Tuesday, July 21, 2026
HomeLaworder HindiJuvenile Justice: बिना तार्किक आदेश के बच्चों पर वयस्कों की तरह मुकदमा...

Juvenile Justice: बिना तार्किक आदेश के बच्चों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाना पूरी तरह अवैध…जुवेनाइल कोर्ट को लेकर यह रहा दिशानिर्देश

Juvenile Justice: देश की बाल न्याय प्रणाली और किशोरों के सुरक्षात्मक कानूनी ढांचे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद बड़ा और युगांतकारी फैसला सुनाया है।

JJ Act की धारा 19(1) को लेकर यह दी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने एक हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए युवक की अपील को स्वीकार करते हुए उसकी 14 साल की सजा और दोषसिद्धि को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) कर दिया और उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा, यदि कोई जुवेनाइल (किशोर या बाल अपचारी) किसी जघन्य अपराध में आरोपी है, तो जुवेनाइल कोर्ट (Children’s Court) सीधे उस पर वयस्कों (Adults) की तरह मुकदमा नहीं चला सकती। मुकदमा शुरू करने से पहले अदालत को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) की धारा 19(1) के तहत एक स्पष्ट और तार्किक आदेश (Reasoned Order) पारित करना अनिवार्य है। इस विधिक आदेश की अनुपस्थिति पूरे मुकदमे (Trial) की वैधता को ही समाप्त (Vitiate) कर देती है।

मामला क्या है?: 16 साल की उम्र में मर्डर का आरोप और 14 साल की जेल

यह पूरा विधिक मामला अक्टूबर 2018 में हुई एक झगड़े और हत्या की घटना से जुड़ा है।

घटना के समय उम्र: अपराध के समय अपीलकर्ता की उम्र 16 साल 6 महीने थी। उस पर कई अन्य लोगों के साथ मिलकर एक व्यक्ति पर जानलेवा हमला करने और उसकी हत्या करने का आरोप था।

शुरुआती प्रक्रिया: किशोर न्याय बोर्ड (JJB), कैथल ने अधिनियम की धारा 15 के तहत एक ‘प्रारंभिक मूल्यांकन’ (Preliminary Assessment) किया। बोर्ड का मानना था कि किशोर के पास इस अपराध को समझने की पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमता थी, इसलिए मामले को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कैथल (जो चिल्ड्रंस कोर्ट के रूप में कार्यरत थे) को धारा 18(3) के तहत ट्रांसफर (Commit) कर दिया गया।

सजा और हाई कोर्ट की मुहर: चिल्ड्रंस कोर्ट ने किशोर पर सीधे वयस्क की तरह मुकदमा चलाया, उसे आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराया और 14 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। बाद में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट में विधिक मोड़: प्रक्रिया की एक ‘बड़ी भूल’ ने बदला पासा

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने कोर्ट का ध्यान एक बुनियादी विधिक चूक की ओर आकर्षित किया।

धारा 19(1) का उल्लंघन: वकील ने दलील दी कि चिल्ड्रंस कोर्ट को जेजे बोर्ड से केस तो मिल गया था, लेकिन उसने खुद धारा 19(1) के तहत यह निर्धारित करने वाला कोई लिखित आदेश पारित नहीं किया कि क्या आरोपी पर वास्तव में वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए या उसे बच्चा मानकर जांच (Inquiry) की जानी चाहिए।

रिकॉर्ड का सत्यापन: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब संबंधित सत्र न्यायालय के रिकॉर्ड की जांच की गई, तो यह बात सच साबित हुई कि मुकदमा शुरू होने से पहले ऐसा कोई आदेश रिकॉर्ड पर लिया ही नहीं गया था।

सर्वोच्च न्यायालय का विधिक दृष्टिकोण: प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि मौलिक कर्तव्य है

जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने अधिनियम की वैधानिक योजना (Statutory Scheme) का गहराई से विश्लेषण किया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए।

‘May’ (सकता है) को ‘Shall’ (होगा) पढ़ा जाए

अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 19(1) में ‘May’ शब्द का प्रयोग हुआ है, लेकिन इसे अनिवार्य यानी ‘Shall’ के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इस धारा के तहत आने वाले दो फैसलों (वयस्क की तरह ट्रायल या बच्चे की तरह जांच) के परिणाम आरोपी के भविष्य पर बहुत गहरा और अलग असर डालते हैं, जिसमें सजा की अवधि और आपराधिक रिकॉर्ड का बने रहना शामिल है।

