POCSO Act: किशोरों के आपसी सहमति के प्रेम संबंधों और घर से भागने के मामलों में POCSO Act के बढ़ते दुरुपयोग और किशोरों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर और व्यावहारिक सवाल उठाए हैं।
पारिवारिक सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कानून को बना रहे हथियार: अदालत
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि कैसे माता-पिता द्वारा अपनी तथाकथित पारिवारिक सामाजिक प्रतिष्ठा (Honour) को बचाने के लिए इस गंभीर कानून का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया जा रहा है। अदालत ने कहा, 15 से 18 वर्ष की आयु का चरण बेहद संवेदनशील और किशोरों के स्वाभाविक विकास (Adolescent Experimentation) का समय होता है। राज्य आखिर किसी लड़के और लड़की को एक-दूसरे के साथ भागने (Elope) से कैसे रोक सकता है? आपसी सहमति के ऐसे रिश्ते 2012 में सहमति की कानूनी उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 साल किए जाने से बहुत पहले से समाज में मौजूद रहे हैं। ऐसे में क्या वास्तव में उन मामलों में पॉक्सो जैसे कड़े कानून को लागू किया जाना चाहिए, जिसे बच्चों के यौन शोषण और क्रूर हमलों को रोकने के लिए बनाया गया था?”
मामला क्या है?: कलकत्ता हाई कोर्ट की विवादित टिप्पणी और सुप्रीम कोर्ट का ‘सुओ मोटो’ संज्ञान
यह व्यापक कानूनी विमर्श सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू किए गए एक जनहित मामले—”इन री: राइट टू प्राइवेसी ऑफ एडोलेसेंट्स” (किशोरों की निजता का अधिकार मामला) के दौरान सामने आया।
पृष्ठभूमि: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान किशोरियों (Adolescent Girls) को अपनी “यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने” और “दो मिनट के आनंद” के बहकावे में न आने की एक बेहद विवादित सलाह दी थी।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: सर्वोच्च न्यायालय ने युवा पीढ़ी के अधिकारों और निजता की रक्षा करते हुए न केवल कलकत्ता हाई कोर्ट की उन टिप्पणियों को पूरी तरह से खारिज (Set Aside) कर दिया, बल्कि इस विषय पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Case) लेते हुए एक व्यापक विधिक विमर्श शुरू किया।
सुनवाई के दौरान मुख्य विधिक और सामाजिक चिंताएं
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने पॉक्सो मामलों की व्यावहारिक जमीनी हकीकत पर उंगली उठाई।
माता-पिता द्वारा कानून का दुरुपयोग
अदालत ने नोट किया कि जब कोई किशोर लड़की अपने साथी के साथ भाग जाती है, तो कई बार माता-पिता लड़के को सबक सिखाने या अपनी बात ऊपर रखने के लिए उसके खिलाफ पॉक्सो के तहत मुकदमा दर्ज करा देते हैं। इन परिस्थितियों में, विधिक प्रक्रिया (Legal Process) खुद उन किशोरों के लिए एक असहनीय मानसिक और सामाजिक बोझ बन जाती है। अंततः जब लड़की बालिग होती है या अदालत में बयान देती है, तो रिश्ता सहमति का होने के कारण आरोपी को बरी (Acquit) करना पड़ता है, लेकिन तब तक युवाओं का जीवन बुरी तरह प्रभावित हो चुका होता है।
मूल केस का सुखद अंत और सिस्टम की विफलता
मामले में अदालत द्वारा नियुक्त की गई वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) माधवी दीवान ने पीठ को एक महत्वपूर्ण अपडेट दिया।
व्यक्तिगत मामला: जिस मूल मामले से कलकत्ता हाई कोर्ट का विवाद शुरू हुआ था, वह अब पूरी तरह सुलझ चुका है। नाबालिग लड़की अब उस 25 वर्षीय व्यक्ति के साथ शादी करके अपने बच्चे के साथ एक खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रही है।
समिति की रिपोर्ट: हालांकि, माधवी दीवान ने अदालत द्वारा नियुक्त समिति की एक ‘कड़ी रिपोर्ट’ पेश की, जिसमें पॉक्सो मामलों को संभालने में प्रशासनिक और संस्थागत विफलताओं (Systemic Failures) को उजागर किया गया है। रिपोर्ट में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि पॉक्सो पीड़ितों के लिए समाज में प्रभावी पुनर्वास (Rehabilitation) का भारी अभाव है।
केंद्र सरकार के प्रस्ताव और अदालती निगरानी का ढांचा
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और कोर्ट के बीच भविष्य के कदमों को लेकर विधिक मंथन हुआ।
कक्षा 6 से पॉक्सो जागरूकता: केंद्र सरकार के वकील ने अदालत को सूचित किया कि किशोर शिक्षा और पॉक्सो अधिनियम से जुड़ी जमीनी जागरूकता के लिए नई गाइडलाइंस विकसित की जा रही हैं। इसके तहत एक क्रमिक दृष्टिकोण (Graded Approach) अपनाते हुए कक्षा 6 (Class 6) से ही बच्चों को कानून और उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित किया जाएगा।
निगरानी का अधिकार क्षेत्र: सुनवाई के दौरान एक केंद्रीय डैशबोर्ड (Central Dashboard) बनाने का सुझाव भी आया ताकि देशभर के पॉक्सो मामलों की निगरानी की जा सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों में पहले से ही बाल अधिकारों (Child Rights) के लिए समर्पित समितियां काम कर रही हैं। इसलिए इसकी निगरानी का जिम्मा राज्य सरकारों और संबंधित हाई कोर्ट की कमेटियों के पास ही रहना चाहिए।
अदालत ने अपने अंतरिम विमर्श में दोहराया कि पॉक्सो कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना है, लेकिन इसे लागू करते समय समाज की व्यावहारिक वास्तविकताओं (Everyday Realities) और किशोर मनोविज्ञान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विधिक फैक्ट शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम किशोर निजता एवं पॉक्सो वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान रुख |
| संबंधित न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India), नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन (खंडपीठ) |
| केस का शीर्षक | In Re: Right to Privacy of Adolescents (स्वतः संज्ञान वाद) |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान |
| प्रस्तावित जागरूकता नीति | स्कूलों में कक्षा 6 से छात्रों को पॉक्सो और उनके विधिक अधिकारों के प्रति सचेत करना |
| विवाद का मूल कारण | किशोरों के आपसी सहमति के प्रेम विवाहों में माता-पिता द्वारा पॉक्सो की धाराओं का उपयोग |
अदालत ने एक बहुत ही मानवीय और तार्किक रुख अपनाया है 15 से 18 वर्ष के युवाओं के बीच होने वाले स्वाभाविक आकर्षण को क्रूर यौन उत्पीड़न के बराबर नहीं तोला जा सकता। कानून को अपनी आंखें बंद रखने के बजाय समाज की बदलती हकीकतों को स्वीकार करना होगा ताकि निर्दोष किशोरों को विधिक प्रक्रियाओं के जरिए अपराधी बनने से बचाया जा सके। इस मामले पर कोर्ट का अंतिम फैसला देश की न्याय प्रणाली को एक नई दिशा देगा।

