पटना हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- प्रमाणित कृषि आय की अनदेखी: कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा घोषित और सरकारी दस्तावेजों से समर्थित ₹34.55 लाख की कृषि आय को ईओयू ने आय से अधिक संपत्ति की गणना में शामिल ही नहीं किया, जो एफआईआर की नींव को कमजोर करता है।
- तृतीय पक्ष की संपत्ति का बेबुनियाद जुड़ाव: अदालत ने कहा कि राज्य यह साबित करने में विफल रहा कि डीएसपी की माता या सास-ससुर के नाम की संपत्तियों में वास्तविक रूप से डीएसपी का ही पैसा लगा था।
- 4 साल तक चार्जशीट नहीं: हाईकोर्ट ने नोट किया कि 4 साल की लंबी जांच के बावजूद पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी और न ही चार्जशीट दाखिल कर पाई। हालांकि केवल देरी केस रद्द करने का आधार नहीं होती, लेकिन जब एफआईआर की बुनियाद ही कमजोर हो, तो यह एक महत्वपूर्ण पहलू बन जाता है।
पटना: पटना हाईकोर्ट ने बिहार पुलिस के एक पुलिस उपाधीक्षक (DSP) के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत दर्ज 2022 की प्राथमिकी (FIR) को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार की एकल पीठ ने डीएसपी रंजीत कुमार रजक द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए 25 अगस्त को यह फैसला सुनाया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले की कोई उचित कानूनी और तथ्यात्मक नींव नहीं थी। जांच एजेंसी ने डीएसपी की ₹34.55 लाख की प्रमाणित कृषि आय को गणना से मनमाने ढंग से बाहर रखा और परिजनों की संपत्तियों को बिना किसी साक्ष्य के उनसे जोड़ दिया।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
मामले की आधारहीनता और जांच की कमियों पर अदालत ने कहा: “₹34.55 लाख की दस्तावेजी कृषि आय को गणना में शामिल न करना, एफआईआर का आधार बनी विस्तृत स्रोत सामग्री (Source Material) का अभाव, याचिकाकर्ता और विवादित पारिवारिक संपत्तियों के बीच प्रथम दृष्टया संबंध स्थापित करने में विफलता, और 4 वर्षों की अनिर्णायक जांच—ये सभी बिंदु एक साथ मिलकर अभियोजन पक्ष के मामले की बुनियाद को कमजोर करते हैं।”
प्राथमिक जांच (Preliminary Enquiry) और भ्रष्टाचार के मामलों पर पीठ ने स्पष्ट किया: “भ्रष्टाचार के मामलों में प्राथमिक जांच वांछनीय है, यद्यपि अनिवार्य नहीं। लेकिन जब एफआईआर किसी गुमनाम शिकायत पर दर्ज की गई हो और उसके साथ बुनियादी गणना सामग्री न हो, तो यह जांच एजेंसी के मनमाने दृष्टिकोण को दर्शाता है।”
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
- ईओयू (EOU) द्वारा दर्ज मामला: बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने 2022 में डीएसपी रंजीत कुमार रजक के खिलाफ एक अज्ञात/गुमनाम शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की थी।
- 81.9% अधिक संपत्ति का दावा: जांच एजेंसी ने चेक पीरियड (10 फरवरी 2015 से 5 सितंबर 2022) के दौरान डीएसपी के पास ज्ञात आय से ₹63.79 लाख (लगभग 81.9% अधिक) की आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) होने का आरोप लगाया था।
- डीएसपी की दलीलें
- वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2021-22 के लिए उनकी ₹34.55 लाख की कृषि आय सरकारी प्रमाणपत्रों और इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) से प्रमाणित थी, जिसे ईओयू ने जानबूझकर छोड़ दिया।
- उनकी माता और ससुर के नाम पर दर्ज संपत्तियों को बिना किसी वित्तीय संबंध या बेनामी प्रमाण के जबरन उनकी संपत्ति मान लिया गया।
- राज्य सरकार का रुख: सीनियर एडवोकेट विश्वनाथ प्रसाद सिन्हा ने राज्य का पक्ष रखते हुए कहा कि डीएसपी के नाम पर कोई कृषि भूमि नहीं है और परिवार द्वारा लिए गए ऋण/आय का कोई उचित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट द्वारा FIR रद्द करने के मुख्य आधार
- प्रमाणित कृषि आय की अनदेखी: राज्य सरकार अपने जवाबी हलफनामे (Counter-affidavit) में यह स्पष्ट करने में पूरी तरह विफल रही कि आयकर विभाग में घोषित और प्रमाणित कृषि आय को गणना से बाहर क्यों रखा गया।
- पारिवारिक संपत्तियों से सीधा संबंध नहीं: अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि रिश्तेदारों की संपत्तियों का वित्तपोषण (Financing) डीएसपी द्वारा किया गया था।
- 4 वर्षों में कोई चार्जशीट नहीं: अदालत ने रेखांकित किया कि एफआईआर दर्ज हुए लगभग 4 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जांच अब भी अनिर्णायक है और कोई आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल नहीं किया जा सका।
अंतिम आदेश
पटना उच्च न्यायालय ने माना कि इस प्रकार की आधारहीन आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने डीएसपी रंजीत कुमार रजक के खिलाफ आर्थिक अपराध इकाई (EOU) द्वारा दर्ज 2022 की प्राथमिकी को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया।
पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार ने अपना आदेश पारित करते हुए कहा: “प्रमाणित कृषि आय (₹34.55 लाख) को ध्यान में न रखना, विस्तृत सोर्स रिपोर्ट का अभाव, याचिकाकर्ता और विवादित पारिवारिक/तृतीय-पक्ष संपत्तियों के बीच प्रथम दृष्टया संबंध दिखाने में विफलता, और लगातार अनिर्णीत जांच, जब एक साथ देखे जाते हैं, तो अभियोजन के मामले की नींव को भौतिक रूप से कमजोर करते हैं।”
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (डीएसपी) की ओर से: अधिवक्ता नीलांजन चटर्जी, कुमरेश सिंह, प्रज्ञा प्रिया एवं अन्य।
- राज्य सरकार की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वनाथ प्रसाद सिन्हा।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार (Justice Praveen Kumar) |
| कानून/अधिनियम | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) |
| मामला/पक्षकार | रंजीत कुमार रजक (DSP) बनाम बिहार राज्य (EOU) |
| अदालत का फैसला | 2022 की FIR रद्द; पाई गई कि कृषि आय को नजरअंदाज करना और परिजनों की संपत्ति जोड़ना अनुचित था। |