सुरक्षात्मक ढांचे पर सीधा प्रहार

अदालत ने मॉडल रूल्स, 2016 के नियम 13 का हवाला देते हुए कहा, यह वैधानिक दायित्व केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह कानून का एक मौलिक (Substantive) हिस्सा है। चिल्ड्रंस कोर्ट को किसी बच्चे पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) तभी प्राप्त होता है, जब वह इस संबंध में अपनी संतुष्टि और कारणों को लिखित रूप में दर्ज करे। इसकी अनदेखी करना अधिनियम के सुरक्षात्मक ढांचे की जड़ पर प्रहार करता है।

‘मास्टर भोलू’ और ‘तिरुमूर्ति’ नजीरों का संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए पूर्व के तीन बड़े ऐतिहासिक फैसलों का सहारा लिया।

अजीत गुर्जर बनाम मध्य प्रदेश राज्य और बारुण चंद्र ठाकुर बनाम मास्टर भोलू (2022): इन मामलों में कोर्ट ने प्रारंभिक मूल्यांकन और निर्धारण प्रक्रिया को अनिवार्य माना था।

तिरुमूर्ति बनाम राज्य: इस मामले में कोर्ट ने साफ कहा था कि धारा 19 जैसी अनिवार्य धाराओं का पालन न करने पर पूरा ट्रायल दूषित (Vitiate) हो जाता है और आरोपी बरी होने का हकदार हो जाता है।

अदालत ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सजा को केवल ‘काटी गई अवधि’ (जितनी जेल काट चुका है) तक सीमित कर दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि धारा 19(1) की कमी को ट्रायल खत्म होने के बाद ठीक (Cure) नहीं किया जा सकता।

अंतिम आदेश: 6 साल की जेल के बाद आरोपी पूरी तरह बरी

सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि अपीलकर्ता अब 24 वर्ष का हो चुका है और वह पहले ही 6 साल से अधिक की जेल काट चुका है। इतने लंबे समय के बाद अब यह पता लगाना व्यावहारिक रूप से असंभव है कि अपराध के समय (2018 में) उसकी मानसिक स्थिति या क्षमता क्या थी। इसलिए मामले को दोबारा चिल्ड्रंस कोर्ट भेजना समय की बर्बादी होगी। कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

देशभर की अदालतों को चेतावनी

सर्वोच्च न्यायालय ने देश की सभी चिल्ड्रंस कोर्ट्स के लिए एक सख्त गाइडलाइन जारी की है। कोर्ट ने कहा कि जेजे बोर्ड से धारा 18(3) के तहत केस मिलते ही, संज्ञान (Cognizance) लेने के बाद अदालत का सबसे पहला कर्तव्य यह होगा कि वह आगे की कोई भी कार्यवाही शुरू करने से पहले धारा 19(1) के तहत एक तार्किक आदेश पारित करे।

विधिक फैक्ट शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम किशोर न्याय अधिनियम वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय
संबंधित न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India), नई दिल्ली
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले (खंडपीठ)
मूल वैधानिक अधिनियमधारा 19(1) एवं धारा 18(3), किशोर न्याय (JJ) अधिनियम, 2015
संबद्ध नियम पुस्तिकाकिशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) मॉडल रूल्स, 2016 (नियम 13)
घटना की तिथि और पूर्व सजाअक्टूबर 2018 (घटना) | निचली अदालत द्वारा 14 साल के सश्रम कारावास की सजा
अदालत का अंतिम आदेशअपील स्वीकार; दोषसिद्धि रद्द और आरोपी को तुरंत बरी करने का आदेश

जुवेनाइल कोर्ट की एक प्रशासनिक लापरवाही के कारण 6 साल जेल में बिताने के बाद एक हत्या के आरोपी को बरी करना पड़ा, जो यह सबक देता है कि जजों की छोटी सी तकनीकी चूक भी पूरे मुकदमे को शून्य बना सकती है। यह फैसला किशोरों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक मील का पत्थर है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
overcast clouds
29.3 ° C
29.3 °
29.3 °
70 %
5.6kmh
87 %
Tue
29 °
Wed
33 °
Thu
31 °
Fri
33 °
Sat
35 °