Tuesday, September 1, 2026
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Obscenity Case: Motherf****ker जैसी गाली या अभद्र भाषा क्या अश्लीलता है…गाली देने की परिस्थिति पर सुप्रीम फैसला आया, सभी जरूर पढ़ें

Obscenity Case: गाली-गलौज और विधिक रूप से ‘अश्लीलता’ के बीच की महीन रेखा को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

तमिलनाडु के एक 70 वर्षीय बुजुर्ग की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने तमिलनाडु के एक 70 वर्षीय बुजुर्ग की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ लगी अश्लीलता और आपराधिक धमकी की धाराओं को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा, गुस्से या आपसी झगड़े में किसी को ‘मदरफकर’ (Motherfucker) या ‘सन ऑफ ए व्ह*र’ (Son of a Whore) कहना बेहद अभद्र, असभ्य और घृणास्पद हो सकता है, लेकिन इसे कानूनी तौर पर ‘अश्लीलता’ (Obscenity) नहीं माना जा सकता। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(b) के तहत अश्लीलता का अपराध तभी बनता है जब शब्द कामुक (Lascivious) हों, वासना को भड़काने वाले (Prurient Interests) हों और सुनने वाले के दिमाग को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखते हों।

मामला क्या है?: 2017 का जमीन विवाद और ‘बिलहुक’ से हमला

यह पूरा मामला अगस्त 2017 में तमिलनाडु में कृषि भूमि को लेकर हुए एक विवाद से शुरू हुआ था।

विवाद और गाली-गलौज: आरोपी ‘मनी’ (Mani) का शिकायतकर्ता के परिवार से झगड़ा हुआ था। जब शिकायतकर्ता ने बीच-बचाव किया, तो मनी ने कथित तौर पर उसके लिए ‘मदरफकर’ और ‘सन ऑफ ए व्ह*र’ जैसे घोर आपत्तिजनक और अभद्र अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

जानलेवा हमला: गाली देने के बाद मनी अपने घर से एक ‘बिलहुक’ (खेतों में इस्तेमाल होने वाला धारदार हथियार) लाया और शिकायतकर्ता पर हमला कर दिया। इस हमले में शिकायतकर्ता के माथे, अंगूठे और नाक पर गंभीर चोटें आईं। सीटी स्कैन में पता चला कि उसकी नाक की हड्डी (Nasal Bone) टूट गई थी।

निचली अदालतों का रुख: ट्रायल कोर्ट ने मनी को आईपीसी की धारा 294(b) (अश्लीलता), 326 (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट) और 506(ii) (क्रिमिनल इंटिमिडेशन) के साथ-साथ SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। बाद में मद्रास हाई कोर्ट ने उसे SC/ST एक्ट से तो बरी कर दिया, लेकिन आईपीसी की सजा बरकरार रखी। इसके बाद मनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: अश्लीलता बनाम अभद्रता (Obscenity vs Vulgarity)

सर्वोच्च अदालत ने आईपीसी की धारा 294(b) के आवश्यक विधिक तत्वों की गहराई से समीक्षा की और गाली-गलौज को अश्लीलता के दायरे से बाहर कर दिया।

कानूनी लक्ष्मण रेखा: खंडपीठ ने अपने फैसले में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा, कानूनी तौर पर, अश्लीलता (Obscenity) शब्द ‘अभद्रता’ (Vulgarity), ‘गाली’ (Abuse) या ‘अपशब्द’ (Profanity) का पर्यायवाची नहीं है। केवल अपशब्दों, गालियों और अभद्र भाषा का उपयोग, चाहे वे कितने भी अरुचिकर या असभ्य क्यों न हों, अश्लीलता के बराबर नहीं माना जा सकता। ऐसे शब्द घृणा, आक्रोश या सदमा पैदा कर सकते हैं, लेकिन वे कानून की नजर में अश्लील नहीं हो जाते।

