Tuesday, September 1, 2026
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Drunk Driving: किसी व्यक्ति के मुंह से शराब की केवल गंध आए तो क्या वह शराबी कहलाएगा…शराब पीकर वाहन चलाने का यह केस सभी पढ़ें

Drunk Driving: सड़क दुर्घटनाओं में शराब के सेवन को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक कुमार वर्मा (Alok Kumar Verma) की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत तय सीमा से अधिक अल्कोहल की पुष्टि लैब या ब्रीथ एनालाइज़र से नहीं होती, तब तक महज डॉक्टर की ‘सूंघने’ की रिपोर्ट के आधार पर गैर-इरादतन हत्या का गंभीर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

शरीर में अल्कोहल की मात्रा कानून द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक, यह साबित करें

अदालत ने कहा, बिना किसी वैज्ञानिक साक्ष्य (जैसे ब्लड टेस्ट या ब्रीथ एनालाइज़र टेस्ट) के, किसी व्यक्ति के मुंह से शराब की केवल गंध (Smell of Alcohol) आने के आधार पर उस पर शराब पीकर गाड़ी चलाने (Drunk Driving) या भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) का आरोप नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए वैज्ञानिक रूप से यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी के शरीर में अल्कोहल की मात्रा कानून द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक थी।

मामला क्या है?: बद्रीनाथ मार्ग पर पलटी जीप और ‘गंध’ का विवाद

यह विधिक मामला चमोली जिले की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है।

घटना: याचिकाकर्ता अमर सिंह यात्रियों से भरी एक जीप को बद्रीनाथ धाम से चमोली की तरफ चला रहा था। रास्ते में जीप अनियंत्रित होकर पलट गई, जिससे एक यात्री की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

मेडिकल रिपोर्ट का पेंच: हादसे के बाद जब चालक अमर सिंह का मेडिकल कराया गया, तो डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि चालक की सांसों से “शराब की गंध” आ रही थी। हालांकि, पुलिस या डॉक्टरों ने न तो चालक का ब्लड सैंपल (रक्त का नमूना) लिया और न ही मौके पर कोई ब्रीथ एनालाइज़र टेस्ट (फूंक मारने वाली जांच) किया।

सत्र न्यायालय का फैसला: निचली अदालत ने केवल ‘शराब की गंध’ की डॉक्टर की टिप्पणी को आधार मानकर चालक पर नई दंड संहिता यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या), धारा 125(ए) (लापरवाही से जीवन खतरे में डालना), धारा 125(बी) और धारा 281 (सार्वजनिक मार्ग पर तेजी और लापरवाही से गाड़ी चलाना) के तहत आरोप तय (Charges Frame) कर दिए थे।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: कानून में वैज्ञानिक साक्ष्य का महत्व

जस्टिस आलोक वर्मा ने आरोपी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) पर सुनवाई करते हुए कानून के कड़े तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट किया।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185: कोर्ट ने कानून का हवाला देते हुए कहा कि मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के तहत किसी व्यक्ति को ‘शराब पीकर गाड़ी चलाने’ का दोषी तभी माना जा सकता है, जब वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो कि उसके 100 मिलीलीटर रक्त में अल्कोहल की मात्रा 30 मिलीग्राम से अधिक (> 30 mg/100 ml) थी।

बनाम केवल गंध: बिना ब्लड टेस्ट के केवल सांस से गंध आना यह साबित नहीं करता कि चालक ‘नशे की हालत’ में था या उसका मानसिक संतुलन गाड़ी चलाने योग्य नहीं था।

हादसे का तकनीकी कारण: आरोपी के वकील ने दलील दी कि जीप का अगला टायर अचानक फट गया था, जिसके कारण वाहन अनियंत्रित हुआ, न कि चालक की लापरवाही या नशे के कारण।

गंभीर धारा (BNS 105) हटी: हाई कोर्ट ने माना कि पहली नजर में (Prima Facie) मामले में बीएनएस की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या – जिसके तहत 10 साल तक की कैद या आजीवन कारावास का प्रावधान है) लगाने के पर्याप्त और वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं हैं।

अदालत का अंतिम आदेश

उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय (Sessions Court) के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए निर्देश दिए।

गंभीर धारा निरस्त: आरोपी अमर सिंह के खिलाफ बीएनएस की धारा 105 (Culpable Homicide Not Amounting to Murder) के तहत तय किए गए आरोपों को खारिज (Set Aside) कर दिया गया है।

लापरवाही के मुकदमे चलेंगे: हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने और दूसरों की जान खतरे में डालने की धाराएं— BNS 125(a), 125(b) और 281 के तहत मुकदमा पहले की तरह चलता रहेगा।

विधिक केस शीट: उत्तराखंड हाई कोर्ट ‘ड्रंक ड्राइविंग’ साक्ष्य समीक्षा

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतउत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल
माननीय न्यायाधीशजस्टिस आलोक कुमार वर्मा
मुख्य आरोपीअमर सिंह (जीप चालक)
विधिक सीमा (M.V. Act Sec 185)रक्त में अल्कोहल की मात्रा $30\text{ mg}$ प्रति $100\text{ ml}$ से अधिक होनी चाहिए
हटाए गए आरोपBNS धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या)
बरकरार रखे गए आरोपBNS धारा 125(a), 125(b) (लापरवाही) एवं धारा 281 (लापरवाह ड्राइविंग)

केवल “मुंह से गंध आने” जैसी व्यक्तिपरक (subjective) टिप्पणियों के आधार पर किसी को हत्या जैसे जघन्य अपराध का आरोपी नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला जांच एजेंसियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने और वैज्ञानिक साक्ष्यों के संकलन को कड़ाई से लागू करने का एक कड़ा संदेश है।

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