

जजों के भीतर करुणा और संवेदनशीलता का होना अनिवार्य: सीजेआई

एक बेहद ऐतिहासिक और सुधारात्मक कदम उठाते हुए शीर्ष अदालत ने इस गाइडलाइंस को सुप्रीम कोर्ट समेत देश के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) की आधिकारिक वेबसाइटों पर सार्वजनिक रूप से अपलोड करने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस संबंध में देश की पूरी न्यायपालिका और पुलिस व्यवस्था के लिए बेहद कड़े निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा, यौन अपराधों और संवेदनशील मामलों से निपटते समय जजों के भीतर करुणा (Compassion) और संवेदनशीलता (Sensitivity) का होना अनिवार्य है। अदालती फैसलों या टिप्पणियों में किसी भी तरह की असंवेदनशीलता समाज और पीड़िता के घावों पर नमक छिड़कने जैसी है। अब से देश की सभी अदालतों को यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई और फैसला लिखते समय नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) द्वारा तैयार हैंडबुक (नियमावली) में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा।

मामला क्या है?: इलाहाबाद हाई कोर्ट के ‘पायजामा स्ट्रिंग’ वाले विवादित फैसले से उपजा विवाद

यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद शुरू किए गए एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले से जुड़ा है, जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के एक विवादित फैसले के बाद पैदा हुआ था।

हाईकोर्ट का विवादित फैसला (मार्च 2025): पोक्सो (POCSO Act) के एक मामले में सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद हैरान करने वाला फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि ‘एक नाबालिग लड़की के पायजामे का नाड़ा (String) खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना बलात्कार के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता।’ हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी पर लगी बड़ी धाराओं को हटाकर उसे केवल ‘महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे’ (IPC की धारा 354-B) और यौन हमले के कम गंभीर अपराध में बदल दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: इस फैसले पर देशव्यापी आक्रोश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च 2025 को तुरंत इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए आदेश पर रोक (Stay) लगा दी थी।

फरवरी 2026 में फैसला रद्द: सर्वोच्च अदालत ने फरवरी 2026 में हाईकोर्ट के इस विवादित फैसले को पूरी तरह से खारिज (Set Aside) कर दिया था। लेकिन जजों में इस तरह की असंवेदनशीलता को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यापक नीतिगत मामले को खुला रखा।

एक्सपर्ट कमेटी का गठन और सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश

अदालत ने भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) से अनुरोध किया था कि वह विशेषज्ञों की एक समिति बनाए, जो जजों और न्यायिक प्रक्रियाओं में करुणा व संवेदनशीलता पैदा करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे। अब उस कमेटी की रिपोर्ट (हैंडबुक) अदालत के सामने पेश की गई, जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने दो बड़े आदेश जारी किए।

हर अदालत के लिए हैंडबुक का पालन अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि देश की सभी निचली अदालतें और उच्च न्यायालय यौन अपराधों के मामलों में इस हैंडबुक में दी गई शब्दावलियों और दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करेंगे।

पुलिस थानों को भी निर्देश

अदालत ने देश के सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने राज्यों के सभी पुलिस थानों (Police Stations) को यह हैंडबुक भेजें। पुलिस को निर्देश दिया जाए कि वे यौन अपराधों के मामलों में एफआईआर (FIR) दर्ज करते समय और चार्जशीट (Chargesheet) दाखिल करते समय इस हैंडबुक के मापदंडों का पालन करें ताकि पीड़िता की गरिमा को ठेस न पहुंचे।

कोर्ट रूम जिरह: “जजों का भी कर्तव्य है कि वे खुद रिसर्च करें”

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ का ध्यान आकर्षित करते हुए चिंता जताई कि सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के सख्त फैसले के बावजूद कुछ अदालती आदेशों में अभी भी असंवेदनशील दृष्टिकोण दिखाई दे रहा है। उन्होंने हाल ही में 9 जुलाई 2026 को एक अन्य हाईकोर्ट द्वारा पारित किए गए एक आदेश का उदाहरण कोर्ट के सामने रखा। इस पर जस्टिस वी. मोहना ने पूछा, “क्या उस मामले में हमारे (फरवरी 2026 वाले) फैसले का हवाला दिया गया था?” सीजेआई सूर्यकांत ने इस पर बेहद तल्ख लेकिन व्यावहारिक टिप्पणी करते हुए कहा, वकीलों द्वारा साइटेशन (नजीर) देने के अलावा, खुद जज का भी यह कर्तव्य है कि वह ऐसे संवेदनशील मामलों में खुद कानूनी रिसर्च करे और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों को पढ़े। कोर्ट का स्टाफ कुछ नहीं कर रहा है (जिसके कारण जजों को अपडेट नहीं मिल पाते)।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट यौन अपराध न्यायिक संवेदनशीलता समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य निर्देश
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशCJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
मामले की प्रकृतिस्वतः संज्ञान (Suo Motu) – न्यायिक संवेदनशीलता सुधार
मूल विवादित आदेशइलाहाबाद हाईकोर्ट का मार्च 2025 का पोक्सो (POCSO) आदेश
रिपोर्ट तैयारकर्तानेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA), भोपाल की विशेषज्ञ समिति
अदालत का मुख्य निर्देशहैंडबुक को सुप्रीम कोर्ट और सभी 25 हाई कोर्ट्स की वेबसाइट पर अपलोड करने के आदेश।
पुलिस के लिए निर्देशराज्यों को एफआईआर और चार्जशीट में इस हैंडबुक के नियमों को लागू करने का हुक्म।
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