सार्वजनिक खीझ (Annoyance) का अभाव: कोर्ट ने कहा कि धारा 294(b) को लागू करने के लिए दो शर्तें जरूरी हैं—पहला, शब्द सार्वजनिक स्थान पर कहे गए हों और दूसरा, उससे आम जनता को खीझ या परेशानी (Annoyance) हुई हो। इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं था कि इन अपशब्दों से सार्वजनिक रूप से किसी को परेशानी हुई।

विधिक नजीरों (Precedents) का हवाला: सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले को पुख्ता करने के लिए कई ऐतिहासिक मामलों का संदर्भ दिया। रंजीत डी. उदेशी (1965) व समरेश बोस (1985): इनमें माना गया था कि अश्लील सामग्री वह है जो मन को विकृत और भ्रष्ट करे, न कि जो केवल घृणा पैदा करे।

अवीक सरकार (2014): जिसमें कोर्ट ने अश्लीलता जांचने के लिए पुराने ‘हिकलिन टेस्ट’ को बदलकर आधुनिक ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स टेस्ट’ (सामुदायिक मानक परीक्षण) को अपनाया था।

सिल्वाकुमार बनाम राज्य (2026): जो यह दोहराता है कि बिना यौन विकृति (Sexually Depraving Element) के गाली-गलौज अश्लीलता नहीं है।

गंभीर चोट (धारा 326) की सजा बरकरार, लेकिन उम्र के कारण राहत

अदालत ने अश्लीलता के साथ-साथ धारा 506(ii) (क्रिमिनल इंटिमिडेशन) के तहत भी मनी को बरी कर दिया। कोर्ट ने नरेश अनेजा (2025) केस का हवाला देते हुए कहा कि झगड़े के दौरान हवा में दी गई धमकी तब तक अपराध नहीं है जब तक कि यह साबित न हो कि उसका वास्तविक उद्देश्य पीड़ित के मन में गहरा डर पैदा करना था। हालांकि, कोर्ट ने धारा 326 (गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत उसकी सजा को पूरी तरह सही माना।

विधिक आधार: मेडिकल रिपोर्ट में नाक की हड्डी का टूटना साबित हुआ था, जो आईपीसी की धारा 320 के तहत ‘गंभीर चोट’ (Grievous Hurt) के दायरे में आता है और इसके लिए बिलहुक जैसे खतरनाक हथियार का इस्तेमाल किया गया था।

मानवीय आधार पर राहत: चूंकि आरोपी मनी अब लगभग 70 वर्ष का बुजुर्ग है और बीमार है, साथ ही यह विवाद केवल एक पारिवारिक जमीन का झगड़ा था, इसलिए कोर्ट ने उसकी जेल की सजा को घटाकर ‘उठती अदालत तक की कैद’ (Imprisonment till the rising of the court) कर दिया और उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया, जिसे दो महीने के भीतर पीड़ित को मुआवजे के रूप में देना होगा।

विधिक केस शीट: मनी बनाम राज्य (अपशब्द एवं अश्लीलता वाद – 2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतसुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम.पंचोली
केस का नाममनी बनाम राज्य (Mani v. State – 2026)
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या सार्वजनिक रूप से ‘Motherfucker’ कहना IPC की धारा 294(b) में अश्लीलता है?
अदालत का विधिक निष्कर्षनहीं, यह केवल अभद्र/गाली-गलौज (Vulgarity) है, कानूनी अश्लीलता (Obscenity) नहीं।
बहाल रखी गई धाराधारा 326 (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने के लिए दोषी)
अंतिम संशोधित सजाअदालत उठने तक की कैद और ₹50,000 का नकद जुर्माना

अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानूनी रूप से अश्लीलता का संबंध केवल कामुकता और वासना से है, न कि सड़क पर होने वाले झगड़ों की गालियों से। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि अपशब्दों पर भले ही कानूनी छूट मिल जाए, लेकिन अगर आप हाथ में हथियार उठाकर किसी की नाक की हड्डी तोड़ेंगे (धारा 326), तो कानून के कड़े डंडे और भारी जुर्माने से आपकी उम्र भी आपको नहीं बचा पाएगी।

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