Free Education: अल्पसंख्यक संस्थानों के संवैधानिक अधिकारों और सरकारी शक्तियों की विधिक सीमा को स्पष्ट करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
RTE Act के प्रावधान अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर लागू नहीं होते: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस जुव्वादी श्रीदेवी की एकल पीठ ने ‘ब्रदर्स ऑफ सेंट गेब्रियल एजुकेशनल सोसाइटी’ और उनके संस्थानों द्वारा दायर दो रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए जिला शिक्षा अधिकारियों (DEOs) के आदेशों को पूरी तरह से रद्द (Set aside) कर दिया है। अदालत ने कहा, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के प्रावधान देश के अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों (Minority Educational Institutions) पर लागू नहीं होते। राज्य सरकार या शिक्षा विभाग के पास ऐसा कोई वैधानिक अधिकार (Statutory Authority) नहीं है जिसके तहत वे किसी पत्रकार संघ या एसोसिएशन के प्रतिवेदन (Representation) मात्र के आधार पर किसी विशेष वर्ग के बच्चों के लिए निजी स्कूलों में मुफ्त सीटों का कोटा तय कर सकें। प्रशासनिक निर्देश कभी भी संवैधानिक संरक्षणों से ऊपर नहीं हो सकते।
मामला क्या है?: पत्रकारों के बच्चों के लिए ‘फ्री एजुकेशन’ का सरकारी फरमान
यह विधिक विवाद हैदराबाद और आस-पास के जिलों में जिला शिक्षा अधिकारियों द्वारा जारी किए गए कुछ प्रशासनिक निर्देशों से शुरू हुआ था।
सरकारी आदेश: शिक्षा विभाग ने हैदराबाद के विभिन्न मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों, जिनमें अल्पसंख्यक स्कूल भी शामिल थे, को यह निर्देश जारी किया कि वे पत्रकारों के बच्चों को आरटीई (RTE) के तहत मुफ्त शिक्षा प्रदान करें।
अल्पसंख्यक संस्थानों की आपत्ति: अल्पसंख्यक गैर-सहायता प्राप्त (Minority Unaided) संस्थानों ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनकी मुख्य दलील थी कि पत्रकारों का कोई विशेष विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग (Privileged Class) नहीं है जिसे कानून से इतर मुफ्त शिक्षा दी जाए। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक फैसलों के अनुसार अल्पसंख्यक स्कूलों पर आरटीई थोपा ही नहीं जा सकता।
सरकार का बचाव: राज्य सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे (Counter Affidavit) में माना कि पत्रकार संघों ने शिकायत की थी कि स्कूल अत्यधिक फीस ले रहे हैं और कई पत्रकार आर्थिक रूप से कमजोर हैं, इसलिए यह निर्देश जारी किए गए। हालांकि, विभाग ने दबे स्वर में यह भी स्वीकार किया कि ये आदेश “अनिवार्य (Mandatory) प्रकृति के नहीं थे” बल्कि केवल अनुरोध पर आधारित थे।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: ‘प्रमति ट्रस्ट’ और अनुच्छेद 30(1) की ढाल
जस्टिस जुव्वादी श्रीदेवी ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ (Constitution Bench) द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों का बारीकी से विश्लेषण किया।
संवैधानिक संरक्षण (Article 30(1)): कोर्ट ने दोहराया कि भारत का संविधान धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का मौलिक अधिकार देता है।
सुप्रीम कोर्ट की नजीरें: अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों—’सोसाइटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स ऑफ राजस्थान बनाम भारत संघ’ और ‘प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ’ का संदर्भ दिया। इन मामलों में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह पूरी तरह साफ कर दिया था कि आरटीई अधिनियम (विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 25% कोटा तय करने वाली धारा 12(1)(c)) अल्पसंख्यक संस्थानों पर, चाहे वे सरकारी सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त, लागू नहीं की जा सकती।
अदालत ने अधिकारियों के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा, रिकॉर्ड पर मौजूद कोई भी सामग्री आरटीई अधिनियम या उसके तहत बनाए गए नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं दर्शाती जो प्रतिवादियों (शिक्षा विभाग) को सभी निजी मान्यता प्राप्त स्कूलों, और विशेष रूप से अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को पत्रकारों के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का निर्देश देने की शक्ति देती हो। केवल पत्रकार संघों के अनुरोध पर जारी किए गए प्रशासनिक निर्देश किसी भी संवैधानिक संरक्षण को ओवरराइड नहीं कर सकते और न ही वे बिना विधिक अधिकार के कोई बाध्यता पैदा कर सकते हैं।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Natural Justice) का खुला उल्लंघन
अदालत ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई कि शिक्षा विभाग ने इन निर्देशों को जारी करने से पहले स्कूलों का पक्ष तक नहीं सुना।
वित्तीय प्रभाव: इस प्रकार के आदेशों का सीधे तौर पर संस्थानों के वित्तीय और प्रशासनिक ढांचे पर गहरा असर पड़ता है।
सुनवाई का अधिकार आवश्यक: कोर्ट ने कहा कि ऐसे किसी भी निर्णय को लेने से पहले स्कूलों को सुनवाई का अवसर (Opportunity of Hearing) देना ‘अपरिहार्य’ (Indispensable) था। ऐसा न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है, जो इस प्रशासनिक कार्रवाई को पूरी तरह से मनमाना और कानूनन टिकने अयोग्य बनाता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों की आर्थिक स्थिति का हवाला देकर बिना किसी वैधानिक नीति के निजी संस्थानों पर वित्तीय बोझ नहीं डाला जा सकता। नतीजतन, कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को मंजूरी देते हुए विवादित निर्देशों को निरस्त कर दिया।
विधिक फैक्ट शीट: तेलंगाना हाई कोर्ट बनाम अल्पसंख्यक संस्थान आरटीई वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | तेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court), हैदराबाद |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जुव्वादी श्रीदेवी (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता | ब्रदर्स ऑफ सेंट गेब्रियल एजुकेशनल सोसाइटी व अन्य |
| प्रासंगिक संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 30(1) (अल्पसंख्यकों का शैक्षणिक अधिकार) व अनुच्छेद 14 |
| आधारभूत सुप्रीम कोर्ट नजीर | प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ (संविधान पीठ) |
| अदालत का अंतिम आदेश | रिट याचिकाएं स्वीकार; पत्रकारों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का सरकारी आदेश रद्द |
अदालत ने कानून के शासन (Rule of Law) को मजबूत करते हुए साफ कर दिया कि यदि सरकार किसी विशेष वर्ग (जैसे पत्रकारों) की मदद करना चाहती है, तो उसे अपनी सरकारी योजनाओं या बजटीय प्रावधानों के जरिए ऐसा करना चाहिए। वह कानून के दायरे से बाहर जाकर निजी या अल्पसंख्यक संस्थानों को अपनी जेब से समाज कल्याण करने के लिए विवश नहीं कर सकती, खासकर तब जब देश की सर्वोच्च अदालत ने उन संस्थानों को आरटीई से स्पष्ट छूट दे रखी हो।

