Tuesday, July 21, 2026
HomeHigh CourtSC-ST Act Case: मकान के गेट या सड़क पर जातिसूचक गाली देना...

SC-ST Act Case: मकान के गेट या सड़क पर जातिसूचक गाली देना सार्वजनिक दृष्टिकोण के दायरे में…गवाह की मौजूदगी ट्रायल का विषय, जानिए केस

SC-ST Act Case: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण’ की कानूनी व्याख्या को स्पष्ट करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

जातिगत टिप्पणी पर एससी-एसटी एक्ट का विधिक प्रतिबंध को किया स्पष्ट

हाईकोर्ट के जस्टिस एन. तुकारामजी की एकल पीठ ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों या सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले हिस्सों पर की गई जातिगत टिप्पणी पर एससी-एसटी एक्ट का विधिक प्रतिबंध लागू होगा। अदालत ने कहा, “यदि किसी व्यक्ति को घर से बाहर धकेलते हुए मुख्य गेट के पास या उससे सटी सार्वजनिक सड़क पर जातिसूचक गालियां दी जाती हैं, तो प्राथमिक दृष्टि (Prima Facie) से इसे एससी-एसटी (SC-ST) अधिनियम के तहत ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण’ (Within Public View) में किया गया अपराध माना जाएगा। अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के प्रारंभिक चरण में अदालत यह तय नहीं कर सकती कि वहां कोई बाहरी गवाह मौजूद था या नहीं; यह पूरी तरह से ट्रायल (मुकदमे) का विषय है।”

मामला क्या है?: सोने के आभूषणों का विवाद और गेट पर जातिसूचक गाली

यह विधिक विवाद इलंतकुंटा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 118/2026 से जुड़ा है।

विवाद की पृष्ठभूमि: अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता (जो अनुसूचित जनजाति समुदाय से है) ने करीब तीन साल पहले आरोपी के पिता के पास अपनी पत्नी के सोने के आभूषण गिरवी रखे थे। शिकायतकर्ता का दावा था कि उसने ब्याज सहित ऋण चुका दिया था, लेकिन आभूषण वापस नहीं किए गए।

घटना: 6 जून 2026 की सुबह करीब 11:30 बजे जब शिकायतकर्ता अपने आभूषण वापस मांगने आरोपी के घर गया, तो आरोपी ने कथित तौर पर उसके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया, उसकी जाति का नाम लेकर अपमानित किया और उसे घर के गेट से बाहर धकेल दिया। इसके बाद 11 जून 2026 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

दर्ज धाराएं: पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 296(b) (अश्लील कृत्य) और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(r), 3(1)(s) और 3(2)(Va) के तहत मामला दर्ज किया।

आरोपी की दलील और ‘हितेश वर्मा’ नजीर का संदर्भ

आरोपी ने अग्रिम जमानत मांगते हुए अदालत में दो मुख्य तर्क दिए।

निजी विवाद: यह विशुद्ध रूप से पैसे के लेन-देन का एक निजी विवाद है और दबाव बनाने के लिए झूठा केस दर्ज कराया गया है। साथ ही एफआईआर में 5 दिनों की देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

सार्वजनिक दृष्टिकोण का नियम: आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य’ और ‘कुरुप दयाल बनाम राज्य’ का हवाला देते हुए दलील दी कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध तभी बनता है जब अपमान ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण के भीतर’ (Within Public View) हुआ हो। चूंकि यह घटना उसके घर के भीतर की है, इसलिए यह कानून लागू नहीं होता।

हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: “गेट और सीमेंट रोड निजी क्षेत्र नहीं”

जस्टिस एन. तुकारामजी ने सुप्रीम कोर्ट के विधिक सिद्धांतों से सहमति जताते हुए भी मामले की भौगोलिक और प्रक्रियात्मक स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

प्रारंभिक चरण में साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं: “शिकायत और मामले के तथ्यों से प्राथमिक दृष्टि से पता चलता है कि पीड़ित को गेट से बाहर धकेला गया था और यह घटना या तो घर के प्रवेश द्वार (Entrance) पर या उससे सटी सीमेंट कंक्रीट (C.C.) सड़क पर हुई थी। ऐसे स्थान को इस प्रारंभिक चरण में निश्चित रूप से ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण’ के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता।”

ट्रायल तय करेगा गवाहों की उपस्थिति: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्या वहां कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था, क्या आरोपी की आवाज बाहर लोगों को सुनाई दे रही थी, ये सभी विषय जांच और मुकदमे (Trial) के दौरान तय किए जाएंगे, न कि प्री-अरेस्ट बेल (गिरफ्तारी से पहले जमानत) के चरण में।

अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक (Statutory Embargo) बरकरार

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा ‘पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले को दोहराया।

एससी-एसटी अधिनियम की धारा 18 और 18-A के तहत अग्रिम जमानत पर सख्त प्रतिबंध है। अदालत केवल उन्हीं मामलों में अग्रिम जमानत पर विचार कर सकती है जहां शिकायत को पढ़ने मात्र से प्राथमिक रूप से (Prima Facie) एससी/एसटी एक्ट का कोई अपराध बनता ही न दिखे। चूंकि इस मामले में शिकायत के तथ्य स्पष्ट रूप से अधिनियम की धाराओं को आकर्षित करते हैं, इसलिए वैधानिक रोक लागू होती है। इसी विधिक निष्कर्ष के साथ हाई कोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

विधिक फैक्ट शीट: तेलंगाना हाई कोर्ट बनाम एससी/एसटी एक्ट अग्रिम जमानत वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय
संबंधित न्यायालयतेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court), हैदराबाद
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एन. तुकारामजी (एकल पीठ)
संबद्ध पुलिस स्टेशनइलंतकुंटा पुलिस स्टेशन (FIR संख्या 118/2026)
प्रासंगिक कानून और धाराएंधारा 3(1)(r), 3(1)(s), एससी/एसटी (PoA) अधिनियम, 1989 | धारा 18 व 18-A (अग्रिम जमानत पर रोक)
घटना का स्थानघर का मुख्य प्रवेश द्वार (Gate) और आस-पास की सीमेंट रोड
अदालत का अंतिम आदेशअग्रिम जमानत याचिका खारिज; मामले को ‘सार्वजनिक दृष्टिकोण’ के योग्य माना

लेकिन इस मामले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यदि आप किसी को घर के गेट पर या सड़क पर लाकर अपमानित करते हैं, तो भले ही वह आपके घर का मुहाना हो, उसे ‘निजी कोना’ कहकर सुरक्षा नहीं पाई जा सकती क्योंकि वह स्थान आम जनता की नजरों और पहुंच में होता है। यह आदेश कानून के दुरुपयोग को रोकने की दलीलों के बीच पीड़ित के अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देता है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
33.9 ° C
33.9 °
33.9 °
50 %
6.4kmh
68 %
Tue
34 °
Wed
33 °
Thu
33 °
Fri
34 °
Sat
34 °